रविवार, 29 जून 2014

कमलेश व्दिवेदी की ग़ज़लें



हमेशा रहता है..

मुस्कानों के साथ हमेशा रहता है।
दीवानों के साथ हमेशा रहता है।।

जिसके दिल में सिर्फ मुहब्बत रहती है।
अफसानों के साथ हमेशा रहता है।।

जो भी शमा सा लहराता-बलखाता है।
परवानों के साथ हमेशा रहता है।।

जिसको मस्ती रास हमेशा आती है।
मस्तानों के साथ हमेशा रहता है।।

दिलवालों संग कुछ दिन रहकर देख ज़रा।
धनवानों के साथ हमेशा रहता है।।


सच्चाई सच्चाई है..

आज मुकाबिल भाई है।
तब गीता याद आई है।।

अपनों से लड़ना होगा।
अपने हक़ की लड़ाई है।।

सच को सच वो माना नहीं।
मैंने क़सम भी खाई है।।

उसके संग सब लोग मगर।
मेरे साथ खुदाई है।।

जंग ये मैं ही जीतूंगा।
सच्चाई सच्चाई है।।

अखबार की समस्या..

है जीत की समस्या या हार की समस्या।
हमको न अब बताओ बेकार की समस्या।।

ये मान लो कि तुमसे कुछ भी नहीं मैं कहता।
होती अगर जो केवल दो-चार की समस्या।।

कछुआ भी रेस जीते जब वो चले निरन्तर।
हो लाख संग उसके रफ़्तार की समस्या।।

चुटकी में हल किये हैं मुश्किल सवाल उसने।
पर कैसे हल करे वो परिवार की समस्या।।

बीमार की दवाई में सब लगे हैं लेकिन।
कोई नहीं समझता बीमार की समस्या।।

हमसे हैं लाख बेहतर दरिया-हवा-परिंदे।
सरहद,न हद,न कोई दीवार की समस्या।।

हमको जो सच लगा है हमने वही लिखा है।
छापे-न छापे ये है अखबार की समस्या।।

मुहब्बत..

भोली सी नादान मुहब्बत।
पर ले सकती जान मुहब्बत।।

ताजमहल देखो तो लगता-
कितनी आलीशान मुहब्बत।।

कोई सोच नहीं सकता है-
क्या कर दे कुर्बान मुहब्बत।।

हर मजहब कहता-इन्सां का-
दीन-धरम-ईमान मुहब्बत।।

जो भी चाहे कर सकता है।
कितनी है आसान मुहब्बत।।

कल तक थी पहचान किसी से।
आज बनी पहचान मुहब्बत।।

थोड़े दिन भी साथ रहे तो।
समझो है मेहमान मुहब्बत।।

गम-खुशियाँ दो पालों में हैं।
दोनों के दरम्यान मुहब्बत।।

दुनिया से लड़ने का जज़्बा।
कितनी है बलवान मुहब्बत।।

सच पूछो तो इस धरती पर।
ईश्वर का वरदान मुहब्बत।।

चौपाइयों के साथ..

कोई रहे ज्यों भीड़ में तन्हाइयों के साथ।
रहता हूँ यों ही मैं भी मेरे भाइयों के साथ।।

ऊंचाइयों पे कितनी कहाँ आ गए हैं हम।
एहसास इसका होता है गहराइयों के साथ।।

उसकी हर एक बात पे हमको यकीन है।
वो बोलता है झूठ भी सच्चाइयों के साथ।।

गम की करो न फिक्र हैं खुशियां भी साथ ही।
जैसे मिलें पहाड़ हमें खाइयों के साथ।।

मैं लाख सोचूं फिर भी समझ पाता हूँ नहीं।
जीता है कैसे कोई भी परछाइयों के साथ।।

वो दोस्त है तो है भले ही चाहे जैसा हो।
मंज़ूर है अच्छाइयों-बुराइयों के साथ।।

दंगा कराया किसने पता ये नहीं मगर।
कुछ दिख रहे थे अपने भी दंगाइयों के साथ।।

अच्छी लगे जो बात तो मज़हब का फर्क क्या।
पढता है वो कुरान भी चौपाइयों के साथ।।

डॉ.कमलेश द्विवेदी

संपर्क:119/427 दर्शन पुरवा,कानपुर-208012 (उ.प्र.)
मो.09415474674,08081967020



  • संक्षिप्त परिचय

  • नाम: डॉ.कमलेश व्दिवेदी
  • जन्म तिथि:25 अगस्त 1960
  • साहित्य यात्रा:1984 से
  • सृजन:मुख्यतः हास्य-व्यंग्य रचनाएँ साथ ही गीत-ग़ज़ल एवं बालगीत भी
  • प्रकाशन:50 से अधिक स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन
  • प्रसारण:अखिल भारतीय कविसम्मेलनों-मुशायरों,दूरदर्शन,आकाशवाणी तथा निजी चैनलों से प्रसारण
  • विशेष:हिदी ग़ज़ल में विशिष्ट योगदान के लिए विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (बिहार) से पी.एच.डी.की उपाधि
  • सम्मान:जिगर एकडेमी,चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट,भारतीय बाल कल्याण संस्थान,सुभाष चिल्ड्रेन सोसायटी,अखिल भारतीय मंचीय कवि परिषद,मानस संगम,रोटरी क्लब,लायंस क्लब,विकासिका सहित 50 से अधिक संस्थाओं  द्वारा सम्मानित
  • सम्प्रति:एडवोकेट
  • संपर्क:119/427 दर्शन पुरवा,कानपुर-208012 (उ.प्र.)
  • मो.09415474674,08081967020

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