मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

देवेन्द्र सफल के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



दिन हैं शर्मीले..


सिर पर चढ़ी धूप ने पहने
कपड़े कुहरीले
काँपें तन-मन चुभें शीत के
ये शर जहरीले।

चारों ओर धुंध का घेरा
नजर न कुछ आये
राख मले जोगी-सा मौसम
जिसे न जग भाये
दबे पाँव आकर छुप जाते
दिन हैं शर्मीले।

वृक्षों और लताओं के अब
पीत हुए पत्ते
इन पत्तों पर गिरे ओस-कण
आँसू-से झरते।
उपवन, खेत, मेड़, पगडण्डी
सब गीले-गीले।

पंछी दुबक गये कोटर में
सूनी अँगनाई
लेकिन  चक्की से चूल्हे तक
नाच रही माई
सर्द अलाव हुआ तो बाबा
हुए लाल-पीले।


देहरी भीतर खुशियाँ आईं..


देहरी भीतर खुशियाँ आईं
लगता अपने दिन बहुरे हैं
बहुत दिनों के बाद हमारे
आँगन में पंछी उतरे हैं ।

अच्छी फसल हुई है अबकी
खूब हुए हैं चना औ' मटर
कुठला भरा हुआ गेहूँ से
धरे बरोठे राई-अरहर
बेच अनाज चुकाया कर्जा
ईश-कृपा से अब उबरे हैं ।

कजरारे नयना शर्मीले
दर्पण से खुलकर बतियाते
सेंदुर ,टिकुली और महावर
बिन बोले सब कुछ कह जाते
वर्षों बाद बज रही पायल
मेंहदी रचे हाथ निखरे हैं ।

शुभ-शुभ शगुन हो रहें हैं नित
कागा भी मुँडेर पर बोले
चैता,बन्ना गावै तिरिया
भेद जिया के रह-रह खोले
गेरू मिले हुए गोबर से
घर औ' द्वार लिपे  संवरे हैं।

पिछले साल पड़ा सूखा तो
रोई मुनिया की महतारी
देवी की किरपा से अबकी
गौना देने की तैयारी
जो सम्बन्धी तने -तने थे
लगे तनिक वो भी निहुरे हैं।


आने वाली पीढी को हम..


आने वाली पीढी को हम
आओ सुखद जवानी दे दें
अपने जले पांव हों चाहे
उन को शाम सुहानी दे दें।

जहरीली जो हुईं हवाएं

उनमें भी वे जहर न भर दें
बढें कदम तो झंझाऐं आ
उंहें कहीं भयभीत न कर दें
डरें न झुकें उंहें हम ऐसा
गैरत वाला पानी दे दें।
नये दौर की चाल तेज है
आओ बढकर उन्हें सराहें
करवट बदल रहा है मौसम
बदल रही हैं उनकी चाहें
वे पिज्जा. बर्गर खाएं पर
थोडी .सी गुडधानी दे दें

वे अतीत के पृष्ठ सुनहरे

जिंहें भुलाना कभी न संभव
आने वाले कल की खातिर
फिर उनमें रंग भर दें अभिनव
पुरखों के स्वरणिम अतीत की
ताजा लिखी कहानी दे दें।


चाँद-सितारे छू कर भी हम..


चाँद-सितारे छू कर भी हम
मन से अभी आदिवासी हैं ।

घिरे हुए मोहक घेरों से
जिनके रंग-बिरंगे फंदे
इन फंदों में सभी फंसे हैं
मूरख,ज्ञानी,ध्यानी बन्दे
मुख्य पृष्ठ पर अभी जमे हैं
जो सन्दर्भ हुये बासी हैं।

तन्त्र-मन्त्र के जाल बिछे हैं
स्वांग सरीखे जादू टोने
दिशाशूल ,अपशगुन से डरें
माथे-माथे लगे दिठौने
जब हम तिलक भभूत लगायें
शिर धुनते मगहर-काशी हैं ।

भूमण्डलीकरण की बातें
लेकिन मन में बसे कबीले
सब पर गहरे रंग चढ़े हैं
लाल, हरे औ'नीले ,पीले
अणु बम सिर पर लादे फिरते
पर खुशियों के अभिलाषी हैं।

जाने कितने दर्पण बदले
लेकिन खुद को बदल न पाये
गहन अँधेरे मिटें न मेटे
कहने को हैं दीप जलाये
भयवश पलकें बन्द न होतीं
सुख के सपने अनिवासी हैं ।


अम्मा का मन कुढ़ता है..


फोटो वही पुरानी लेकिन
फ्रेम नया मढ़ना पड़ता है।

लोटा,थाली और कटोरों

का जारी है पीछे हटना
कब्जाए क्राकरी किचन को
ठप्पा जिस पर मेड-चाइना
बच्चों की खुशियों में खुश हूँ
पर अम्मा मन कुढ़ता है ।

ह्रदय-पटल पर खिंची रेख वो

कभी-कभी गहरी हो जाती
मोबाइल ,कम्प्यूटर हैं पर
मन फिर पढ़ना चाहे पाती
वे अतीत के पृष्ठ सुनहरे
अन्तस् व्याकुल हो पढ़ता है।

यादें बढ़ कर छाया देतीं

जब-जब तपने लगे दुपहरी
उन्हें भूलना बहुत कठिन है
ऐसी छाप पड़ी है गहरी
बीता कल सिर सहला देता
और कभी चांटा जड़ता है ।

नये चलन का है प्रभाव  पर

रखता हूँ मैं खुद संयत
अभी संभाले हूँ वैसे ही
पुरखों से जो मिली विरासत
सुधियाँ  उधर-उधर जातीँ,मन-
पंछी जिधर-जिधर उड़ता है।


तोड़ लो अनुबन्ध..


तोड़ लो अनुबन्ध जहरीली हवा से,
मन महासागर समय बहती नदी है ।

एक मन्थन ने प्रलय को रच दिया था

बस सुधा घट के लिए छल-किया था
कौन पीता विष भला सञ्जीवनी-सा
शंभु ने जिसको विहंस कर पी लिया था।
चेतना के सप्त स्वर बेचैन लगते
गरल है हर होंठ पर क्या त्रासदी है।

जाल फैलाये शिकारी मौन साधे

देखते चुपचाप बगुलों से इरादे
स्वर्ण-पिंजरे में सही पर कैद हैं हम
गत हुए हैं स्वप्न देखे एक-आधे
काट दो इन बंधनों की मेखला को
पीठ पर वैताल बन कर जो लदी है।

सिमट आये हैं छितिज घर -आंगनों में

दर्द के अहसास जगते फागुनों में
बाँसुरी क्यों मोहिनी लगती नहीं अब
हाट के पर्याय हैं वृंदावनों में
बन्द नैनों से नहीं दर्पण निहारो
नव किरण ले चल रही नूतन सदी है।


छुट्टी पर है घाम (दोहे)


