सोमवार, 24 नवंबर 2014

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ का गीत




 चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



भारती उठ जाग रे !



है कहां निद्रित अलस से
स्वप्न लोचन जाग रे !
प्रगति प्राची से पुकारे
भारती उठ जाग रे !

मलय चन्दन सुरभि नासा
नित नया उत्साह लाती
अरूणिमा हिम चोटियों से
पुष्प जीवन के खिलाती

कोटिश: पग मग बढ़े हैं
रंग विविध ले हाथ रे !
भारती उठ जाग रे !

ज्ञान की पावन पुनीता
पुण्य सलिला बह रही
आदि से अध्यात्म गंगा
सुन तुझे क्या कह रही
विश्व है कौटुम्ब जिसका
चरण रज ले माथ रे!
भारती उठ जाग रे !

नदी निर्झर वन सुमन सब
वाट तेरी जोहते
ध्वनित कलकल नीर चँचल
मृगेन्द्रित मन मोहते !
कोटिश: कर साथ तेरे
अनृत झुलसा आग रे !
भारती उठ जाग रे !
युग भारती फिर जाग रे !
जाग रे ! .. फिर जाग रे !

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