रविवार, 22 फ़रवरी 2015

दस्तक: दो कविताएं-निधि जैन



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वो बचपन..


वो बचपन लौट आये
वो माँ का आँचल फिर मिल जाए
कहीं खो गयी जो अठखेलियां
वो जीवन में फिर लौट आएं
वो माँ का दुलार
वो माँ की फटकार
वो डाँट डपटकर भी पेट भर देना मेरा
वो हरदम मेरी ही फ़िक्र करना
वो मुझे अपनी गोद में सुलाना
वो सर पे उंगलियां फिराकर प्यार से उठाना
सब कुछ छूट गया ज़िन्दगी में
मैं कुछ लिख नहीं पाती तेरी बंदगी में
कलम और शब्द साथ नहीं देते
माँ, माँ है इससे ज्यादा कुछ और नहीं कहते
पर तेरी ये बेटी आज तुझको तरसती है
तेरी याद में मेरी अँखियाँ बरसती हैं
काश मैं फिर छोटी हो जाऊं
फिर से तेरे आँगन में खिलखिलाऊँ
काश ये काश सच हो जाए
कहीं से फिर मेरा बचपन लौट आये



एक दिन बोले पेड़..


एक दिन बोले पेड़ ये हमसे सुन लो ओ प्राणी
क्यूँ करते हो तुम हम सबकी ख़त्म कहानी
क्या भूल गए हो
जरूरत का सारा सामान
तुम्हे हमसे ही मिलता है
और धरती का हर फूल हमसे ही खिलता है
जीवन में ऑक्सीजन का अमृत
तुम्हे हम ही देते हैं
और कार्बन- डाई- ऑक्साइड का जहर
हम खुद में समा लेते हैं
मेघ बरसाते हैं अपना जल
चिड़ियों की चहचहाहट हमसे
कोयल की कहकहाहट हमसे
हमसे ही बजता संगीत है
हमसे ही बनता हर गीत है
हमसे ही जग को ये खुशबूयें सारी
हमसे ही तो हैं रंगीन फ़िज़ा ये तुम्हारी
फिर भी हमे तुम काट रहे हो
खुद अपनी ही ज़िन्दगी की खुशियों को
दीमक की तरह चाट रहे हो
भूल चुके हो तुम अपनी मानवता को
पछाड़ रहे हो दानव की दानवता को
हम नहीं होंगे गर तो,
तुम करोगे फिर फ़रियाद
क्यूंकि फिर न तुम बचोगे,
न ही तुम्हारी औलाद
वृक्षों का गर अकाल पडेगा
तो धरती पर महाकाल मचेगा
बिखर जायेंगी वादियाँ सारी
बेलगाम होंगी ये नदियाँ सारी
इसीलिए
हे मानव
वक़्त है , संभल जाओ अब भी
एक- एक पौधा लगाओ तुम सब भी
प्रण करो नहीं करोगे हमारा विनाश
बस फैलाओगे हरियाली का प्रकाश


निधि जैन

ईमेल: nidhijain6129@gmail.com

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