कुहरे ने फिर खत लिखा
है सूरज के नाम
अब ड्यूटी पर मैं डटा
छुट्टी पर है घाम।

ठण्ड ओस से घास पर
सजा रही बाजार
औ' बढ़ता ही जा रहा
कुहरे का व्यापार।

ठिठुरन बढ़ती जा रही
ज्यों- ज्यों बढ़ती शीत
ठंडक का दिखता असर
पात हुये हैं पीत।

कुहरे का ऐसा असर
मौसम साधे योग
पंछी कोटर में छुपे
सिकुड़े-सिमटे लोग ।

मौसम वैरागी हुआ
मले वदन में राख

माघ-पूस कुहरा ढँके
घटी सूर्य की साख ।

सर्दी से बेहाल सब
मांगें रब से खैर
सूरज भी लगता डरा
भुला दिया है बैर ।

छाया कुहरा छँट गया
जो था बड़ा अरूप
कल तक ठिठुरी थी बहुत
आज खिली है धूप । 


देवेन्द्र सफल


  • पूरा नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
  • पिता- कीर्तिशेष लक्षमी नारायण शुक्ल
  • माता- समृतिशेष अलक नंदा देवी शुक्ला
  • जन्म-स्थान-कानपुर महानगर (उ.प्र)
  • जन्म तिथि-04-01-1958
  • शिक्षा-स्नातक
  • प्रकाशन-गीत-नवगीत संग्रह: पखेरू गन्ध के,  नवांतर, लेख लिखे माटी ने, सहमी हुई सदी, हरापन बाक़ी है।
  • अन्य अनेक सामूहिक संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी के मान्य कवि ।
  • सम्मान-देश-विदेश में अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/ पुरस्कृत।
  • संपर्क-117/क्यू / 759 -ए,शारदा नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश-208025
  • ईमेल-devendrasafal@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: अँधेरे दौर में रोशनी दिखाती कविताएं




                              क्या कहूँ तुमको, तुम तो खुद ही  दर्द का..

    

क्या अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जायेगी ?
क्या अँधेरे दौर की कविता लिखी जायेगी ?
हाँ! अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जाएगी.

अरविन्द कुमार का काव्य संग्रह इस अँधेरे दौर की वह कविता है जो सिर्फ अँधेरे की गहराई और विस्तार का मुआयना ही नहीं करती बल्कि अपने समय के साथ संवाद करती है. इनकी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह उनके और हमारे समय का यथार्थ है और इससे बढ़कर पाठक की जिन्दगी से ऐसे मिल जाता है जैसे कि लेखक और पाठक एकमय हों. वे अपने दर्द को इस प्रकार बयाँ करते हैं -

      क्या कहूँ तुमको
      तुम तो खुद ही
      दर्द का एक
      ठहरा हुआ समन्दर हो
अरविन्द की शुरुआती कविताओं में मनुष्य मन की झुंझलाहट, असंतुष्टि, भय, संशय और विरोधाभास की अभिव्यक्ति को सहजता से महसूस किया जा सकता है.  

      हर रात की काली चादर
      फटने के बाद सुबह का सूरज
      सुंदर, नया और पाक तो जरूर लगता है
      पर बेकार
      शाम के धुँधकले में वह भी
      थक, हार कर
      समन्दर में डूब जाता है
      और फिर कुछ भी नहीं बदलता
      ठीक कल की तरह

शहर की हर हलचल पर कवि की पैनी नजर है. वह उसकी आबोहवा से वाकिफ हैं. शहर का मिजाज़ पढ़ने और गढ़ने का यही शिल्प पाठक को अपने साथ शहर की सैर कराता है.
      सच तो यह है कि
      दिन भर इस शहर में
      संकल्प फूलते हैं
      और शाम तक बजबजा कर
      सड़ जाते हैं
      पल-प्रतिपल
      पोस्टर चिपका दिए जाते हैं
      यहाँ वहाँ हर तरफ
      लोगों की पीठ पर
      भोथरे आक्रोशों की अलसाई खड़-खड़
      और टूटी पत्तियों की
      फंफूदी लगी भीड़ में
      पेड़ अब आग प्रूफ हो चुके हैं

अरविन्द अपनी कविताओं में मनुष्य के अंतर्मन में पैदा होने वाले प्रश्नों से संघर्ष करते हैं. लेकिन वह बड़ी आत्मीयता के साथ स्वीकार करते हैं कि मैं पल-प्रतिपल हजारों प्रश्न करता हूँ और उन्हें हल करता हूँ, लेकिन कुछ न कुछ रह जाता है जो लोगों की आँखों में चुभता है-
      पर जानते हो,
      जब तक वह औजार
      उन्हें मिलेगा
      मेरे भीतर भी
      उग आएगी
      एक और दाढ़ी
      ठीक नागफनी की तरह

कविता यथार्थ का मात्र चित्रण ही नहीं बल्कि उस दुनिया का सपना भी है जिसे कवि मनुष्यता के लिए चुनता है, उसका ख़्वाब बुनता है. आधुनिक कविता का यह नया स्वरूप अरविन्द कुमार की कविताओं में धीरे-धीरे विचरण करने लगता है.
      और गुलाम पड़ी फसलें
      आज़ाद होकर
      निडर चाँदनी में
      लहलहाने लगती हैं
      सपनों में यूँ ही
      मिटती है पुरानी दुनिया
      और जन्म लेती है
      एक नई सुहानी सुबह

एक तरफ वे नई सुबह को लाने का ख़्वाब बुनते हैं तो दूसरी तरफ उन लोगों की तमाम लड़ाईयों की तरफ इशारा भी करते हैं कि आने वाली पीढ़ी हमसे सवाल करेगी कि इस अँधेरे दौर में हमने क्या किया? हम लड़े क्यों नहीं और इतनी गहरी चुप्पी क्यों है ? शायद इसीलिए लेखक अपने और अपने जैसे लोगों से संवाद करते हैं-
    ऐसा न हो
    कि हमें अपनी गर्दनें झुका लेनी पड़ें
    अपराधियों की तरह
    क्योंकि आज
    हम या तो मौन हैं
    या लड़ रहे हैं
    सिर्फ कायरों की तरह
हमारे आस-पास सामाजिक बदलाव के नाम पर ढोंग-पाखंड इत्यादि करने वालों की सुध-बुध इन्होने बड़े ही सहज, सरल लेकिन तीक्ष्ण तरीके से ली. अरविन्द दिखावटी बुद्धिजीवियों की रोजमर्रा की जिन्दगी का वर्णन इस प्रकार करते हैं जैसे उन्हें वे रोज-ब-रोज होने वाली चर्चाओं-परिचर्चाओं में देखते हों-
      आओ, चलो कहीं बैठकर...
      उसकी बखिया उधेड़ दें ...
      आसमान को अपनी मुट्ठी में कस लें ...
      शोर मचाते हुए
      भीड़ में तबदील हो जाएँ ...
      और चाय के गिलासों में डूबकर
      कोई तूफ़ान खड़ा कर दें ...
      और टाँगे फैलाकर
      क्रांति की अगवानी करें ...

रचनाकार कभी भी निरपेक्ष नहीं रह सकता, उसको अपना पक्ष चुनना ही पड़ता है. पक्षधरता ही रचनाकार को अपने कर्तव्यों पर चलने के लिए प्रेरित करती है. अरविन्द ने बीच का रास्ता चुनने वाले लोगों के लिए लिखा-
बीच के लोग
बीच में रहते हैं...
और हवा के रुख को भाप कर
बातें करना इनकी समझदारी है ...
हमेशा दुम हिलाते हैं
और पीठ पीछे जुबान ...
और यात्राओं को हमेशा कमजोर करते हैं ...
निरंतर रोशनी को
दूर धकेलते रहते हैं

उपभोगतावादी संस्कृति ने जहाँ सबकुछ बाजार के हवाले कर दिया वहीं प्रेम को भी लाभ हानि के स्तर पर पहुँचा दिया गया. लेकिन अरविन्द कुमार की कविताएँ प्रेम को नया आयाम देने में सफल रहीं. प्रेम व्यक्तिनिष्ठ नहीं बल्कि वह पूरी दुनिया से प्रेम करना सिखाती है-
      मैं तुम्हारी ऊँगली पकड़कर
      इस आग के विशाल दरिया को बेखौफ पार करना चाहता हूँ
      और रचना चाहता हूँ
      तुम्हारी छाँव में बैठ कर
      प्यार और शांति की नई इबारतें
      एक नई दुनिया के लिए

