गुरुवार, 5 मार्च 2015

रंग बरसे: फागुनी दोहे-कल्पना मिश्रा बाजपेई



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




गजरे में कचनार..



नवल यौवना ले चली, कर में लाल गुलाल
उमग हृदय वो ढूंढती,छिपे कहाँ नंदलाल ॥

धानी चूनर पीत सी,गले नौलखा हार
खिलते टेसू गालों पर,गजरे में कचनार ॥

पंचम स्वरलहरी सुनी,राधा हुई विभोर
कुंज गली में खोजती,जादूगर चितचोर ॥

मोहन मारे कांकरी ,फूटी गागर रंग
राधा ललिता कह उठी,क्या खाये हो भंग ॥

श्याम सखी बन नाचते,गोकुल में है धूम
राधा को उर में लिए,रास रचाते झूम ॥

लाली बिंदिया चाँद सी,कजरारे से नैन
बतियाने पनघट लगे,फागुन गाती रैन ॥



कल्पना मिश्रा बाजपेई


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