शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

तुम्हारी याद व अन्य कविताएं-संगीता सिंह ''भावना''




अजामिल की कलाकृति





तुम्हारी याद



एक मौन,
जो समाया है मेरे अंतर्मन में
यूं ही कभी चित्कारता है और
तुम्हारे आसपास होने की साजिश करता है
तुमसे बातें करने के बहाने ढूँढता है
तुम्हारी यादों को खुद में समाने की ,
पुरजोर कोशिश करता है...
पर दुर्भाग्य का खेल देखो ,,
तुम्हारे आसपास जो अनगिनत
जाल से बने हैं
मुझे रोक लेते हैं तुम्हारे पास होने से
तुम्हारे शब्दों को मूक बांध लिए हैं
अपने सुखद एहसासों में,
और साथ ही तुम्हारी यादों में
जमाय बैठे हैं खुद का डेरा .....
अब तुम्हीं बताओ कितना मुश्किल है
यूं तुमसे मिलना ,
बातें करना और तुम्हें अपनी
यादों में बसाना .......
पर,,अडिग है मेरा प्यार जो न कभी
सहमा है , रूका है और  न ही थका है
हाँ ,,एक सत्य जरूर है तुम्हारी
रूसवाइयों से थोड़ा डरता है .......!




जीवन का विस्तार 



समय के आकाश में तुम
जगमगाते तारों सा..
विश्वास और प्रेरणा की
अनुपम सौगात
मन की अन्तरिम गहराइयों में ,
तुम्हारे चंद शब्द
अपने समय और अपने जीवन को निहारती
थोड़ी अधीर सी मैं
जब भी खुद को तलाशती हूँ
तुम्हारे इर्द-गिर्द
पाती हूँ प्रेरणा के असंख्य सूत्र
जहां से अपने ही जीवन के अनन्य
प्रतिबिम्ब दिखते हैं
रूपान्तरण की अनंत संभावनाएं जब
जगमगाती हैं.
सोचती हूँ जीवन का विस्तार हो चला है..!!!



सतरंगी छ्टा



खिलेंगे फूल कभी
अपनी भी बगिया में
बिखरेंगी खुशबू
बनकर सुखद एहसास
निकलेगी धूप भी
धून्ध से छँटकर एक दिन
खिल उठेंगे ,
सिले सिले दिन भी कभी
रिश्तों की सूखी बगिया में
जब आएंगी मंजर
बहार के
घर -आँगन के मुंडेर पर
चहकेंगे पक्षियों का झुंड भी
और साथ ही ,,
निखर जाएगी सतरंगी छटा
इंद्रधनुष का
कट जाएगी यूं ही
ज़िंदगी मेरी ,
मौसम के भयावह तूफान से
मिल जाएगी मंजिल
हौसलों की ऊंची उड़ान से
और छू लेंगे हम भी कभी
सतरंगी आसमान को..!



संगीता सिंह ''भावना''


सह-संपादक.
''करुणावती साहित्य धारा' (त्रैमासिक),
वाराणसी।
ईमेल-singhsangeeta558@gmail.com

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