मंगलवार, 22 सितंबर 2015

तेरी वरवीणा से ही रागिनी-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


सरस्वती वंदना (घनाक्षरी छंद)


ऋषियों, तपस्वियों के मन का विराग, त्याग,
कामिनी के मोहक स्वरुप का श्रृंगार तुम |
शब्द-शब्द में बही प्रवाहमयी भावना हो,
मानस में दीपक सा जलता विचार तुम |
एक तुममें ही सब, सबमें तुम्हीं रमी हो,
सृजन हो, पालन हो, सृष्टि का संहार तुम |
हो धनुष-बाण कभी, बाँसुरी की तान कभी,
जानकी की वंदना तो राधिका का प्यार तुम |
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अधरों के द्वार को सरलता की धार दे दे,
नयनों में प्यार की उदारता उतार दे |
तार हिल भी उठें तो झूमने लगे बहार,
मन के सितार को तू ऎसी झनकार दे,
अभिमान से भरे विचार हार जाएँ जहां,
पत्थरों में आज ऎसी भावना उतार दे |
मात शारदे, पुकारता हूँ तुझे बार-बार,
आके’ मेरे जीवन के गीत को सँवार दे |
                          ****

पर्वतों में, नदियों में, बादलों में, सागरों में,
कंटकों में, पुष्प के मरंद में तुम्हीं बसी |
ज्योति में, तिमिर में हो, धूल में कि चन्दन में,
पशुओं में, फल, मूल, कंद में तुम्हीं बसी |
मेरे सपनों के तार-तार में बसी हो मात,
मेरी कामना, मेरी पसंद में तुम्हीं बसी |
मेरी भावना, मेरे विचार, मेरी लेखनी में,
मेरे गीत में हो, मेरे छंद में तुम्हीं बसी |
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वर्तमान का हो चित्र, कल्पना भविष्य की हो,
बीतते अतीत की कहानी बोलती रहे |
प्रेम के प्रसंग गहराई में छिपाए हुए,
आँसुओं से दर्द की निशानी बोलती रहे |
बाल्यकाल के वे खेल, बूढ़ी अँखियों की यादें,
अधरों के द्वार से जवानी बोलती रहे |
मात वरदान यही मांगता हूँ बार-बार,
गीत के स्वरों में जिंदगानी बोलती रहे |
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तेरी वरवीणा से ही रागिनी बरसती है,
तेरे कर-कमलों से निकली कलाएं हैं |
तेरी ही कृपा से राग-रंग की विविधताएं,
तेरी ही कृपा से सारी छंद की विधाएं है |
तेरी पलकों ने दिन-रात के नियम रचे,
तेरी वंदना में ही मगन ये दिशायें हैं |
तेरे चरणों की भेंट जीवन का पल-पल,
तेरी ही कृपा से अधरों ने गीत गायें हैं |
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छंद के चरण और गीत के ये स्वर सारे,
भेंट करता तुम्हें स्वीकार लो माँ शारदे !
देने के लिए न और कुछ भी है पास मेरे,
आज मेरी लेखनी की धार लो माँ शारदे !
अश्रुओं के वारिधि में, हर्ष की तरंग बीच,
मेरी तारिणी की पतवार लो माँ शारदे !
धन्य मेरा जीवन, मरण मेरा धन्य होगा,
एक बार मुझको निहार लो माँ शारदे !
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अपना वरद हस्त शीष पर रख दो तो,
आँधियों भरी अमा में दीप मैं जलाऊंगा |
पत्थरों की बस्तियों में काँच का महल रच,
पर्वतों को काट, पथ नूतन बनाऊंगा |
मन के हुताशन में पानी का महत्व रख,
मरुओं में भी मैं फुलवारियाँ सजाऊंगा |
कंटकों के बीच भी गुलाब सा खिलूँगा मात!
भीगी-भीगी अँखियों को हँसना सिखाऊंगा |
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दंभ या प्रमाद वश जो भी अपराध हुए,
बालक समझ कर माफ कर देना माँ |
एक ही पुकार, प्रार्थना यही है बार-बार,
चित्त से बुराइयों को साफ कर देना माँ |
ऐसा ओज, ऐसी दृढ़ता प्रदान करना कि,
हर अत्याचार के खिलाफ कर देना माँ |
काम, क्रोध, लोभ के झकोरे छेड़ने लगें तो,
अपने भजन का लिहाफ कर देना माँ |


आशुतोष द्विवेदी 

भारत का राजदूतावास,
अदिस अबाबा,
इथियोपिया 

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