बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

सजन मुरारका की कविताएं



विनोद शाही की कलाकृति



मन की गति-प्रकृति



मन की गति-प्रकृति
जल-प्रपात की जल-धार
बहे इधर-उधर
कभी तेज,कभी मंथर
मन की गति-प्रकृति
जल भरे बादल
गरजे या बरसे
मुसलाधार या रिम-झिम
कढ़के जोर से
मन की गति-प्रकृति
स्थिर पर्बत स्तर
कठोर और,बेजान,
उपजे जिस में
पत्थर,त्रिन या तरुवर
मन की गति-प्रकृति
निर्मल, कोमल- पवन
झंझावत या मन्द
उन्मुक्त, स्वाधीन
देती विनाश और जीवन
मन की गति-प्रकृति
सर्वभूक ज्वाला
दहन, तपन और जलन
जलाये,करे भस्म
निर्लिप्त,निर्मम जले अगन
मन की गति-प्रकृति
फ़ैली हुई भूमि या मैदान
बंजर या उपजाऊ
कांटे,फुल,खेत-खलियान
वन-उपवन या रेगिस्थान
जल,बादल और पर्वत
हवा, अग्नि और भूमि
और न जाने दिखें सर्वत्र
भिन्न रूप,आधार-आकृति
आचरण मे एक सी प्रवर्ति
दिखे मन की गति-प्रकृति



तेरी यादे



मयखाने में साकी सी
आँगन में तुलसी सी
गीता की वाणी सी
बरगद की छाया सी
सावन की बारिस सी
शीतल हवा पुरवाई सी
बगिया की अमराई सी
गंगा की लहर सी
बसन्त की सुरभि सी
सागर की गहराई सी
हिमालय की ऊँचाई सी
बगीचे की हरी दूब सी
नभ में छाये बदल सी
फूलों की क्यारी सी
मृग में छिपी कस्तूरी सी
पूनम में चांदनी सी
रंगों में इन्द्रधनुष सी
मेरे में हिम शिला सी
चुभ जाती है काँटों सी
मौत मे जीने की चाहत सी
यादे साथ रहती परछाई सी



पाती प्रेम की 



शब्द शब्द हैं मुखर
नेह अनुवादों की
अक्षर अक्षर गमक रहा
सुगंध देह की
स्याही महकी यादों की
फ़ैल गई
सुरभि अन्तरमन की
मन बहके
खुशबु सोंधापन की
सजल है नयन
है पाती प्रेम की



स्वप्न बुनना 



जब देखता हूँ --
बिछोने पर बैठी,
हज़ारों फंदे डाल,
बेटे के लिये,जाड़े मे,
क्रोशिए से स्वेटर बुनते;
सोचता हूँ,बुनती ही क्यों?
बुनती भी हो तो क्या-
स्वेटर या प्यार......!
कोई प्यारा सा सपना,
या भरती होगी रिक्तता,
बुनती होगी स्वयं के अरमान;
तुम्हारे शिथील हाथों से,
धुन्दली नज़र एनक की,
विक्षिप्त दर्द या वेदना,
समेटती चली आती होगी,
मुख-मंडल पर उत्साह लिये,
अंदर को छिपाकर,
उँगलियों चलती गति मे;
वैसे ही कुछ कहे बिना,
घर की दीवारों को ताककर;
आँचल मे मुहं डापकर,
कह देती हो बिन कहे .....!
सूनी आँखों से आप-बीती,
ठिठुरती सासों की,
सिकुड़ती उम्र की पैनी भाषा!
निद्रा-विहीन बीती रातें,
दुखती रग मे,
ठहरा खुरदुरा एकाकीपन;
सिसकता खालीपन,
कभी पूरा न होता स्वप्न;
कैसे देख लेती इन आँखों से,
सहज याद करके,
महसुश करती मीठास;
जो था तो सही! रहा नहीं साथ,
मैं भी कभी समझना चाहता-
उस सपने का सहज प्रभाव ,
पर नहीं,समझ पाता नहीं !!
सुनो,तुम बुनना बंद कर दो!
क्रोशिये के फंदे ,
मेरे दिल को जकड़ते,
कैसे जोड़ पावगी बुनकर,
जो अलग हो गये...|
वह सर्द हो गये हैं भावना से,
उन्हें सर्दी क्या ठिठुरायेगी ?
किसलिये कौशीश क्रोशिये से !
वृथा स्वप्न बुनने की,
बन्ध करो !
....कर दो ना।
स्वप्न बुनना ..


सजन कुमार मुरारका


Nutanganj
P.O.+ Dist.Bankura - 722,101
(पश्चिम बंगाल)
मोबाइल No.09434743802
ईमेल: sajanmurarka@gmail.com

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