मंगलवार, 15 सितंबर 2015

सुधेश की ग़ज़लें


अजामिल की कलाकृति


दुनिया क़ुनबा सब अपने हैं..


दुनिया क़ुनबा सब अपने हैं
पर अपने तो बस सपने हैं।

सब जगह उन्हीं के जलवे हैं,
हर जगह उन्हीं के अपने हैं।

जो मिलता कभी न जीवन में,
आ जाते उस के सपने हैं।

अघटित की ही आशंका में,
दिखते उस के ही सपने हैं।।

वह मुखड़ा ही इतना सुन्दर 
सपने में उस के सपने हैं।

जीवन तो ख़ाली ख़ाली है,
अपने तो केवल सपने हैं।। 

वह खुल कर कम मिलता है,
छिप-छिप मिलते जो अपने हैं।



मैं ने लिखा कुछ भी नहीं..    


मैं ने लिखा कुछ भी नहीं,
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।

जो भी लिखा दिल से लिखा,
इस के सिवा कुछ भी नहीं । 

मुझ से ज़माना है ख़फ़ा,
मेरी ख़ता कुछ भी नहीं । 

तुम तो खुदा के बन्दे हो, 
मेरा खुदा कुछ भी नहीं । 

मैं ने उस पर जान दी, 
उस को वफ़ा कुछ भी नहीं ।

चाहा तुम्हें यह अब कहूँ
लेकिन कहा कुछ भी नहीं । 

यह तो नज़र की बात है, 
अच्छा बुरा कुछ भी नहीं । 



हम ज़िन्दा रहें..


हर आदमी दुश्मन हो ज़रूरी तो नहीं,
हर दोस्त भी दोस्त हो ज़रूरी तो नहीं । 

जो शख़्स फ़रिश्ता नज़र आता है, 
ताउम्र फ़रिश्ता हो ज़रूरी तो नहीं ।

दोस्तों की ये महफ़िल रहे यों ही, 
मैं इस में रहूँ ही ज़रूरी तो नहीं । 

जो आप भी शेर कहते कहिये कहिये,
हर कोई उसे गाए ही ज़रूरी तो नहीं ।

यह देश जो अपना वतन सलामत हो,
हम ज़िन्दा रहें ये ज़रूरी तो नहीं । 



आज दिल बुझा बुझा..   


आज दिल बुझा बुझा क्यों है, 
हुआ क्या किसे पता क्यों है । 

सुबह दिल गुलाब था पहले, 
शाम को झरा झरा  क्यों है ।

वक्त कुछ बदल गया ऐसा,
आज बेरहम हवा क्यों है । 

वक्त बेरहम हुआ अब तो 
रूठ सा गया खुदा क्यों है । 

सुबह थी खिली खिली जूही, 
शाम को  धुवाँ धुवाँ क्यों है ।

चलो कुछ कहो सुनो अब तुम, 
मौन रह जो दी सजा क्यों है । 

साफ़ अब कहो कहो खुल कर, 
आज मुहब्बत ख़ता क्यों है । 

ज़िन्दगी जियो बन्धु हँस कर,
आज दिल थका थका क्यों है। 



अपनी डफली है यहाँ..(दोहे)


अपनी डफली है यहाँ अपना अपना राग। 
कोई गीत मल्हार है या बेमौसम फाग।।

अपना विज्ञापन करो कोई रोक न टोक। 
खुदरा हो तो ठीक है हर्ज नहीं जो थोक।। 

युग की वीणा में भरे अपने अपने राग। 
कोई सुन सो जाय या सुन कर जाये जाग।।

करे प्रशंसा आप की इस युग मेँ है कौन। 
अपनी गाल बजाय कै सब हो जाते मौन।।

नित्य उतारूँ आरती अगर आप भगवान।  
मगर काम से लग रहा आप सिर्फ शैतान।।

जो भी दिखे महान है कोई महा महान।
ढूँढ ढूँढ हारा मगर दिखा नहीं इन्सान।।

दूजे की तारीफ़ में है अपनी तारीफ़। 
परनिन्दक की पर भला कौन करे तारीफ़।।

निन्दा को सुन कर गुणी क्षण में जाते भूल। 
जो ओछे बजते अधिक हिय में गड़ते शूल।।



सुधेश 


  • पूरा नाम-एस.पी.सुधेश 
  • जन्मतिथि-6 जून सन 1933
  • जन्म स्थान-जगाधरी  ज़िला अम्बाला (हरियाणा) 
  • जीवनी-बचपन जगाधरी,देवबन्द में बीता। 
  • (दिल्ली में सन 1975 से)
  • शिक्षा-एमए.हिन्दी में (नागपुर विवि) पीएचडी आगरा विवि से। 
  • प्रकाशित-काव्य कृतियाँ- फिर सुबह होगी ही -1983, घटनाहीनता के विरुद्ध -1988, तेज़ धूप-1993, जिये गये शब्द -1999, गीतायन (गीत और ग़ज़लें) -2009, बरगद (खण्डकाव्य)-2001, निर्वासन (खण्ड काव्य) -2005, जलती शाम (काव्यसंग़ह) -2007, सप्तपदी ,खण्ड 7 (दोहा संग़ह)-2007, हादसों के समुन्दर (ग़ज़लसंग़ह) -2010, तपती चाँदनी (काव्यसंग़ह)-2013
  • आलोचनात्मक पुस्तकें- आधुनिक हिन्दी और उर्दू कविता की प़वृत्तियां-1974, साहित्य के विविध आयाम -1983, कविता का सृजन और मूल्याँकन -1993, साहित्य चिन्तन-1995, सहज कविता,स्वरूप और सम्भावनाएँ -1996, भाषा ,साहित्य और संस्कृति -2003, राष्ट्रीय एकता के सोपान -2004, सहज कविता की भूमिका -2008, चिन्तन अनुचिन्तन -2012, हिन्दी की दशा और दिशा -2013
  • विविध प़काशन- तीन यात्रा वृत्तान्त ,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास,एक व्यंग्यसंग़ह, एक आत्मकथा प़काशित । कुल 29 पुस्तकें प़काशित।
  • पुरस्कार/सम्मान-मध्यप़देश साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार-2006, भारत सरकार के सूचना प़सारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार-2000, लखनऊ के राष्ट्रधर्म प़काशन का राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान-2004, आगरा की नागरी प़चारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन-2004।
  • सम्प्रति-उप्र.के तीन कॉलेजों में अध्यापन के बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विवि में 23 वर्षों तक अध्यापन। प़ोफेसर पद से सेवानिवृत्त। तीन बार विदेंश यात्राएँ। अब स्वतन्त्र लेखन ।
  • सम्पर्क-314, सरल अपार्टमैन्ट्स, द्वारिका, सैक्टर-10, दिल्ली-110075
  • ई-मेल-dr_sudhesh@yahoo.com
  • फ़ोन-09350974120

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