सोमवार, 12 जनवरी 2015

साधक व अन्य कवितायें-मंजुल भटनागर




कलाकृति:अजामिल




साधक



निर्जन सा मन
कोहरा पहन
मिलता है प्रेम बांचती धरा से
ओस पड़ी थी रात बहुत
हवाएं सनसनाती थी
पक्षियों के डेनो पर
बैठ सवेरा सोता रहा.

नदी को कुछ कहना था
नाव सी मुस्कराहटें लिए
आस तैरती रहीं
नदी मझधारे चली
डूबने का खौफ लिए.


भीगी सी पगडण्डी
अलसाई घास
रास्तों के पत्थर
चल रहे थे साथ साथ

दूर पहाड़ी से
बांसुरी की धुन
मौन ,साधक बन
सब कुछ गुन रहा था .



प्रेम के स्त्रोत



स्वप्न कभी सो जाएँ
सूख जाएँ प्रेम के स्त्रोत
नदी जंगल सभी तरफ हो आग
बुझाने को न हो जल
न बादल
तब भी छाँव ,कस्तूरी मृग सी
जल है या कहीं मृगतृष्णा
बुझा देती अग्नि ,ताप
मृग मारीचिका सी प्यास .

रिश्ते जब धुंध से हों
कुछ दीखता न हो
धूम्र रेखा सा अस्तित्व
खंडित सा हो मन
फिर भी हाथ खुले तो बदली की एक बूंद भी
देती है कुछ जीने की आस.

धूप जलती हुई है
हवा नासाज़, बहती हो
लेकिन दूर.....चलती हुई
जलती सड़क पर
सड़क की सतह पर
पानी सा झिलमिला रहा है
जैसे सहरा का मिराज़
पर ओस चाटने से
क्या बुझी है किसी प्यासे की प्यास .



नावें



पानी की सड़क
चप्पू से चलती नावें
संगीत सा झंकृत
पैदल पैदल चलती नावें .


जीवित पेड़ की
काठ की मुर्दा नावें
ले चलती कितनी  यादों को समेटे
इस पार से उस पार नावें


पानी कम हो
पहरुए सवार हों
ठेलती हैं दूर तक
कितनी बोझिलता ढोती  नावें

मझदार में फंस जाये कभी
तुफानो से भी लड़ जाती हैं नावें
काठ की सही कभी
दोबारा पेड़ बन जाती हैं नावें




प्रणय प्रसंग



रंग उड़े बयार में
खुशबू हरसिंगार
टेसू मन  रंग गए
पत्ते बंदन वार

ओढ़े चुनर थी ठगी
सरसों बारम्बार
खेत खलिहान रंग गए
मलयानिल बौछार .

फाग नहाई रुत हुई
जीवन जगा बसंत
पिया मिलन की आस में
चकवी उड़ी दिगंत .

द्वार सजाने आ गए
बाल गोपाल  अनंग
बसंत भेज सन्देश तो
मन में बजे मृदंग  .


टेसू तन मन भिगो रहे
गुलाल अबीर कपोल सजे
आज बुनेगा प्रेम कोई
नूतन प्रणय प्रसंग .



मनुहार



मेघा कब बरसोगे
नदी व्याकुल सी
झील मंद सी मौन
खेत ,आँगन ,मोर नभ निहारे
कब भरेंगे सुखन मनस सारे
कब मन हर्षोगे
मेघा तुम कब बरसोगे ?
नगार्जुन के प्रिय
देखा तुम्हें बरसते
विंध्याचल के द्वारों पर
देखा दूर हिमालय पर
मलयानिल झोंको से मेरा आंगन
तुम कब सरसोगे
मेघा तुम कब बरसोगे?

कालिदास के मेघ दूत
विरह सिक्त पावक प्रतीक्षा रत
नभ गवाक्ष से झांक रहे तुम
ले अगणित जल संपदा
गुजर रहे सजल तुम द्वारिका से
मेरे द्वार कब छलकोगे
मेघा तुम कब बरसोगे.

दया निधि बन जाओ
कृषक  प्रतीक्षा रत
बरसा जाओ नभ कंचन
महकेगा  खेत प्रागंन
आह्लादित होगा धरणी का तन मन .


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।

2 टिप्‍पणियां:

  1. कविता की कार्यशालाओं में इन कविताओं का पाठ होना चाहिए....

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  2. कवि
    कविताओँ को
    पलकोँ पर
    सदा ही सजाकर
    रखते आया हैँ।
    इन कविताओँ का तो
    रसास्वादन करना
    अपने आप मेँ
    एक अद्भूत अनुभूति हैँ।
    अनुभूति तो फिर
    अनुभूति हैँ।

    उत्तर देंहटाएं