शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

दस्तक: दो कविताएं-मनोज कुमार




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



स्त्रियाँ 



स्त्रियाँ जनती है स्त्रियाँ...
मार दी जाती है अनगिनत स्त्रियाँ
स्त्रियों की ही कोख में,
स्त्रियों कि देखरेख में,
पुरुषों के समाज में,
पुरुषों के ही कुनबो को आगे बढ़ाने वाली
स्त्रियाँ मार दी जाती है !

अपनी माँ की कोख में ...
अपने पिता की जानकारी में,
जिनकी वो रानी बेटी होती,
जिनकी वो सोन चिरैया होती,
जिनके वो जीना का सहारा होती
मार दी जाती है स्त्रियाँ ....
स्त्रियों की ही कोख में !

किसी बाप की वो दुलारी होती,
किसी भाई की राखी होती,
किसी पति की पत्नी होती,
फिर उसी के बच्चे की माँ होती ...
पर फिर भी मार दी जाती है
अनगिनत स्त्रियाँ कोख में ही ...

वो स्त्रियाँ जो समाज की -
जननी है,
परिवार की धुरी है,
पुरुषों की लोरी है,
उनके जीवन की डोरी है.

मत मारो जो प्यार का प्रतीक है,
मत छीनो जो परिवार की रौनक है,
मत छलो उसे जो -
बल, बुद्धि, धन की देवी है ...
ये तुम्हारी किस्मत है
की वो तुम्हारे घर जन्म लेती है
संवार देती है तुम्हारा आँगन.



मोहब्बत 



जाने कैसे लोग नफरत के लिए
समय निकाल लेते है ?
हमे तो मोहब्बत से ही
फुर्सत नहीं मिलाती है !
कोई पूंछता है तो हम कह देते है -
नफरत आपके यहाँ होगी,
हमारे घर मोहब्बत बसती है...
हमारे घर मोहब्बत बसती है I


मनोज कुमार

सीनियर मैनेजर मैकेनिकल (निरीक्षण),
जॉर्डन इंडिया फर्टिलिज़र कंपनी,
जोर्डन।
फोन: +962 788293431/ 790219472
ईमेल: manojkumar@jifco.co

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