बड़ा लेखक बड़े विचारों से बनता है. लेखक ने भी अपनी विचार यात्रा को कविताओं में सहजने का काम किया है. उनकी कविताओं में प्रेम, संघर्ष, स्वतंत्रता और विश्वबंधुत्व का पक्ष तो है ही साथ ही साथ उन्होंने विचारों की तमाम अभिव्यक्तियों की स्वतंत्र चेतना का निर्माण पथ को मजबूत करने का इरादा जाहिर किया है.
कवियों को लिखने दो
अपनी पूरी ईमानदारी
और जीवंत दृष्टि सपन्नता के साथ
प्रकट करने दो उन्हें
जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति
नहीं तो वे तंग आकर
मौन धारण कर लेंगे
और समूची धरती
तब किसी स्पष्ट रोशनी के बिना
अराजक हो जायेगी 

अरविन्द कुमार ने अँधेरे दौर की उस परम्परा को कायम किया है कि दुनिया में सिर्फ अँधेरा ही नहीं है अँधेरे को दूर करने वाली रोशनी भी है. आधुनिक कविताओं में प्रतिरोध की कविताओं में मदन कश्यप, आलोक श्रीवास्तव के साथ-साथ अरविन्द कुमार का नाम भी अवश्य आएगा.
कुमार की कविताएँ इस अँधेरे दौर की वो कविताएँ हैं जो आगे रोशनी दिखाती हैं. नये समाज के निर्माण में पाठक को साझीदार करती हैं. ये वो कविताएँ हैं जो एक ऐसा ख्वाब बुनती हैं जिसकी माध्यम से मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों को प्राप्त किया जा सकता है. 

-समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा


  • आओ कोई ख्वाब बुने : अरविन्द कुमार 
  • प्रकाशन : शब्दारंभ 
  • कीमत : 100 
  • पेज :116 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

कल्पना रामानी की पांच ग़ज़लें


विनोद शाही की कलाकृति


खुशबू देते कोमल फूलों जैसे..


खुशबू देते कोमल फूलों जैसे रिश्ते
ना जाने क्यों आज बन गए काँटे रिश्ते

सहलाते थे दर्द दिलों का मरहम लाकर
अब महरूम हुए हाथों से गहरे रिश्ते

खिल जाते थे नैन चार होते ही जो कल
नैन मूँद बन जाते अब, अनजाने रिश्ते

बूँद-बूँद से बरसों में जो हुए समंदर
बाँध पलों में तोड़ बने बंजारे रिश्ते

हरे भरे रहते थे भर पतझड़ में भी जो
अब सावन में भी दिखते हैं सूखे रिश्ते

तकरारों में पूर्व बनी माँ, पश्चिम बाबा   
सुपर सपूतों ने कुछ ऐसे बाँटे रिश्ते

नादानी थी या शायद धन-लोभ 'कल्पना'
गाँव-गली से बिछड़ गए जो प्यारे रिश्ते


दिलों से तंग शहर के सिवा..


खुदा से माँगा मेहर के सिवा कुछ और नहीं। 
दुआएँ देती नज़र के सिवा कुछ और नहीं।

दुखा के गाँव का दिल चल दिये मिला लेकिन
दिलों से तंग शहर के सिवा कुछ और नहीं।

पिलाके नाग को पय, बाद पूज लो चाहे
मिलेगा दंश-ज़हर के सिवा कुछ और नहीं।

चमन को सींच लहू से है सोचता माली
गुलों की लंबी उमर के सिवा कुछ और नहीं।

लिया तो सौख्य नई पौध ने बुजुर्गों से
दिया है रंज-फिकर के सिवा कुछ और नहीं।

जवाबी तोहफे मिलेंगे हमें भी कुदरत से
सुनामी, बाढ़, कहर के सिवा कुछ और नहीं।

जो जानते ही नहीं, साज़, राग, उनके लिए
ग़ज़ल भी रूक्ष बहर के सिवा कुछ और नहीं।

विपन्न हैं जिन्हें दिखता हसीन दुनिया में
उदास शाम सहर के सिवा कुछ और नहीं।

कुछ ऐसा हो कि बसे “कल्पना” हरिक जन के
हृदय में प्रेमनगर के सिवा कुछ और नहीं।


खुदा से खुशी की लहर..


खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ। 
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके 
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।  

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ। 


गंध-माटी में बसी..


गंध-माटी में बसी, माँ भारती की शान है। 
गर्व-गौरव सिंधु हिन्दी, देश की पहचान है।

भाव, रस, छंदों से है, परिपूर्ण हिन्दी का सदन
जिसपे भारतवासियों को सर्वदा अभिमान है।

थामती ये हाथ हर भाषा का है कितनी उदार!
मान हिन्दी का किया जिसने, लिया सम्मान है।

गैर आए, बैर आए, टिक न पाए पैर पर
मात खा हर घात ने, वापस किया प्रस्थान है।

छद्म-छल क़ाबिज़ हुए, जड़ खोदने को बार-बार
पर मिटे हिन्दी की हस्ती, यह नहीं आसान है।    

बेल अमर हिन्दी की ये, बढ़ती रहेगी युग-युगों
कंटकों को काट जो, चढ़ती रही परवान है।     

चाहती साहित्य-सरिता, हक़ से अपना पूर्ण हक़
हर दिशा में ज्यों बहे, हिन्दी का ये अरमान है।

गौण हैं अपने वतन में, किसलिए हिन्दी के गुण?
जबकि इसका विश्व सारा, कर रहा गुणगान है।

जागते रहना है ज्यों मुरझा न जाए फिर चमन
‘कल्पना’ हिन्दी से ही गुलज़ार हिंदुस्तान है। 


जिनके मन में सच की..


जिनके मन में सच की सरिता बहती है
उनकी कुदरत भी होती हमजोली है

जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस
तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई
गुण, भावों की होती कभी न चोरी है

होते वे ही जलील जहाँ के तानों से
बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की
इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है  

बनी कौन सी सुई? सिये जो सच के होंठ
किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का
माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी
रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है



