शनिवार, 2 जून 2012

सुबोध श्रीवास्तव की कविता..

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कठपुतलियां


हां, हम सब सिर्फ कठपुतलियां हैं
हाड़-मांस की
चलती-फिरती/ बोलती हुई
जिनकी डोर है
तहज़ीबदार समाज के हाथों में।
यूं जि़न्दा रहना/ और
सुनहरे सपने देखना
जिन्दगी के कदमों की आहट देते हैं
लेकिन
जि़न्दा आंखों के सामने
सपनों का छटपटाकर दम तोड़ देना
और, होठों का खामोश रहना
यह सब/ हाड़-मांस के पुतले की
प्राणवायु नहीं हो सकते कभी।
वैसे भी-बेजान चीज़ों और
संवेदनाओं में कोई साम्य नहीं बैठता!

सुबोध श्रीवास्तव

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