सोमवार, 10 अगस्त 2015

पांच ग़ज़लें-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आँखों ने है देखा..


आँखों ने है देखा, अक्सर ये तमाशा,
जब खुश था ज़रा सा, तब टूट गया दिल|

किस्मत का सताया, हर दर्द में गाया,
पर वो नहीं आया, तब टूट गया दिल|

हम प्यास के मारे, सेहरा से न हारे,
बादल जो हँसा रे, तब टूट गया दिल|

आँगन का अँधेरा, तो बन गया मेरा,
मुँह उसने जो फेरा, तब टूट गया दिल|

अश्कों की कहानी, शेरों की ज़ुबानी,
उसने नहीं मानी, तब टूट गया दिल|

ख्वाबों के परिंदे, उड़ते कि न उड़ते,
पर आप ने कतरे, तब टूट गया दिल|

दफ्तर की सीढ़ियाँ, हम भी चढ़े मियाँ,
पर आये जब यहाँ, तब टूट गया दिल|

सहते नहीं बना, रहते नहीं बना,
कहते नहीं बना, तब टूट गया दिल|

जोड़ा हजार बार, टुकड़ों को बेशुमार,
फिर जब भी हुआ प्यार, तब टूट गया दिल|

कमज़ोर था बहुत, पर इश्किया बहुत,
जब-जब जिया बहुत, तब टूट गया दिल|

हल सब सवालों के, क्या लिख नहीं पाते?
पर हाथ रुक गए, तब टूट गया दिल?

मुँह मोड़ना पड़ा, सब छोड़ना पड़ा,
दिल तोड़ना पड़ा, तब टूट गया दिल|



भूख को ओढ़े गरीबी..


भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है|
देश में काफी तरक्की हो रही है|

बाल-विधवा सी हमारी ज़िन्दगानी,
दाग़ दामन के, छिपाकर धो रही है|

जो नदी कल तेरी आँखों से बही थी,
मेरे मन का गाँव आज डुबो रही है|

फिर तेरे होठों की गर्मी चाहती है,
फिर हमारी  साँस ठंडी हो रही है|

क्यों न उग जाये ईमारत पर ईमारत,
हवस दिल में कंकरीटें बो रही है|

बोझ बस्तों का बढ़ा इतना ज़ियादा,
स्कूल में बैठी शरारत रो रही है|

'उम्र को हम ढो रहे हैं'-ये भरम था,
आज जाना-'उम्र हमको ढो रही है'|



पत्थरों की बस्तियों में..


हम उम्मीदों के अलादिन, आँख में सपने संजोये,
खुद को एक चिराग जैसा, मुद्दतों से घिस रहे हम|

जो मुक़द्दर दे रहा था और हम जो चाहते थे,
फर्क़ दोनों में बहुत था इसलिए मुफलिस रहे हम|

दीदावर पैदा चमन में एक दिन होगा कहीं तो,
अपनी बेनूरी पे’ रोते, उम्र भर नर्गिस रहे हम|

पत्थरों की बस्तियों में, इस क़दर बिगड़ी तबीयत,
गुलशनों में भी गए तो देर तक बेहिस रहे हम|



मौन को स्वर में सजाकर..


मौन को स्वर में सजाकर आज हम कविता कहेंगे,
और तब साहित्य-शोधक उस विधा को क्या कहेंगे|

भ्रष्ट होते जा रहे दिन-रात नैतिक मूल्य सारे,
लोग इसको देश में बढ़ती हुई शिक्षा कहेंगे|

हम कहेंगे, चाहिए अब क्रांति आध्यात्मिक पटल पर,
किन्तु समझेंगे नहीं सब और हाँ में हाँ कहेंगे|

स्मरण में उनके, हृदय पाषाणवत् होने लगा है,
वे छलकते नयन को सम्बन्ध की सीमा कहेंगे|

स्वप्न टूटा, विवशता में धैर्य ने की आत्म-हत्या,
इस व्यथा को हम नियति की गूढ़ संरचना कहेंगे|

जटिलता इतनी कि जीवन को न जीवन कह सकेंगे,
यदि  कहेंगे कुछ इसे तो मृत्यु की सुविधा कहेंगे|

 जब कभी उस द्वार पर दो-चार पल ये पग रुकेंगे,
‘आशुतोष’, उसे कहीं भीतर छिपी श्रद्धा कहेंगे|



वैसे लोकतंत्र है फिर भी..


'आपस में सब भाई-भाई हैं', ऐसा जब भी लिखना,
पहले थोड़ा समझाकर 'भाई' का मतलब भी लिखना| 

कलम छीन लेंगे, कागज़ फाड़ेंगे ये दुनिया वाले,
आँसू और लहू से सारी सच्चाई तब भी लिखना|

वैसे लोकतंत्र है फिर भी अपने दस्तावेज़ों पर,
सब बातों के साथ जाति भी लिखना, मज़हब भी लिखना|

मैं बहका, मैं भटक गया, इसको भी करना दर्ज़ मगर,
उसकी मादकता, उसका आकर्षण, वो सब भी लिखना|

ऊपर वाले को कुछ मेरे बारे में जब भी लिखना,
हर मज़हब पे' हँसने वाला मेरा मज़हब भी लिखना|



आशुतोष द्विवेदी 


भारतीय राजदूतावास,
अद्दिस अबाबा,
इथियोपिया |
ईमेल:ashutoshdwivedi1982@gmail.com

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