कल्पना रामानी 



  • जन्म तिथि-6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

पुस्तक चर्चा: सपने ऒर आत्म भरोसे की कविताएं: 'सरहदें' -दिविक रमेश




                             'सरहदें' (कविता-संग्रह)-सुबोध श्रीवास्तव 



    कवि सुबोध श्रीवास्तव की कविताएं गाहे-बगाहे पढ़ता रहा हूं। अपने दूसरे कविता-संग्रह 'सरहदें' की पांडुलिपि भेजते समय उन्होंने अपने पहले प्रकाशित संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' की प्रति भी भेज दी। उनके संग्रहों ऒर कविताओं को पढ़ते समय यह जानकर अच्छा लगा कि सुबोध मात्र कवि ही नहीं बल्कि एक सजग पत्रकार ऒर कहानी, व्यंग, निबंध आदि विधाओं के भी लेखक हॆं। इससे उनकी बहुविध प्रतिभा का भी पता चलता हॆ ऒर अनुभव के दायरे का भी। अच्छा यह जानकर भी लगा कि उनके पहले ही संग्रह की कविताओं ने उन्हें डा.गिरिजा शंकर त्रिवेदी, कृष्णानन्द चॊबे, डॉ. यतीन्द्र तिवारी, गिरिराज किशोर ऒर् नीरज जॆसे प्रशंसक दिला दिए। अत: कानपुर के इस कवि को प्रारम्भ में ही प्रयाप्त प्रोत्साहन ऒर स्नेह मिल गया। डॉ. यतीन्द्र ने पत्रकार होने के नाते सुबोध की सामाजिक सहभागिता को रेखांकित किया हॆ। साथ ही उनकी रचनाओं में व्यक्ति की संवेदनाओं का सार्थक साक्षात्कार भी निहित माना हॆ। तमाम कविताओं को पढ़कर एक बात तो सहज रूप में सिद्ध हो जाती हे कि इस कवि का मिजाज सोच या कला के उलझावों का नहीं हॆ। जब जो अनुभव में आया उसकी सहज ऒर सच्ची अभिव्यक्ति करने में इसे एकदम गुरेज नहीं हॆ। वस्तुत: यह कवि अपनी धुन का पकका लगता हॆ--कुछ-कुछ अपनी राह पर, अपनी मस्ती में चलने का कायल। सबूत के लिए, पहले संग्रह में उनकी  एक कविता हॆ- कविता के लिए। कविता यूं हॆ- तुम,/ अपनी कुदाल/चलाते रहो,/ शोषण की बात सोचकर/रोकना नहीं/अपने-/यंत्रचालित से हाथ/वरना,/मॊत हो जाएगी/कविता की। इस सोच के कवि के पास आत्म भरोसा, सपना ऒर कभी-कभी अपने भीतर भी झांकने ऒर कमजोरियों को उकेरने का माद्दा हुआ करता हॆ। वह झूठी ऒर भावुक आस बंधाने से भी बचा करता हॆ। यथार्थ का दामन न छोड़ता हॆ ऒर न छोड़ने की सलाह देता हॆ।यथार्थ कविता की ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हॆं-पहाड़ से टकराने का/तुम्हारा फॆसला/अच्छा हॆ/शायद अटल नहीं/क्योंकि/कमज़ोर नहीं होता/पहाड़,/न ही अकेला/ उस तक पहुंचते-पहुंचते/कहीं तुम भी,/शामिल हो जाओ/उसके-/प्रशंसक की भीड़ में। अच्छी बात हॆ कि दूसरे संग्रह तक पहुंचकर भी इन बातों से कवि ने मुंह नहीं मोड़ा हॆ।

    'सरहदें' की कविताएं नि:संदेह कवि का अगला कदम हॆ। यह संग्रह अनुभव की विविधता से भरा हॆ, लेकिन दृष्टि यहां भी कुल मिलाकर सकारात्मक हॆ। वस्तुत: कवि के पास एक ऎसी अहंकार विहीन सहज ललक हॆ, बल्कि कहा जाए कि सक्रिय जीवन की सहज समझ हॆ जो उसे लोगों से जुड़े रहने की उचित समझ देती हॆ--हमें मिलकर/ बनानी हॆ/इक खूबसूरत दुनिया/हां, सहमुच/बगॆर तुम्हारे/ यह सब संभव भी तो नहीं। इस कवि में अपनी राह या प्रतिबद्धता को लेकर कोई दुविधा नहीं हॆ-मॆं घुलना चाहता हूं/खेतों की सोंधी माटी में/गतिशील रहना चाहता हूं/किसान के हल में/ खिलखिलाना चाहता हूं/दुनिया से अनजान/खेलते बच्चों के साथ/हां, चहचहाना चाहता हूं/सांझ ढले/घर लॊटते/पंछियों के संग-संग/चाहत हॆ मेरी/कि बस जाऊं वहां-वहां/जहां/सांस लेती हॆ जिन्दगी। अनेक कविताएं ऎसी हॆं जो उम्मीद ऒर आत्मविश्वास की अलख को जगाने का काम करती हॆं। यह काम इसलिए ऒर भी महत्त्व का हो जाता हॆ क्योंकि कवि यथार्थ के कटु पक्ष से अपरिचित नहीं हॆ। मोहभंग की स्थितियों से भी अनजान नहीं हॆ। तभी न यह समझ उभर कर आ सकी हॆ -लॊट भले ही आया हूं/मॆं/लेकिन/हारा अब भी नहीं। वस्तुत:, इस संदर्भ में संकलन की एक अच्छी कविता फिर सृजन को भी पढ़ा जाना चाहिए। यह कवि सपने के मूल्य को भी स्थापित करता हे क्योंकि सपने-/जब भी टूटते हॆं/"लोग"/ अक्सर दम तोड़ देते हॆं। ऒर यह भी-उम्मीदें हमेशा तो नहीं टूटतीं।यह कवि बार बार बच्चे अथवा बच्चे की मासूमियत की ओर लॊटता हॆ क्योंकि बच्चा ही हॆ जो अपने को तहस-नहस की ओर ले जाती मनुष्यता को बचा सकता हॆ। इस दृष्टि से जब एक दिन कविता पढ़ी जा सकती हॆ। सरहदें पांच की ये पंक्तियां ऒर भी गहरे से इसी भाव को बढ़ाते हुए अपनी-अपनी, तरह-तरह की सरहदों में कॆद हो चुके मनुष्य की संवेदना को झकझोर सकती हॆं--विश्वास हॆ मुझे/जब किसी रोज़/क्रीडा में मग्न/मेरे बच्चे/हुल्लड़ मचाते/गुजरेंगे करीब से/सरहद के/एकाएक/उस पार से उभरेगा/एक समूह स्वर/"ठहरो!"/ खेलेंगे हम भी/तुम्हारे साथ.../ एक पल को ठिठकेंगे/फिर सब बच्चे/हाथ थाम कर/एक दूसरे का/दूने उल्लास से/ निकल जाएंगे दूर/खेलेंगे संग-संग/ गांएंगे गीत/प्रेम के, बंधुत्व के/तब न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें/ तब रहेंगी/ सिर्फ..सिर्फ...सिर्फ.। संग्रह की एक विशिष्टता इसमें संकलित 'सरहदें' शीर्षक से 11 कविताएं भी हॆं। कहीं- कहीं कवि दार्शनिक होकर भीतरी सत्य को उकेरता भी नजर आता हॆ, जॆसे

'अंतर' कविता में। कोमल निजी एहसासों कि कुछ कविताएं, जॆसे एहसास, इंतज़ार आदि कविताएं भी पाठकों का ध्यान खींच सकती हॆं। पाठक पाएंगे कि अपनी भाषा पर कवि कोई अतिरिक्त मुलम्मा नहीं चढ़ाता। यूं कुछ खूबसूरत बिम्ब आदि पाठक को सहज ही सहभागी बनाने में समर्थ हॆं--लेकिन/खिड़की पर/बॆठे धूप के टुकड़े से/नहाया/सफ़ेद कबूतरों का जोड़ा।

    यहां मॆंने कुछ ही कविताओं के माध्यम से पाठकों को इस संकलन के पढ़े जाने की जरूरत को रेखांकित किया हॆ। मुझे विश्वास हॆ इस संग्रह की कविताएं अपने पाठकों को अपना उचित भागीदार बनाने में समर्थ सिद्ध होंगी।

दिविक रमेश


बी-295, सेक्टर -20,
नोएडा-201301



  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये 
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन  प्रकाशन, इलाहाबाद
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

दो कविताएं-सुधीर मौर्य ‘सुधीर’


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम्हे लौटा लाएगा..


