मंगलवार, 1 सितंबर 2015

मुट्ठी भर रेत एवं अन्य रचनाएं-शील निगम


विनोद शाही की कलाकृति


मुट्ठी भर रेत


मुट्ठी भर रेत, सूखी सी,
छोड़ गई रीतापन हाथों में,
रह गया शून्य सा मन.

एक आस जगी, जब बन बैठा-
छोटा सा बच्चा, मन,
करने लगा बाल-हठ
वो सब पाने को,
जो खो चुका था जीवन.

जागी एक लगन,
और..
मन के शून्य,
बन गए दो नयन,
बह गया विषाद,
उन नयनों के
झरोखों से,
और.........
बदल गई दिशा दृष्टि राहों की.

इस बार..
वो रेत सूखी न थी,
उसमें थी नमी अश्रुओं की
और कुछ खारापन भी,
जो ना रिस पाया, न बह पाया,
मेरी इस बंद मुट्ठी के भीतर से,
चार उंगलियों और एक अँगूठे के
बंद आगोश में,
बसी है वो रेत लिए हुए,
आज भी अपने अन्दर,
एक नमी-प्यार की, मनुहार की.

आखिर यही अन्तर तो होता है,
गीली और सूखी रेत में,
होता है रीतापन सूखी रेत में
और नम रहती है गीली रेत सदा,
आशाओं से, प्यार से और भावनाओं से.



मेरा स्नेह


मेरा स्नेह सम्पूर्ण प्रतिदान है,प्रेम की सीमाओं में न तोलो. 
असंख्य भावनाओं का गठबंधन है, ज़रा धीरे-धीरे खोलो .

प्रेम तुम्हारा चिंगारी बन आया हृदय के द्वार,
इसी स्नेह से शोला भड़का पाया कभी न चैन,
प्रेम-ज्वाला की अग्नि में तपता रहा दिन-रैन ,
आशाओं के दीपों में स्नेह- बाती से जले नैन .
समर्पण की अद्भुत बेला में आकर्षण के सैन ,
खोल गये  तन- मन-मस्तिष्क के सब  बंद द्वार 
प्रेम तुम्हारा शोला बन तब आया हृदय  के द्वार 
फिर-फिर पाने को तृप्ति मन मचला बारम्बार,
इसी स्नेह ने किया तुम्हारी अतृप्ति का संहार .

मेरा स्नेह सम्पूर्ण प्रतिदान है,प्रेम की सीमाओं में न तोलो .
असंख्य भावनाओं का गठबंधन है, ज़रा धीरे-धीरे खोलो .



प्रेम में प्रतिकार कैसा? 


परवाने की दीवानगी पर शमा ने आँसू बहाए .
ओ मीत! प्रीत में  तुम क्यों जलने चले आये?
शलभ और दीप का रक्तरंजित त्योहार कैसा?
प्रेम में यह बलिदान कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

कंटकों के बीच भ्रमर का पुष्प पर मंडराना,
पंखुड़ियों का शूल भरे आगोश में मुस्कुराना,
भ्रमर की गुंजन लगे वीणा की झंकार जैसा .
प्रेम में यह अपूर्व संस्कार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

शबनम के अश्रुओं को  रवि ने दी सदाएँ ,
रश्मियों  के रथ पर नभ-फेरी पर चली आयें .
मन को लगे यह माननी केमनुहार जैसा,
प्रेम में कोई आभार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

कुमुदनी ने चाँदनी को गुपचुप बुलाया .
रुपहले आँचल को सुगंध से सजाया .
चाँद को लगे रूपसी के अभिसार जैसा .
प्रेम में यह अधिकार कैसा ? 
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

पपीहे की पिहू-पिहू,कोयल की कुहू-कुहू .
मधुप की गुन-गुन,नव-दुल्हन की छुन-छुन .
स्वरों की रागिनी को लगे मधुर झंकार जैसा .
प्रेम का यह अद्भुत संसार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?



जीवन-संध्या


जीवन की संध्या में क्यों? तू बरस रहा बन स्नेह का बादल.
देख भीग रहा अधूरापन झलकाता मेरे जीवन का आँचल. 

बन भिक्षुणी स्नेहांजलि लिए दिन भर भटकती  रही. 
पा सकी न प्रेम-भिक्षा, झोली मेरी खाली ही रही. 
गेरुएपन की आड़ में रक्त हृदय का छिपाती ही रही . 
थोड़ा-कुछ पा जाने की आस में, सर्वस्व लुटाती रही. 

