सोमवार, 4 मई 2015

छौना तृण व अन्य कवितायें-मंजुल भटनागर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


छौना तृण



उड़ पाखी
लिए हाथ में
लघु आस का छौना तृण.

उषा जाग गयी प्राची से
किरण नवेली जगा रही
सब जड़ चेतन

करतल पात ,शोर करें तो
हो न खिन्न
शक्ति पुंज ले गति जीवन

लिए चाह सृजन
तू हरपल व्याकुल
विपदाओं से लड़ता
मन तेरा चिर यौवन




दोस्ती



पक्षी चरवाहे हैं
बादल हैं
खान बदोश से हैं
मन मौजी
बहती हुई सुगंध बांचते डोलते हैं.

उनके पंखों में सिमटती मिटटी
भाप और घास
उन्हें छू भर के
अपना  देश ,अपनी ज़मीं
याद आ जाती है..

एक देश का पानी
दो मुल्को की बानी
दोस्ती को रंग लेती  है
दोस्ती मुल्को सरहदों की
मोहताज़ नहीं होती है .



बसंत



बसंत ओड़ दुशाला
झुरमुटों का
पीत वसन छिटका रही
दूर तलक .

सरसों बीच
छिपी चांदनी
सिमिट गयी .

किरण दिनमान के
पंख लगाये
उतरी है धरा पर
शुभ्र निश्चल.

मंगल हलद पीत
वीणा के तार झंकृत करती
मन प्रागंण में
निशब्द मौन .



जीवन चलता रहा



घर गाँव छूटा
रिश्ता बूटा
बढ़ा  शहर
न जाने किस ओर

छूटी हवा
छूटी पहचान
देखती  रही
ऊंचीं दूकान

गाँठ भरी दोपहरिया
भटकती रही
छूट रही ठौर

ढल गयी शाम
पगडंडियां सरकी
सूना पन छलता रहा

सागर का शोर
बाट जोहता कौन
लहरों सा
जीवन चलता रहा .



मंजुल भटनागर


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अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
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ईमेल–manjuldbh@gmail.com

1 टिप्पणी:

  1. एक प्रवाह में बहती हुईं रचनाएँ .प्रभावी लगीं .....बधाई

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