मैं जनता हूँ
तुम्हे लौटा लाएगा
एक दिन
मेरा प्रेम
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरे हाथ के
लिखे खत
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरी आँख से
झरते अश्रु

तुम्हे लौटा लाएंगी
हरसिंगार की कलियाँ
मेरे घर की
मेहंदी की महक

तुम्हे लौटा लायंगी
तुम्हारी गलियों में बहती हवा
मेरी अटारी से उड़ती पतंग
तुम्हे लौटा लाएंगे
तुम्हारी आँखों में
बसते मेरे ख्वाब
तुम लौट आओगी
इसलिए नहीं कि
मै करता हूँ तुम्हे प्रेम
इसलिए
कि मैं प्रियतम हूँ तुम्हारा।


पहेली 


मैने ख्वाबो में
ख्यालो में
लिखी हैं–अनगिनत नज़्में
होठों पे,
रुखसार और कांधो पे,
कमर और स्तनों पे
पिंडलियाँ और नितम्बों पे
चमकते हुए पाँव पे
मेरी लिखी हुई
नज़्म का
हर्फ़–हर्फ़ पढा है उसने
मेरे साथ

कभी मेरे ख्वाबो में आकर
कभी मुझे
ख्वाबो में बुलाकर

जानती हो
फिर मैं उसे
समझ नहीं पाता

नदी सी आँखों वाली
जो तुम्हारी सहेली है
मेरे लिए वो
तुमसे भी बड़ी पहेली है।


सुधीर मौर्य ‘सुधीर‘ 


  • जन्म-01/11/1979, कानपुर 
  • शिक्षा-अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा.
  • सम्प्रति–इंजिनियर, और स्वतंत्र लेखन.
  • कृतियाँ :‘आह’ (ग़ज़ल संग्रह),‘लम्स’ (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह), ‘हो न हो (नज़्मसंग्रह), ‘अधूरे पंख'(कहानी संग्रह) ‘एक गली कानपुर की’ (उपन्यास), किस्से संकट प्रसाद के (व्यंग्यउपन्यास),  अमलताश के फूल (उपन्यास), बुद्ध से संवाद (काव्यखंड)- प्रकाशाधीन, देवलदेवी: एक संघर्ष गाथा (ऐतहासिक उपन्यास ), क़र्ज़ और अन्य कहानिया (कहानी संग्रह)
  • पत्र-पत्रिकायों में प्रकाशन- खुबसूरत अंदाज़, अभिनव प्रयास, सोच-विचार, युग्वंशिका,कादम्बनी, बुद्ध्भूमि, अविराम,लोकसत्य, गांडीव, उत्कर्ष मेल,  जनहितइंडिया, शिवम्, सत्यम ब्यूरेट, अखिलविश्व पत्रिका, रुबरु दुनिया आदि में.
  • वेब प्रकाशन–गद्यकोश, स्वर्गविभा, काव्यांचल, इंस्टेंट खबर, बोलोजी, भड़ास, हिमधारा, जनहित इंडिया, परफेक्ट खबर, वटवृक्ष, देशबंधु, अखिलविश्व पत्रिका, प्रवक्ता, नाव्या, प्रवासी दुनिआ, रचनाकार, अपनी माटी, जनज्वार, आधी आबादी, अविराम
  • संपर्क-ग्राम और पोस्ट-गंज जलालाबाद, उन्नाव,पिन-209869, उत्तरप्रदेश                            
  • ईमेल-Sudheermaurya2010@gmail.com
  • ब्लॉग -http://sudheer-maurya.blogspot.com

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

डॉ. अंजना बख्शी की चार कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कविता


कविता मुझे लिखती है
या, मैं कविता को
समझ नहीं पाती
जब भी उमड़ती है
भीतर की सुगबुगाहट
कविता गढ़ती है शब्द
और शब्द गढ़ते हैं कविता
जैसे चोपाल से संसद तक
गढ़ी जाती हैं जुल्म की
अनगिनत कहानियां,
वैसे ही,
मुट्ठीभर शब्दों से
गढ़ दी जाती है
कागज़ों पर अनगिनत
कविताएं और कविताओं में
अनगिनत नक्श, नुकीले,
चपटे और घुमावदार
जो नहीं होते सीधे
सपाट व सहज वर्णमाला
की तरह!!


यादें


यादें बेहद खतरनाक होती हैं
अमीना अक्सर कहा करती थी
आप नहीं जानती आपा
उन लम्हों को, जो अब अम्मी
के लिए यादें हैं..
ईशा की नमाज़ के वक्त
अक्सर अम्मी रोया करतीं
और मांगतीं ढेरों दुआएं
बिछड़ गए थे जो सरहद पर,
सैंतालीस के वक्त उनके कलेजे के
टुकड़े.
उन लम्हों को आज भी
वे जीतीं दो हजार दस में,
वैसे ही जैसे था मंजर
उस वक्त का ख़ौफनाक
भयानक, जैसा कि अब
हो चला है अम्मी का
झुर्रीदार चेहरा, एकदम
भरा सरहद की रेखाओं
जैसी आड़ी-टेढ़ी कई रेखाओं
से, बोसिल, निस्तेज और
ओजहीन !


गुमनाम गलियों में


सुबह होते-होते
गिर जाता है ग्राफ
ज़िस्म की नुमाइश का
चढ़ने लगता है पारा
सूरज के ढल्ते ही
बाज़ार का,
रामकली की आवाज़
की खुमारी के साथ
शाम की ख़ामोशी में
कतारें हो जाती हैं
लम्बी और---लम्बी
जो बना लेती हैं
एक घेरा अपने
इर्द-गिर्द ज़िस्म की
टकराहटों के लिए
जिसमें महज़ आवाज़ें
नहीं होतीं,
एक ख़ामोश चीख
होती है, भीतर की
तहों में खनकती,
सुराख की गहराई में
सिमटती और खो जाती
इन गुमनाम गलियों में
जहां जिस्म बिकता है,
आवाज़ बिकती है,
और बिका करती है
सोलह साल की कई
रामकली और कलावतियां
आलू-बैगन की तरह होता है
मोलभाव
गिद्ध और भेड़ियों
के चबाने-खाने
और डकार लेने
के लिए!!


प्यार ऎसा होता है?


कितनी बार चाहा ऎनी
तुझे बताना..आज-कल
तुम मेरे सपनों में रोज
ही चली आती हो
अपने ’अक्षरों के साये’
के साथ,
कभी धुंए के छल्ले उड़ाती
तो कभी ’नागमणी’ के पन्ने
पलटती..
वो देखो तुम्हारा अक्स
इन दीवारों पर सजीव हो
उठा है लाल-पीला
और दूधिया रंगो से
आड़ी-तरछी रेखाएं
तुम हवा में बनाने
लगी हो
अमृता,
कभी-कभी सोचती हूं
तुम्हें और ’रसीदी टिकट’ को
क्यों नहीं समझा गया इतना
जितना कि एक सागर की
गहराई को समझा जाना चाहिए!
तुम्हारे भीतर के सागर से
कई सीप निकाले हैं
मैंने और कुछ फूल तुम्हारी
बगियां से चुन लाई हूं मैं.!!
इमरोज़ से मिलकर लगा
उस रोज,
तुम यहीं हो, उसी में ज़िन्दा
तुम्हारी सांसे, उसकी सांसों,
में महक रही हैं
नहीं जानती थी,
प्यार ऎसा होता है.

डॉ. अंजना बख्शी 


ईमेल-anjanajnu5@gmail.com

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ज्योति पर्व: मंजुल भटनागर की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


दीप जले


मन मेरा
भोलेपन से
दिवाली का दीप जलाता
त्योंहारो की डोर बाँध कर
मन ही मन यू
क्यू इठलाता
मोहित क्यों है?
दीप ज्योत से
पतंगा प्रकाश से
खुद को ही
क्यों मिटाता?
पर मेरे मन प्रागंन में
एक दीप जला जाता !