साधना-अर्चना की हृदय में जगी  ऐसी लगन. 
एक साध्वी के रूप में ,अब मैं बन गयी जोगन.
साहस नहीं है कि पा सकूँ, तुझे भर कर नयन. 
काल-रात्रि की ओर चले,थके -हारे मेरे चरण. 

जीवन की संध्या में क्यों ?तू बरस रहा बन स्नेह का बादल. 
देख भीग रहा अधूरापन झलकाता मेरे जीवन का आँचल. 



मोह-जाल 


सुनो !
निर्मोही सदा सुखी रहते हैं...
रिश्तों के मोह-जाल में नहीं फँसते,
स्वछंद,मुक्त पंछी से उड़ते फिरते हैं
उन्मुक्त, विस्तृत  नील-गगन में. 
पर मोही?
बहुत सुख पाते हैं जब रेशम से मधुर,
सुन्दर,सुनहरे रिश्ते  बंधन में बंधते हैं.
बंधन कब  बेड़ियाँ बन  जकड़ लेते हैं
मासूम से  मन को पता ही नहीं चलता. 
फिर तड़पता है मन,छटपटाता है खूब,
न जी पाता है, न मर पाता है चैन से,
लटकता रहता हैं त्रिशंकु सा अधर में.  




शील निगम


  • जन्म-6 दिसम्बर, 1952 आगरा (उत्तर प्रदेश) 
  • शिक्षा-बी.ए./बी.एड.
  • व्यवसाय-कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका.
  • (मुंबई में 15 वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्षों तक हिंदी अध्यापन)
  • विद्यार्थी जीवन में अनेक नाटकों,लोकनृत्यों तथा साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक प्रतिभाग एवं पुरुस्कृत. 
  • प्रसारण-दूरदर्शन पर काव्य-गोष्ठियों में प्रतिभाग एवं संचालन तथा साक्षात्कारों का प्रसारण
  • आकाशवाणी के मुंबई केंद्र से रेडियो तथा ज़ी टी.वी.पर कहानियों का प्रसारण.प्रसारित कहानियाँ-'परंपरा का अंत' 'तोहफा प्यार का', 'चुटकी भर सिन्दूर,' 'अंतिम विदाई', 'अनछुआ प्यार' 'सहेली', 'बीस साल बाद' 'अपराध-बोध' आदि .
  • प्रकाशन-देश-विदेश की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में कविताएं तथा कहानियाँ प्रकाशित.विशेष रूप से इंगलैंड की 'पुरवाई' कनाडा के 'द हिंदी टाइम्स' व 'प्रयास' तथा ऑस्ट्रेलिया  के 'हिंदी गौरव' व 'हिंदी पुष्प' में बहुत सी कविताओं का प्रकाशन.'हिंद युग्म' द्वारा कई कविताएँ पुरुस्कृत. 
  • विविध-बच्चों  के लिए नृत्य-नाटिकाओं का लेखन, निर्देशन तथा मंचन.
  • कहानियों के नाटयीकरण,साक्षात्कार,कॉन्सर्ट्स तथा स्टेज शो के लिए स्क्रिप्ट लेखन.
  • अनुवाद-हिंदी से अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद कार्य-हिंदी से अंग्रेज़ी एक फिल्म का अनुवाद, 'टेम्स की सरगम' हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद,एक मराठी फिल्म 'स्पंदन' का हिंदी अनुवाद.
  • A special Issue of 'TSI, Hindi  111 Top Hindi Women Writers of 21st Century', published in August,2011,  has included me in this issue as one of the top writers in 'The Sunday Indian' published in NOIDA 
  • सम्मान-'डॉ आंबेडकर फेलोशिप अवार्ड' (दिल्ली),'हिंदी गौरव सम्मान' से सम्मानित (लंदन)
  • विदेश-भ्रमण-जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम,फ़िनलैंड, युनाइटेड किंगडम,ऑस्ट्रेलिया,सिंगापुर तथा मालदीव्स.
  • संपर्क -बी,401/402,मधुबन अपार्टमेन्ट, फिशरीस युनीवरसिटी रोड, सात बंगला के पास,वर्सोवा,अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-61
  • फोन-022-26364228/9987464198/ 9987490692

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति
    जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनायें!

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  2. सृजन का यथार्थ से जुडाव अनुभूति तल का स्पर्श करता हैं ।बहुत सुंदर ।
    छगनलाल गर्ग।

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