सोमवार, 11 नवंबर 2013

हरि नारायण तिवारी का गीत

निधरक बहा नहीं जाता है


जो लिखवाना चाह रहे तुम,
मुझसे लिखा नहीं जाता है।।

स्वार्थ सिद्धि की जिसमें रव हो,
जीवित रहते जो मन शव हो।
उसकी कहनी लोक जगत में,
खुलकर कहा नहीं जाता है।।

सुलभ न हो जिस तरुवर के फल,
नित्य नई अभिलाषा प्रति पल।
रसना के उन उच्छवासों में,
निधरक बहा नहीं जाता है।।

हम निर्जन में जन धन वाले,
अपने अन्तर उपवन वाले।
झूम झूमकर उसके रस में,
सुखमय स्वाद नहीं आता है।।

कल्प वृक्ष की हम पर दाया,
सदा सुहावन रहती छाया।
निर्मल रहना जीना सीखा,
कलुषित कर्म नहीं भाता है।।

हम हैं राह बनाते जाते,
सच सबको समझाते जाते,
सभी हमारे हम सबके हैं,
रखता मानवता से नाता।।
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-हरि नारायण तिवारी

बी-112, विश्व बैंक कालोनी,
बर्रा, कानपुर-27




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