गुरुवार, 20 नवंबर 2014

पुस्तक चर्चा: अंतस का संगीत-काव्य संग्रह/अंसार क़म्बरी







जब रात होती है तो कोई अंधेरा देखता है, कोई आसमान की तरफ़ खिड़की खोल लेता है, कोई आसमान में फैले हुए असंख्य तारे देखता है, कोई उनमें से ढूँढ के ध्रुव तारा भी देख लेता है, जो सारे तारों से अलग खड़ा है……पर जो विराट आसमान में असंख्य तारों के बीच, दूर खड़े ध्रुव तारे का आसमान में दूर होते जाना, उसका निष्कासित किया जाना देख लेता है, जो उसकी चमक के उत्सव में भी उसके आसमान से निष्कासन का दुख देख लेता है, वह सच्चा कवि होता है। वह सदियों पुराने दर्दों को महसूस करता है, उन्हें जीता है। ख़ुद धागा बनके उन्हें अपने में पिरोता है। अपने दुख-दर्द दबाकर दूसरों के ज़ख्मों पर मरहम रखता है, उन पर आँसू बहाता है। उन्हें गीतों में, ग़ज़लों में, दोहों में ढालता है। वह आँखों में सूखती नमी को पालता है, सहेजता है और चुपके से संस्कृति और साहित्य की ज़मीन तैयार करके, उसमें उस नमी को बो देता है, जिससे सदियों तक आने वाली पीढियाँ मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं के पेड़ों को बोते, रोपते और सींचते कटी है अंसार क़म्बरी की ज़िन्दगी। उन्होंने दर्द के मौसमों में कबीर की तरह उत्सव मनाया है, तो संत दादू की तरह झूठी चकाचौंध के बीच सिसकती पीर को पढ़ा है। आज यहाँ हर चीज़ बाज़ार में बिकने के लिए खड़ी है, हमारे चारों तरफ़ दुकानें सजी हैं, शुक्र है कि हमारे बीच एक अंसार क़म्बरी हैं।

विवेक मिश्र



  • कृति : अंतस का संगीत
  • विधा : दोहे एवं गीत
  • रचनाकार : अंसार क़म्बरी
  • प्रकाशक : नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली
  • वितरक : शिल्पायन, दिल्ली
  • मूल्य : रु 150/-

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