मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

शशि पुरवार की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक) 


यूँ  न मुझसे रूठ  जाओ, मेरी जाँ निकल न जाये
तेरे इश्क का जखीरा, मेरा दिल पिघल न जाये.

मेरी नज्म में गड़े है, तेरे प्यार के कसीदे
मै जुबाँ पे कैसे लाऊं, कहीं राज खुल न जाये

मेरी खिड़की से निकलता, मेरा चाँद सबसे प्यारा
न झुकाओ तुम निगाहे, कहीं रात ढल न जाये.

तेरी आबरू पे कोई, कहीं दाग लग न पाये
मै अधर को बंद कर लूं, कहीं अल निकल न जाये.

ये तो शेर जिंदगी के, मेरी साँस से जुड़े है
मेरे इश्क की कहानी, ये गजल भी कह न जाये.

ये सवाल है जहाँ से, तूने कौम क्यूँ बनायीं
ये तो जग बड़ा है जालिम, कहीं खंग चल न जाये.
 


(दो) 


भारत की पहचान है हिंदी
हर दिल का सम्मान है हिंदी.

जन जन की है मोहिनी भाषा
समरसता की खान है हिंदी.

छन्दों के रस में भीगी ये
गीत गजल की शान है हिंदी.

ढल जाती भावों में ऐसे
कविता का सोपान है हिंदी.

शब्दों का अनमोल है सागर
सब कवियों की जान है हिंदी.

सात सुरों का है ये संगम
मीठा सा मधुपान है हिंदी.

क्षुधा ह्रदय की मिट जाती है
देवों का वरदान है हिंदी.

वेदों की गाथा है समाहित
संस्कृति की धनवान है हिंदी.

गौरवशाली भाषा है यह
भाषाओं का ज्ञान है हिंदी.

भारत के जो रहने वाले
उन सबका अभिमान है हिंदी।



(तीन) 


हर मौसम में खिल जाता है नीम की ही ये माया है
राही को जो छाया देता नीम का ही वो साया है।

बिन पैसे की खान है ये तो तोहफ़ा है इक क़ुदरत का,
महिमा देखी नीम की जब से आम भी कुछ बौराया है ।

जब से नीम है घर में आया, जीने की मंशा देता,
मोल गुणों का ही होता है नीम ने ही बतलाया है।

कड़वा स्वाद नीम का लेकिन गुणकारी तेवर इसके,
हर रेशा औषध है इससे रोग भी अब घबराया है।

निंबोली का रस पीने से तन के सारे रोग मिटें,
मन मोहक छवि ऐसी जिसने लाभ बहुत पहुँचाया है

गाँव की वो गलियाँ भी छूटीं, छूटा घर का आँगन भी,
शहर में फैला देख प्रदूषण नीम भी अब मुरझाया है।

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