मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

दस्तक: तीन कविताएं-श्रवण कुमार


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


असमानता


मैंने देखा है
असमानता को कुछ इतने क़रीब से
बता सकता हूँ,
क्या है ये बड़े ही तहजीब़ से।
आर्थिक रुपी असमानता
यूँ अपना पाँव पसारे है
कुछ तो रहते हैं, महलों में
खाते ऱोज होटलों में,
चलते हैं, मर्सडीज से
बहुतों को मिलती है
सूखी रोटी भी नसीब़ से
न हो अगर विश्वास
मेरी बातों का,
जाओ देखो
झोपड़पट्टी और मजदूरों की बस्ती में
पूछो ग़रीब से
खाने की तो छोड़ो
बात भी नहीं करता कोई
उनसे तमीज़ से
फ़सल उगाता है किसान
पर बच्चे मरते भूख से
महलबनाने वालों के
खुद के घर घासफ़ूस के
कमर टूट गयी मेहनत करके
बेहाल होते हैं धूप से
हाय ! विडम्बना
बू आती है
उन अमीरों को
इन मेहनतकशों की कमीज़ से
जो रहते हैं इन्हीं के बनाये महलों में
उनके ही अन्न से बनाते हैं
व्यंजन लजीज़ से
बड़ा फ़र्क है
अमीरों और ग़रीबों की बीमारी में
जुक़ाम भी हुआ जो अमीर को
डॉक्टर पर डॉक्टर आते हैं
बीमार हुआ ग़र ग़रीब तो
अस्पताल के चक्कर और घनचक्कर में
क्या हाल हुआ
पूछो मरीज़ से
यूँ तो शाही शादी में करोड़ों उड़ाये जाते हैं
देश और विदेश से मेहमान बुलाये जाते हैं
पर एक ग़रीब की बेटी की
शादी टूट जाती है
सपनों की तरह
बारात लौट जाती है दहलीज़ से
अच्छी शिक्षा से ही होता है बुद्धि विकास
पर मेरे देश में शिक्षा भी
बिकती है बाजार में
फ़ीस चुका नहीं सकते ग़रीब
इसी वजह से बच्चे उनके
महरूम रह गए तालीम से 
सामाजिक असमानता की तो
बात न करना
सदियों से ये सुरसा सा मुँह फैलाए है
जाति धर्म और वर्ण के नाम पर
न जाने कितने बलि चढ़ गए
कितनों बंधे ज़रीब से
पर मानवता का गला घोंट कर
ये यूँ ही बढ़ी जा रही है
मैं पूछता हूँ ?
इन दुनिया वालों से
मानवता के रखवालों से
क्या है ये ?
क्या यही है, मानव धर्म?
यही है इंसाफ़
क्या ये लगते नहीं कुछ अजीब़ से
ग़र लगते हैं
तो दूर कर दीजिये
ऐसी असमानताओं को
दुनिया से
मानवता के लिए
अपनी किसी तरकीब़ से।



मैं बेजान हूँ


मैं बेजान हूँ ।
फिर भी कहता हूँ,
जीवों में सर्वश्रेष्ठ हूँ
क्योंकि इंसान हूँ ।
मैं रोज़ देखता हूँ, सुनता हूँ
इंसान को इंसान से नफ़रत करते हुए
कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर
तो कभी आत्मसम्मान के नाम पर
मार दिए जाते हुए 
तो कभी भूख से मरते हुए ।
मैं सब कुछ देख रहा हूँ
बस ! देख रहा हूँ
मैं कुछ कर नहीं सकता ।
मेरा यही देखने सुनने का
दौर चल रहा है सदियों से 
समय का पहिया दौड़ रहा है ।
आज इन्सानों में एक दूसरे से
आगे जाने की होड़ लगी है 
अगर यही होड़ प्रतियोगी की तरह होती
तो कितना अच्छा होता
पर ये तो द्वेष भावना से प्रेरित है।
मैं बस देख रहा हूँ
इन्हें बदल नहीं सकता ।
मैं देख रहा हूँ
आज का युवा वर्ग
किस तरह नशे के आगोश में
फँसा जा रहा है।
एक गऱीब बाप दहेज में देने के लिए
लिए गये कर्ज में दबा जा रहा है ।
इस दहेज रूपी राक्षस की वजह से ही
न जाने कितनी मासूम बेटियों का
गला घोंटा जा रहा है ।
मैं देख रहा हूँ, बस !
इन्हें रोक नहीं सकता ।
मैंने सुना था-
ईश्वर ने इन्सानों को
विवेक दिया है,ज्ञान दिया है ।
जीवों की रक्षा के लिए
सत्य की खोज के लिए
सदाचार के लिए, परोपकार के लिए
आपसी समानता के लिए
पर शायद मैंने गलत सुना था
ये सब हो नहीं रहा है
मैं ऐसा करा भी नहीं सकता ।
मैं देख रहा हूँ बस !
मैं बेजान हूँ ।
फिर भी कहता हूँ,
जीवों में सर्वश्रेष्ठ हूँ
क्योंकि इंसान हूँ ।



बसंत


प्रकृति के ख़ूबसूरत नजारों का,
फूलों की बहारों का,
मौसम है बसंत |
चिड़ियों की चहचहाहट का,
कोयल के मधुर गीतों का
मौसम है बसंत |
गिल्लू के पेड़ों की इस डाली से 
उस डाली पे कुदकने का,
तीतर के फुदकने का
मौसम है बसंत |
छोटे-छोटे सुन्दर फलों से ढके
बेर के पेड़ों का,
फलों के राजा आम की डालियों पर मंजरी का,
मौसम है बसंत |
गुनगुनी धूप में बैठकर गुनगुनाने का,
प्यार के इज़हार का,
मौसम है बसंत |
प्रत्येक जीवों के मन को 
उल्लासित करने वाले मौसम का
सरताज़ है बसंत | 


श्रवण कुमार


शोध छात्र,
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय,
नयी दिल्ली।
फ़ोन-8010008797
ईमेल- Shravan.aug12@gmail.com


1 टिप्पणी:

  1. लाग लपेट छोड कहा तो सत्य ।शब्दों के माया मे भाव स्पष्ट हुए हैं ।

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