मंगलवार, 20 जनवरी 2015

डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प' की दो कविताएं



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


शब्द 



शब्द आदि से ही धरोहर हैं
किन्हीं प्रदत्त अर्था की
जिन्हें अक्षर-अक्षर बुना था
अबूझे, अचीन्हे ब्रह्म ने।
ब्रह्म! या फिर
अक्षर है वह स्वयं ही
और निराकार भी
उस अनाम अचीन्हे को कहा ढूंढे कविता,
ताकि
अर्थ सीखचों में कैद छटपटाते शब्दों को
नई अभिव्यक्ति दे
मुक्त करवा सकें,
खुले आसमान पर अंकित
व निर्वसना धरा पर बिछी सभ्यता को,
आदर्शों-आश्वासनों के
सही मायने समझा सकें।
लीक से हट कर
कुछ नैसर्गिक उद्भावना कर सकें
ऐसी उद्भावना जिससे
खुले आसमान और
निर्वसना धरती पर बिछी सभ्यता को
दिशा मिले सही सही।    



जीवन-संध्या 



जीवन की संध्या उसे
किसी अन्धेरी गुफ़ा में
धकेलने को आतुर
प्रतिक्षण चली ही आ रही थी।
और वह
किन्हीं चिराग़ों की टोह में
अपनी मोतिया-बिन्द भरी आंखों को
और-और फैलाती
बढ़ते अन्धेरे को काटने के
अथक प्रयास करती रही।

उसकी आशा के चिराग़
किसी तेल-घी के नहीं थे मोहताज
स्निग्ध-स्नेह की मोहमयी बाती से
दिपदिपाते थे।
सुख-दुःख के झोंकों से
बुझती-जगती, बढ़ती-घटती लौ
तन्मय हो नाचती गाती-सी
पूरी रात का अन्धेरा
काटती रही थी।

अब जब आंखें उसकी
धुंआले गुब्बार में डूब गई हैं
और हड्डियों में रेंग जाती हैं
असहनीय दर्द की उद्वेलित लहरें
आवाज़ें बहरे जंगलों से होकर आती हैं
मानो पत्थरों पर
सिर पटकती बौखलाई हुई-सी,
तो ऐसे में वह
स्निग्ध स्नेह को
कहां से ढूंढ निकाले।



डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प' 


संपादक,
'अनहद कृति' त्रैमासिक ई-पत्रिका
(www.anhadkriti.com)
ईमेल:chaswalprempushp@gmail.com

1 टिप्पणी:

  1. अति प्रेरणादाई सृजन के लिए आप को बहुत बधाई /सादर

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