रविवार, 16 नवंबर 2014

अशोक अंजुम के दोहे..



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




तन-मन में सन्तूर.. 


तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे तार हुज़्रर ।
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में सन्तूर ।।

मधुमय बन्धन बाँधकर, कल लौटी बारात ।
हरी काँच की चूड़ियाँ, खनकीं सारी रात ।।

आवेदन ये प्रेम का, प्रिये! किया स्वीकार ।
होठों के हस्ताक्षर, बाकी हैं सरकार ।।

मिले ओठ से ओठ यूँ, देह हुई झनकार ।
सहसा मिल जाएँ कभी, बिजली के दो तार ।।

आमंत्रण देता रहा, प्रिया तुम्हारा गाँव ।
सपनों में चलते रहे, रात-रात भर पाँव ।।

प्रिये तुम्हारा गाँव है, जादू का संसार ।
पलक झपकते बीततीं, सदियाँ कई हज़ार ।।

प्रिये तुम्हारे गाँव की, अजब-निराली रीत ।
हवा छेड़ती प्रेम-धुन, पत्थर गाते गीत ।।

तोड़ सको तो तोड़ लो, तुम हमसे सम्बंध ।
अंग-अंग पर लिख दिए, हमने प्रेम-निबंध ।।

कौन पहल पहले करे, चुप्पी तोड़े कौन ।
यूँ बिस्तर की सलवटें, रहीं रात-भर मौन ।।

धूल झाड़कर जब पढ़ीं, यादों जड़ी किताब ।
हर पन्ने पर मिल गए, सूखे हुए गुलाब ।।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही रोचक और दिलचस्प लिखा है !
    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , मैं आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हूँ ताकि नियमित रूपसे आपके ब्लॉग को पढ़ सकू ! आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं आशा करता हूँ क़ि आपके सुझाव मुझे मिलते रहंगे !

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