दीप जला कर
भूला मन मेरा
राग, द्वेष,विषाद
वो सब तेरा
प्रेम मन में
सदा रहें
दीपावली का रूप धरे
कष्ट पोटली सुदामा सी
देव भापते बिन कहे
लक्ष्मी बरसे,
हर कृषक पर
हर बेबस लाचारो पर
मेहमान के द्वारो पर
होएँ आनंदित बाल गोपाल
हर चौखट पर दीप जले

सत्कार करूँ में
उस लक्ष्मी को ,
जो बेटी का रूप धरे
सरस्वती ज्ञान फैलाती
ऐसी लक्ष्मी रोज वरे
अन्धकार सब मिट जाये
दीप दिलो में रोज जले

स्नेह दीप जले तो
बुझे न कोई आस
हर घर मे दीपोत्सव हो
यह सोच बनाये रखना
हर चौखट हर आँगन में
बस एक दीप जलाये रखना



अनुष्ठान


आसमां से तम नहा कर
एक मोहता छंद आया
दीप सी आस लेकर
जागता एक स्वपन आया
स्वर्ग की सीढ़ी उतर कर
दीपमालिका का अनुष्ठान आया

खिल गए सब सूरजमुखी हैं

खिल गया आसमान
खिल  गए घर चौबारे
खिल गयी चहुँ नव दिशाएँ
खिल गए उद्यान
जग गयी डूबती सी आशा
दीप पंक्ति  है क्षणिक सी
दो दिवस मेहमान

जाग गयी पग डंडियाँ हैं

जाग गए काजल दिठौने
जाग गए हैं सब संगी साथी
भर गए बाज़ार सारे
आ गयी दीपों की पंक्ति
उगा जैसे रात्रि में दिनमान


हो नया सवेरा..


घुप अन्धेरा क्षितिज पर लेटा
द्वार भोर का नहीं दीखता
सघन कालिमा पसरी जाए
पग डंडी भी नज़र ना आये
राहो को दमकाता दीपक,
राहें नयी दिखाता दीपक

लालच पसरा आतंक फैला

अनाचार ने तांडव खेला,
मनुष्यता है धूमिल हाय
राह कोई भी नज़र ना आये
सही राह दिखाता दीपक,
घर अपने पहुंचता दीपक

रिश्ते जो भी रूठ गए हैं

साथी जो  थे छूट गए हैं
मन के कोने लीप लाप कर
बरसो की धूल हटाता दीपक,
हर चौखट और देहेरी पर
फिर से दीप जलाता दीपक

एक हो मेरा एक तुम्हारा,

दीप पंक्ति से मिटे घनेरा
चाँद गगन का दीप सही
दीप धरा की मृतिका ने उकेरा
दीपावली का दीप जले तो
अज्ञान तिरोहित, हो नया सवेरा


विश्वास


जले दीप ज्योति
मन देहरी पर
बाले रखूँ
मन में ,तेरा उजास लिए

तिमिर घटे

चहुं ओर
ऐसा विश्वास
बनायें रखूँ
मन में तेरा प्रकाश लिए

आँधियों से भी

बुझे नही
दीप अनवरत जले
जगता रहे
झंझावात में
टपकती बरसात में
छप्पर छवाए रखूं
एक तेरा संबल लिए

टिमटिमाते तारें

हुए तिरोहित
अमावस की इस गहन रात्रि में
धन लक्ष्मी का दीप जले,
मन में प्रभु विश्वास लिए ..

क्षणिकाएं


(एक)

अमावसी रात में
दीप तुम हो दिव्यार्थ
दीप है घर पाहुना
देता नूतन प्रकाश
सुन्दर किसलय संग
अंबुज पर
माँ लक्ष्मी का वास
दीप जले अनवरत
हर ओर हो
माँ लक्ष्मी का वास .

(दो)

दीप पुरुष है
दीप है प्रकृति
मिटटी पानी की देह रची
ज्योति दीप की
प्राण गति
दीप मनु है
बात्ती इरावती
दीप वेदों की है अनुकृति।

(तीन)

दीप पर्व है
दीप है गति
दीप स्वर्ग की है स्वीकृति
अन्धकार में
बन कर्मरत
दीप जलाये रखना
हर चोखट चोराहों पर
उजड गए जो
उन दरियारों पर
एक दीप जलाये रखना
एक आस जगाए रखना

(चार)

आँधियों से भी
बुझे नही

दीप अनवरत
जलता रहे
भीषण झंझावात में
पथ दिखाता  रहे
टपकती बरसात में भी
बुझे  नहीं कोई आस
द्वार ,छप्पर बंधे रहे
दीप तेरा आलोक फैले
मन में तन में
दीप्त हों दिशाएं अज्ञान छ्टे।


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

ज्योति पर्व: उम्मीद की लौ-सुशीला शिवराण


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


रखना एक दिया..


इस दिवाली पर
रखना एक दिया
अंधे मन के आले में
कि हो कुछ उजाला
देख सकें 
मसली-रौंदी कलियों की लाशें
वहशत के अँधेरों के पार
हवस की अंधी आँखें
रखना एक और दिया
अकाल से बाँझ हुए
बंजर खेतों में

कि किसानों के साथ
गिरवी हर ईंट
अधमरी बहू-बेटियाँ
देख सकें कुछ उम्मीद
क़र्ज़ के नीम अंधेरों के पार
कि थम जाए
हताश ज़िंदगियों की
आत्महत्या का सिलसिला
एक दिया
जात-पाँत की उन्मादी
अँधी गलियों में भी रखना
जो सुरसा बन 
निगल जाती हैं
कभी कुलबर्गी
कभी अख़लाक़
कभी गोधरा
कभी भागलपुर को
रखना दीयों की कतार
जगमग राजपथ पर
कि अँधी सियासत
देख सके दीयों में
देश की माटी
कुम्हार का पसीना
मुनिया के सपने
मुल्क़ की तक़दीर
शायद !

देखो ! तुम हारना नहीं
घुप्प अँधेरों में
उम्मीद की लौ
जलाए ही रखना 
रखोगे ना !


फैले जग उजियार..


देहरी दीपक जल रहा, मन में तम का द्वार।
मन-अँधियारा दूर कर, फैले जग उजियार।।

शम्मा से कहने लगी, रौशन हर कंदील।
आ अब ग़म को कर चलें, ख़ुशियों में तब्दील॥

दीया-बाती-रोशनी, दुनिया करती बात। 
तिल-तिल जलता तेल है, सारी-सारी रात॥

दीपक-सी पावन सजन, तेरी-मेरी प्रीत।
देख हवा भी तेज़ है, तेल न जाए रीत॥


सुशीला शिवराण


बदरीनाथ–813,
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,
गुड़गाँव–122011
दूरभाष–09873172784
ईमेल-sushilashivran@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख-ऋषभदेव शर्मा




मनुष्यों द्वारा विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के शास्त्र को भाषाविज्ञान कहा जाता है. सामान्य भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा के उद्भव और विकास पर विचार किया जाता है. सैद्धांतिक भाषाविज्ञान भाषा अध्ययन और विश्लेषण के लिए सिद्धांत प्रदान करता है. वह मूलतः इस प्रश्न पर विचार करता है कि भाषा क्या है और किन तत्वों से बनी हुई है. इसके चार क्षेत्र हैं – ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी से आगे बढ़कर विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयुक्त हो रहा है और भाषा-उपभोक्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान विकसित हुआ है. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा शिक्षण, शैलीविज्ञान, कोशविज्ञान, भाषा नियोजन, वाक् चिकित्सा विज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुवादविज्ञान आदि अनुप्रयोग के क्षेत्र शामिल हैं. हिंदी में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संक्रियात्मक भूमिका पर केंद्रित गंभीर पुस्तकों का लगभग अभाव-सा है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ (2015) इस अभाव की पूर्ति का सार्थक प्रयास प्रतीत होती है.

