सोमवार, 28 जुलाई 2014

श्रीकांत वर्मा की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

हस्तिनापुर का रिवाज


मै फिर कहता हूं
धर्म नहीं रहेगा तो कुछ नहीं रहेगा
मगर मेरी कोई नहीं सुनता
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियो! होशियार
हस्तिनापुर में/तुम्हारा
एक शत्रु पल रहा है विचार
और याद रक्खो
आजकल महामारी की तरह फैल जाता है
विचार


प्रजापति


इस भयानक समय
में कैसे लिखूं
और कैसे नहीं लिखूं?
सैकड़ों वर्षों से सुनता आ रहा हूं
घृणा नहीं प्रेम करो-
किससे करूं प्रेम?
मेरे चारों ओर हत्यारे हैं
मुकुटहीन
इस नग्न शरीर पर
मुकुट प्रतिष्ठा का
यदि कभी नहीं आया
तो कारण है
यह किसी
शक्ति कुल के सिक्कों पर
बिका नहीं।
युद्धनायक
यूरोप
बडबडा रहा है बुखार में
अमेरिका
पूरी तरह भटक चुका है
अंधकार में
एशिया पर
बोझ है गोरे इंसान का
संभव नहीं है
कविता में वह सब कह पाना
जो घटा है बीसवीं शताब्दी में
मनुष्य के साथ
कांपते हैं हाथ
पृथ्वी की एक-एक सड़क पर
भाग रहा है मनुष्य
युद्ध पीछा कर रहा है

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