रविवार, 4 जनवरी 2015

पुष्पराज चसवाल की दो कविताएं




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



रहस्यमय सत्ता 



अकेले नितांत अकेले अविराम
सागर के असीम विस्तार से आगे
आकाश के कलपनातीत ऊंचाई से परे
क्षितिज के पारदूर सुदूर तक
उसके आर-पार सौरमंडल में घूमती
अंतरिक्ष में झूलती भव्य धरा की
आकर्षण सीमा से आगे
लम्बा बहुत लम्बा सफर तय किया मैंने
         किन्तु तुम्हारी रहस्यमय सत्ता के
         अनोखे जादुई रूप के विराट दृष्य से
         वंचित रहा,
यहाँ तक वंचित रहा रहा हूँ मैं
की संभवतः युगों-युगों तक
मेरी यह कालातीत यात्रा
अधूरी ही रहेगी, निरंतर अधूरी
        कौन जाने मेरी इस युगीन यात्रा का
        सतत अधूरापन ही कहीं
        'वह' अंतिम सत्य न हो
जो होने न होने के युगीन द्वंद्व की
शाश्वत त्रासदी के कालांतर में
झेलते हुए अनायास ही
सम्पूर्ण सत्य के नैसर्गिक उद्घाटन का
विहंगम अवलोकन कर सके
और उस कालजयी मार्मिक क्षण की
दिव्यता को निमिष भर निकट हो सके,
जिसकी अक्षुण्ण सत्ता के कारन
इस विराट सृष्टि की व्यापकता एवं सार्थकता
अक्षत है, अनुपम है, अपरिमित है।



क्षण का आकर्षण 



धूप खिली खो गयी
शिखर पे इतराते क्षण का
आकर्षण कब हो सका
दीर्घ स्थायी,
उम्र-भर
संचित निधि पाने
की प्रतीक्षा क्या करते हो
उपहास जन्य प्रयास करते हो!
'अमरत्व कभी
सुदूर अज्ञेय से नहीं जन्मा
-न जन्मेगा
गंगा शिव की जटाओं में नहीं
भगीरथ के श्रम में
प्रतिक्षण-क्षणांश की सीमा तक
प्रवाहित है।
क्षण-वर्तमान क्षण ही
श्रम से तपा-निखरा क्षण
ही परन्तप सत्य है
पूर्णकालिक समाहित सत्य।


पुष्पराज चसवाल

संपादक,
'अनहद कृति' त्रैमासिक ई-पत्रिका
(www.anhadkriti.com)
ईमेल: prchaswal@gmail.com

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