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ में कुल 29 अध्याय हैं जो इन 7 खंडों में विधिवत संजोए गए हैं – अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श (शैलिवैज्ञानिक विश्लेषण), प्रयोजनमूलक भाषा, समाजभाषिकी और भाषा विमर्श में अनुप्रयोग. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अग्रणी विद्वान प्रो. दिलीप सिंह का निम्नलिखित कथन इस पुस्तक की प्रामाणिकता का सबसे अधिक विश्वसनीय प्रमाणपत्र है –पुस्तक का प्रत्येक खंड एवं संबद्ध आलेख बड़ी ही तन्मयता के साथ लिखे गए हैं. इस तन्मयता का ही परिणाम है कि हिंदी भाषा के साहित्यिक और साहित्येतर पाठों के विश्लेषण में यह सफल हो सकी है और इस तथ्य को उजागर कर सकी है कि कोई भी भाषा (इस अध्ययन में हिंदी भाषा) अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों और प्रयोजनों में अलग-अलग ढंग से बरती ही नहीं जाती, बल्कि भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होते समय अपनी अकूत अभिव्यंजनात्मक क्षमता को भी अलग-अलग संरचनाओं में ढाल कर अलग-अलग तरीकों से सिद्ध करती है.

लेखिका ने पहले खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के स्वरूप और क्षेत्र पर सैद्धांतिक चर्चा की है. इसके बाद दूसरे खंड में मातृभाषा, द्वितीय भाषा और अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर चर्चा की है. तीसरे खंड में अनुवाद सिद्धांत, अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन पर सोदाहरण प्रकाश डाला गया है. पुस्तक का चौथा खंड साहित्यिक पाठ विमर्श के लिए शैलीविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है. यहाँ एक निबंधकार (प्रताप नारायण मिश्र), एक उपन्यासकार (प्रेमचंद) और दो कवियों (शमशेर तथा अज्ञेय) के साहित्यिक पाठ निर्माण, बनावट और बुनावट का विश्लेषण किया गया है. यह खंड पाठ विश्लेषण के क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए विशेष उपयोगी है. पाँचवे खंड में अखबारों से लेकर टीवी तक विविध संचार माध्यमों द्वारा समाचार से लेकर प्रचार तक के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली हिंदी भाषा के लोच भरे गंभीर और आकर्षक रूप की सोदाहरण मीमांसा की गई है. इसके पश्चात छठा खंड समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित है. जहाँ एक ओर तो सर्वनाम, नाते-रिश्ते की शब्दावली, शिष्टाचार, अभिवादन और संबोधन शब्दावली पर हिंदी भाषासमाज के संदर्भ में तथ्यपूर्ण विमर्श शामिल है तथा दूसरी ओर दलित आत्मकथाओं और स्त्री विमर्शीय लेखन की भी गहन पड़ताल की गई है. यह खंड साहित्य पाठ विमर्श वाले खंड के साथ मिलकर पाठ विश्लेषण के विविध प्रारूप सामने रखता है. पुस्तक का अंतिम खंड है – ‘भाषाविमर्श में अनुप्रयोग’. यहाँ विदुषी लेखिका ने महात्मा गांधी, प्रेमचंद, अज्ञेय, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, विद्यानिवास मिश्र और दिलीप सिंह जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों के भाषाविमर्श पर सूक्ष्म विचार-विमर्श किया है. इतना ही नहीं यह खंड इन भाषाचिंतकों के भाषाविमर्श की केंद्रीय प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करता है. लेखिका ने प्रमाणित किया है कि महात्मा गांधी के भाषाविमर्श के केंद्र में संपर्कभाषा या राष्ट्रभाषा का विचार है, प्रेमचंद के भाषाविमर्श में सर्वाधिक बल हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी जैसी साहित्यिक शैलियों के रचनात्मक समन्वय पर है तो अज्ञेय का भाषाविमर्श उनकी साहित्यिक शैली के प्रति जागरूकता के इर्दगिर्द निर्मित होता है. प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव को डॉ. जी. नीरजा ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के सजग प्रहरी सिद्ध किया है तो विद्यानिवास मिश्र को आधुनिक भाषाशास्त्रीय चिंतन की पीठिका का भारतीय संदर्भ खड़ा करने का श्रेय दिया है. उनके अनुसार दिलीप सिंह का भाषाविमर्श अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संपूर्ण पड़ताल के लिए कटिबद्ध और प्रतिबद्ध है. उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रो. दिलीप सिंह को ही समर्पित भी है.

अंत में, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के आचार्य डॉ. देवराज के शब्दों में यह कहना समीचीन होगा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर भरपूर सामग्री तैयार की है जो अन्य लोगों के लिए रचनात्मक स्तर पर चुनौती बना हुआ है. उनकी अध्ययनशीलता और संकल्पशीलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ!

  • पुस्तक-अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख
  • लेखिका-गुर्रमकोंडा नीरजा
  • पृष्ठ-304
  • मूल्य–रु. 495/-
  • प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रो. ऋषभदेव शर्मा


(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा)
208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स
गणेश नगर, रामंतापुर
हैदराबाद–500013
मोबाइल– 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की चार बाल कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

   

    रैन बसेरा

 
    नाम रखा है रैन बसेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।

   नीचे धरती ऊपर छप्पर,
   घर दिखता है कितना सुन्दर।

   बैठक खाना रम्य मनोहर,
   खिड़की पर परदों की झालर।

   सोफा सेट गद्दियों वाला,
   बिछी हुई सुन्दर मृग छाला।

   कोने में सुन्दर गुलदस्ते,
   दरवाजों पर परदे हँसते।

   है घर में खुशियों का डेरा,
   दो मंजिल का घर है मेरा।

   शयन कक्ष भी तीन बने हैं,
   परदे बहुत महीन लगे हैं।

   बड़े पलंगों पर गादी है,
   चादर बिछी स्वस्छ सादी है।

     शिवजी की होती हर हर है,
    यह दादी का पूजा घर है।

    जहाँ रामजी लड्डू खाते,
    कृष्ण कन्हैया धूम मचाते।

    सबको सबसे प्रेम घनेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।

    इस कमरे में दादी दादा,
    उच्च विचार काम सब सादा।

    सभी दुआएं लेने आते,
    दादी दादा झड़ी लगाते।।

    बच्चे धूम मचाते दिन भर,
    भरा लबालब खुशियों से घर।

    दादाजी के लगें ठहाके,
    लोट पोट हैं हंसा हंसा के।

    कण कण में आनंद बिखेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।
           

पलकों की चादर


थपकी देकर हाथ थक गए,
लजा लाज कर लोरी हारी।

तुम अब तक न सोये लल्ला,
थककर सो गई नींद बिचारी।


वृंदावन के कृष्ण कन्हैया ,
देखो कब के सो गए भैया।
पर तुम अब तक जाग रहे हो,
किये जा रहे ता ता थैया।

कौशल्या ने अवधपुरी में,
राम लखन को सुला दिया है।
गणपति को माँ पार्वती ने,
निद्रा का सुख दिला दिया है।

हनुमान को अंजनी माँ ने ,
शुभ्र शयन पर अभी लिटाया।
तुरत फुरत सोये बजरंगी,
माँ को बिलकुल नहीं सताया।

