गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ज्योतिर्मयी पंत की रचनाएं



विनोद शाही की कलाकृति


पलायन के बाद 


नयन झरोखे ताकते
दूर दूर तक राह
मंद पवन भी जो चले
कक्ष कराहें  आह
घरौंदे हुए अकेले

सीलन नम हैं भित्तियाँ
चौबारे हैं  मौन
गौरैया- किलकारियाँ
 रूठे  लगते छौन
 यहाँ कोई नहिं खेले.

जालों के परदे लगे
द्वार उगी है घास
रंगों उभरी झुर्रियाँ
कहती हैं  इतिहास
पले रिश्ते   अलबेले.

 स्मृति रंग भरी होली
दिवाली   अनबोली
हँसी ख़ुशी  त्योहार पर
आ अतीत टोली
गुम हुए अब  खुद मेले.




बेटियाँ 


मन घबराये
चैन न पाये
जियरा भारी
दुश्चिंताएँ....

घर अँगना में
या चौरस्ते
विद्यालय हो
ऑफिस भीतर
पीछा करती
बुरी निगाहें
कुत्सित कर्म
भर वासनाएँ..

माँ की गोदी
में भी खतरा
असहाय बनी
बचा न   पाये
जीने का हक़
कौन छीन के
गर्त दबाएँ ...

लछमी कहते
मुँह माँगी  जो
रकम दिलाये
ला  दहेज़  दे
सिर्फ पूत दे
बने  कल्पतरु
सफल न हो तो
चिता चढ़ाएँ.



जीवन 


न जाने कब
कागज़ की नाव
गीली हो  डूब जाय
आती जाती सांसों का
सिलसिला  टूट जाय
मुट्ठी भरी रेत
हाथों  से फ़िसल जाय
घड़ी की टिक-टिक
अचानक रुक जाय ?
चलते-चलते
 जो  करना है  बस
 इसी पल किया जाय
 प्यार की खुशबू
सबमें बाँटी जाय
न रहेंगे हम यहाँ
ऐसा काम किया जाय
 यादों में जियें
जीवन सफल हो जाय .

1 टिप्पणी:

  1. सत्य सन्देश को उजागर करती रचनाये !

    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है , अगर आपको मेरी पोस्ट पसंद आये तो कृपया फॉलो कर हमारा मार्गदर्शन करें

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