रविवार, 6 जुलाई 2014

ऋषभ देव शर्मा की तेवरियाँ



(एक) 

रो रही है बाँझ धरती , मेह बरसो रे
प्रात ऊसर, साँझ परती, मेह बरसो रे

सूर्य की सारी बही में धूपिया अक्षर
अब दुपहरी है अखरती , मेह बरसो रे

नागफनियाँ हैं सिपाही , खींच लें आँचल
लाजवंती आज डरती , मेह बरसो रे

राजधानी भी दिखाती रेत का दर्पण
हिरनिया ले प्यास मरती , मेह बरसो रे

रावणों की वाटिका में भूमिजा सीता
शीश अपने आग धरती , मेह बरसो रे

(दो) 

गाँव, घर, नगर-नगर भूमि की पुकार
ताल, सर, लहर-लहर भूमि की पुकार

सींचें जो खेत में बूँद - बूँद गात
और ना पिएँ ज़हर भूमि की पुकार

नींव में ग़रीब-रक्त और ना चुए
साँझ प्रात दोपहर भूमि की पुकार

भूख के उरोज पर सेठ या मुनीम
और ना धरें नज़र भूमि की पुकार

और की हरे न धूप, छाँव बरगदी
दूर-दूर फैल कर , भूमि की पुकार

नींद की ग़ज़ल नहीं आज मित्रवर!
जागृति के छंद भर भूमि की पुकार

(तीन) 

बाँस का झुरमुट बजाता सीटियाँ
यह हवा सुलगा रही अंगीठियाँ

बुर्ज पर जो चढ़ गए, अंधे हुए
हैं हमारे खून से तर सीढ़ियाँ

कुछ, सिगारों-सिगरटों से पूछतीं
कान में खोंसी हुईं ये बीड़ियाँ

आपने बंजर बनाई जो धरा
जन्मती वह कीकरों की पीढ़ियाँ

पर्वतों पर है धमाकों का समाँ
घाटियों में घनघनाती घंटियाँ

(चार) 

चौराहों पर पिटी डौंड़ियाँ, गली-गली विज्ञापन है
कफ़न-खसोटों की बस्ती में ‘शैव्या’ का अभिनंदन है

आज आदमी से नागों ने यारी करने की ठानी
सँभल परीक्षित ! उपहारों में ज़हरी तक्षक का फन है

आश्वासन की राजनीति ने लोकरीति से ब्याह रचा
मित्र ! श्वेत टोपी वालों का स्याही में डूबा मन है

ये बिछुए, पाजेब, झाँझरें और चूड़ियाँ लाल-हरी
दुलहिन का शृंगार नहीं है, परंपरागत बंधन है

सड़कों के घोषणापत्र में बटिया का उल्लेख हुआ
लगता है, कुछ षड्यंत्रों में व्यस्त हुआ सिंहासन है

(पांच) 

नाग की बाँबी खुली है आइए साहब
भर कटोरा दूध का भी लाइए साहब

रोटियों की फ़िक्र क्या है ? कुर्सियों से लो
गोलियाँ बँटने लगी हैं खाइए साहब

टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं
और झुककर और झुककर जाइए साहब

मानते हैं उम्र सारी हो गई रोते
गीत उनके ही करम के गाइए साहब

बिछ नहीं सकते अगर तुम पायदानों में
फिर क़यामत आज बनकर छाइए साहब

(छह) 

ईंट, ढेले, गोलियाँ, पत्थर, गुलेलें हैं
अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं

आपकी ड्योढी रही, दुत्कारती जिनको
स्पर्शवर्जित झोंपड़ी, महतर गुलेलें हैं

यह इलाक़ा छोड़कर, जाना पड़ेगा ही
टिडिडयों में शोर है, घर-घर गुलेलें हैं

बन गए मालिक उठा, तुम हाथ में हंटर
अब न कहना चौंककर, नौकर गुलेलें हैं

इस कचहरी का यही, आदेश है तुमको
खाइए, अब भाग्य में, ठोकर गुलेलें हैं

क्या पता क्या दंड दे, यह आज क़ातिल को
भीड़ पर तलवार हैं, ख़ंजर गुलेलें हैं

रोटियाँ लटकी हुई हैं बुर्ज के ऊपर
प्रश्न- ‘कैसे पाइए’ उत्तर गुलेलें हैं

है चटोरी जीभ ख़ूनी आपकी सुनिए,
इस बिमारी में उचित नश्तर गुलेलें हैं

ये निशाने के लिए, हैं सध चुके बाज़ू
दृष्टि के हर छोर पर, तत्पर गुलेलें हैं

तार आया गाँव से, यह राजधानी में
शब्द के तेवर नए, अक्षर गुलेलें हैं



संक्षिप्त परिचय


  • जन्म : 04 जुलाई 1957, ग्राम गंगधाडी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश.
  • शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), एम.एस.सी. (भौतिकी), पीएच.डी. (उन्नीस सौ सत्तर के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन).
  • कार्य : 1983-1990 : जम्मू और कश्मीर राज्य में गुप्तचर अधिकारी (इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार).
  • 1990-1997 : प्राध्यापक. 1997-2005 : रीडर. 2005 से प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा.
  • प्रकाशन : काव्य संग्रह – 1. तेवरी (1982), 2. तरकश (1996), 3. ताकि सनद रहे (2002), 4. देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), 5. प्रेम बना रहे (2012), 6. सूँ साँ माणस गंध (2013), 7. धूप ने कविता लिखी है (तेवरी-समग्र, 2014).
  • [‘प्रेम बना रहे’ कविता संग्रह के 2 तेलुगु अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं - :प्रिये चारुशीले (डॉ. भागवतुल हेमलता, 2013), प्रेमा इला सागिपोनी (जी. परमेश्वर, 2013)],
  • आलोचना – 1. तेवरी चर्चा (1987), 2. हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक (1994), 3. कविता का समकाल (2011), 4. तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013).
  • अनुवाद चिंतन – साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000).
  • संपादन : पुस्तकें – भाषा की भीतरी परतें (भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 2012), शिखर-शिखर (डॉ.जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया (2013), प्रेमचंद की भाषाई चेतना, अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), अनुवाद : नई पीठिका - नए संदर्भ, कच्ची मिट्टी  2, पुष्पक 3 और 4, पदचिह्न बोलते हैं. पत्रिकाएँ – संकल्य (त्रैमासिक) : दो वर्ष, पूर्णकुंभ (मासिक) : पाँच वर्ष : सहायक संपादक, महिप (त्रैमासिक) : सहयोगी संपादक, आदर्श कौमुदी : तमिल कहानी विशेषांक, कर्णवती : समकालीन तमिल साहित्य विशेषांक, भास्वर भारत : संयुक्त संपादक.
  • मूलतः कवि. 1980 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन. अनेक शोधपरक समीक्षाएँ एवं शोधपत्र प्रकाशित. शताधिक पुस्तकों के लिए भूमिका-लेखन. आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी के ‘हिंदीभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार - 2010’ द्वारा सम्मानित, ‘रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान - 2013’ से सम्मानित. डीलिट, पीएचडी और एमफिल के 125 शोधकार्यों का निर्देशन.
  • संप्रति : प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद – 500004.
  • संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतपुर, हैदराबाद – 500013.मोबाइल : 08121435033
  • ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा सरस ,, बहुत बहुत बधाई

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  2. बड़ी सशक्त और प्रभावी हैं तेवरियाँ। जनकवि ॠषभ के विचार समसामयिक यथार्थ को उघार कर रख देते हैं। उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति बात को बड़ी मारक बना देती है। — महेंद्रभटनागर

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