सुबह तुझे में लड्डू दूंगी,
बेसन की बर्फी खिलवाऊं।
पर झटपट तू सोजा बेटा,
तू सोये तो मैं सो पाऊं।

अगर नहीं तू अब भी सोया,
तो मैं गुस्सा हो जाउंगी।
और इसी गुस्से में अगले ,
दो दिन खाना न खाऊँगी।

इतना सुनकर लल्ला भैया,
मंद मंद मन में मुस्काये।
धीरे से अपनी आँखों पर,
पलकों की चादर ले आये।


                         

       लाइलाज बीमारी


         बन्दर मामा शिक्षक बनकर,
         शाळा गए पढ़ाने।

         भूल पढ़ाना बच्चों से वे,
         गप्पें लगे लड़ाने।

        तभी अचानक हेडमास्टर ,
        भालूजी आ धमके।
        बन्दर की ऐसी हरकत पर,
        गरज गरज कर चमके।

        बंदर  ने इक डिब्बा खोला,
        शहद वहां बिखराई।
        भूल डांटना, व्यस्त हो गए,
        उसमें भालू भाई।
      
        यही व्यवस्था शालाओं की,
        तब से  अब  तक जारी।
        शहद गिराना, शहद चाटना,
        लाइलाज बीमारी।


  हथनी दीदी


  हथनी दीदी बैठ रेल में,
  निकल पड़ीं भोपाल को।
  धुम चुक धुम चुक बजा रहीं थीं,
  अपने सुन्दर गाल को।

   तभी अचानक टिकिट निरीक्षक,
   बोला टिकिट कहाँ ताई।
   हथनी बोली टिकिट मांगकर,
   तुमको शरम नहीं आई।

   टिकिट केंद्र है इतना छोटा,
   सूंड नहीं घुस पाई थी।
   अरे! निरीक्षक जी इस कारण,
   टिकिट नहीं ले पाई थी।

   पहले  तो तुम ,जाकर खिड़की,
   खूब बड़ी करवाओ।
   उसके बाद निरीक्षक भैया,
   टिकिट मांगने आओ।


प्रभुदयाल श्रीवास्तव



  • जन्म : 4 अगस्त, 1944 धरमपुरा दमोह {म.प्र.)।
  • शिक्षा : वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि।
  • संप्रति : सेवानिवृत कार्यपालन यंत्री म.प्र. विद्युत मंडल छिंदवाड़ा से।
  • लेखन : विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानियाँ, कवितायें व्यंग्य, लघु कथाएँ लेख, बुंदेली लोकगीत, बुंदेली लघु कथाएँ, बुंदेली गज़लों का लेखन।
  • प्रकाशन : लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग-बेरंग में प्रकाशन, दैनिक भास्कर, नवभारत, अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस, पंजाब केसरी एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्यों का प्रकाशन, कविताएँ बालगीतों क्षणिकाओं का भी प्रकाशन हुआ। पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली, शुभ तारिका अंबाला, न्यामती फरीदाबाद‌, कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन, मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित। 
  • कृतियाँ : दूसरी लाइन (व्यंग संग्रह), बचपन छलके छल छल छल (बाल गीत), बचपन गीत सुनाता चल (बाल गीत)।
  • प्रसारण : आकाशवाणी छिंदवाड़ा से बालगीतों, बुंदेली लघुकथाओं एवं जीवन वृत पर परिचर्चा का प्रसारण।
  • सम्मान : राष्ट्रीय राज भाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती रत्न" एवं "भारती भूषण सम्मान"; श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान, वैदिक क्रांति देहरादून एवं हम सब साथ साथ पत्रिका दिल्ली द्वारा "लाइफ एचीवमेंट एवार्ड"; भारतीय राष्ट्र भाषा सम्मेलन झाँसी द्वारा "हिंदी सेवी सम्मान"; शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम, होशंगाबाद द्वारा "व्यंग्य वैभव सम्मान"; युग साहित्य मानस गुन्तकुल आंध्रप्रदेश द्वारा काव्य सम्मान।
  • संस्था संबद्धता : अध्य‌क्ष‌ बुंदेल‌खंड‌ साहित्य‌ प‌रिष‌द‌, भोपाल‌, छिंद‌वाड़ा जिला इकाई के अध्य‌क्ष‌।
  • विशेष : बुंदेली लोक गीत, गज़लें, बुंदेली साहित्य पर लेख। वर्ष 2009 में साहित्य अकादमी दिल्ली में आयोजित बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल के कार्यक्रम में रवींद्र भवन दिल्ली में बुंदेली की दक्षिणी सीमाएँ विषय पर आलेख का पाठन। 
  • ईमेल : pdayal_shrivastava@yahoo.com

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय की दो कविताएं


अवधेश मिश्र की कलाकृति



कोशिश


मेरी कोशिश है-
शब्द अब नए अर्थों से सँवर जायें
लोग विध्वंस, चीख, धोखा और विवशता के अर्थ भूलकर
निर्माण, हँसी, विश्वास और सहजता की चर्चा करें।

मेरी कोशिश है-
लोगों के मुख से आशीषों के शब्द निकलें 
कबीर का जीवन जीकर लोग मीरा सा प्रेम करें।

मेरी कोशिश हैं-
बची रहे झरनों की शीतलता और नदियों की लहरें
शिशुओं की किलकन और गायों के मधुबन।

मेरी कोशिश है-
लोगों में ईसा जैसा सेवा का भाव हो
बदले में चाहे सलीबों की राह हो
हर एक कदम पर मानवता की जीत हो
होंठों पर सबके जीवन के गीत हों।


अभिलाषाएँ


चाहूँगा मैं फूलों से बन पराग बिछ जाना 
कलियों से थिरकन को लेकर पत्तों सा हिल जाना। 

उड़ता जाऊँ नील गगन में मन की यह अभिलाषा
माटी से जुड़कर बुझ पाए मन की गहन पिपासा। 

पतझड़ और तपन आकर भी गीत ऐसा गा जाए
स्वर कोयल का राग भ्रमर का जीवन गीत सुनाए। 

काँटे समझ भले ही अपने अन्त समय तज जायें
फिर भी सबके रक्षा की अभिलाषाएँ मिट ना पायें। 


डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय



  • जन्म-1 जुलाई 1962 को चन्दौली जिले के एक गाँव फुलवरिया में।
  • शिक्षा-काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद 'हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में द्वंद्व' विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया।
  • रचना कर्म-कविता, समीक्षा, निबंध, एकांकी लेखन।
  • प्रकाशन-‘व्याकरण कौमुदी‘ कक्षा एक से लेकर आठ तक की कक्षा के लिए व्याकरण की पुस्तक। प्राईमरी शिक्षक, शिराजा, कहानीकार, साहित्य दर्पण, साहित्य मंजरी, संगम, व्यंजना प्रज्ञा, विविध भारत, सृजन और अभिव्यक्ति आदि पत्रिकाओं में निबंध समीक्षा एवं कविताएँ प्रकाशित। इसके अतिरिक्त नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वतंत्र मत, जे वी जी  टाइम्स आदि समाचार पत्रों में आलेख समीक्षाएं एवं कविताएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी अम्बिकापुर, रीवा एवं जबलपुर से कविताओं और चिंतन का प्रसारण।
  • सम्प्रति-स्नातकोत्तर शिक्षक (हिन्दी), केन्द्रीय विद्यालय, भुसवाल, ज़िला जलगाँव, महाराष्ट्र।
  • सम्पर्क-upadhyayhn@yahoo.com