गुरुवार, 4 सितंबर 2014

कल्पना मिश्रा बाजपेई की दो कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम्हारा पहला प्यार


सरिता के दोनों तटों को सहलाता कल-कल करता –
अबाध गति सा बह रहा था हमारा प्यार।
वसंती हवा की मदिर सुगंध लिए उन्मुक्त-
सी थी हमारी मुस्कान,
धुले उजले बादलों में छुपती-छुपाती –
इंद्र्धनुष जैसी थी हमारी उड़ान ।
हवा के झौंके ने सरकाया था दुपट्टा मुख से-
तुम अपलक निहारते रहते,
बस तुम ही हो मेरा पहला प्यार-
धीरे से मधुर शब्दों में कहते ।
आखिर वो सलौना सा दिन आ ही गया,
जिस का हम दोनों को था वर्षों से इंतजार ।
चाँद तारे साक्ष्य बन कर आए थे बारात,
ढ़ोल मंजीरे सहनाई ले कर आई-
फेरों वाली मनभावन सुंदर रात ।
अब मैं धड़कती थी तुम्हारी साँसों में,
सांसें लेती थी सुगंध बन कर-
तुम्हारी ही साँसों में।
तुम मुझ को लगते स्वच्छ नीला आकाश-
उसमें अठखेलियाँ करती मैं पूनम का चाँद।
जब मैं चमकती मोती बन तुम्हारी-
सिप्पी जैसी आँखों में,
तुम कहते, अब तुम बन गई हो-
मेरी सुंदर पहचान।
ढेरों कसौटियों पर तुम ने कसा था,
पूर्ण आश्वस्त हो खरा सोना कहा था ।
फिर न जाने एक घटना घाटी,
मेरा प्रतीक्षा करना तुम्हारी ऊब बन गई ,
खोखली लागने लगी मेरी मनुहार और –
अमावस्या की रात सा मेरा एक निष्ठ प्यार।
कौए के घौसले में कोयल के बच्चे सी-
सहमी मेरी अपनी एकाकी पीड़ा
हृदय पर किया हो किसी ने –
गहरा आघात,
कैसे पूँछूं उनसे, उनके दिल की बात।
पर पूछना चाहती हूँ मैं बार-बार,
कहो न साथी, मितवा,
यही था तुम्हारा पहला प्यार



जिंदगी 


ज़िंदगी कसौटियों पर कस कर
निखरती सी गई
जितनी ये तबाह हुई
उतनी संभरती सी गई
आदमियत और गद्दारी में आकर
घुलती सी गई
कभी ये राम,रहीम ,नानक
में बँटती सी गई
कभी ये सुरमई शामों में वीणाकी तरह
बजती सी गई
कभी बेगानों की तरह
कटती सी गई
कभी वादे कभी शोषण में
फँसती सी गई
कभी ये सारे बंधन तोड़ कर
बेदाग सी लगी
कभी ये अंगारों पर चल कर
दहकती सी लगी
कभी ये डगमगाते दीपक
जैसे बुझती सी लगी
कभी ये सुनहरे तारों से बने
पिंजड़े सी लगी
कभी उसमें फंसा पाखी
जैसी बेबस सी लगी
ये ज़िंदगी तेरी एक -एक कठिनाई
मुझे कोहनूर सी लगी
जड़ाया जब उसे अंगूठी में
तो नगीने जैसी लगी
ये ज़िंदगी तू  पात -पात हर डाल-डाल
पर लिखी सी लगी
खग ,विहग,पखेरू के
कंठ में गीत सी लगी
कभी तू महकती चमेली
के फूलों सी लगी
कभी -कभी ये ज़िंदगी
बेरंग गंधहीन सी लगी
जितना कहूँ तेरे लिए
वो कम है क्योंकि
तू हर एक पल
पहेली सी लगी ।



कल्पना मिश्रा बाजपेई



  • जन्मतिथि- 04 जून, 1972
  • जन्मस्थान- ग्राम अटा, जनपद औरैया (उ०प्र०)
  • पिता-        श्री प्रकाश नारायण मिश्रा
  • माता-        श्रीमती मनोरमा मिश्रा
  • शिक्षा-        एम॰ए॰ हिन्दी (बी॰एड)
  • लेखन-       गीत, कहानी,लेख -आलेख ,अतुकांत -तुकांत
  • संप्रति-       अध्यापन-कार्य (पं॰डी॰पी॰ मिश्रा इंटर कॉलेज)
  • संपर्क-        प्लॉट नंबर 27, फ़्रेंड्स कॉलोनी,निकट
  •                   रामादेवी चौराहा, चकेरी, कानपुर(उ०प्र०)
  • फोन-          +91-9455878280, +91-8953654363  

2 टिप्‍पणियां:

  1. पर पूछना चाहती हूँ मैं बार-बार,
    कहो न साथी, मितवा,
    यही था तुम्हारा पहला प्यार.....

    कभी -कभी ये ज़िंदगी
    बेरंग गंधहीन सी लगी
    जितना कहूँ तेरे लिए
    वो कम है क्योंकि
    तू हर एक पल
    पहेली सी लगी ।.....
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.....
    बधाई.....

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  2. आ0 सुधीर सक्सेना सर ,आप का हार्दिक शुक्रिया /सादर

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