मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय की दो कविताएं


अवधेश मिश्र की कलाकृति



कोशिश


मेरी कोशिश है-
शब्द अब नए अर्थों से सँवर जायें
लोग विध्वंस, चीख, धोखा और विवशता के अर्थ भूलकर
निर्माण, हँसी, विश्वास और सहजता की चर्चा करें।

मेरी कोशिश है-
लोगों के मुख से आशीषों के शब्द निकलें 
कबीर का जीवन जीकर लोग मीरा सा प्रेम करें।

मेरी कोशिश हैं-
बची रहे झरनों की शीतलता और नदियों की लहरें
शिशुओं की किलकन और गायों के मधुबन।

मेरी कोशिश है-
लोगों में ईसा जैसा सेवा का भाव हो
बदले में चाहे सलीबों की राह हो
हर एक कदम पर मानवता की जीत हो
होंठों पर सबके जीवन के गीत हों।


अभिलाषाएँ


चाहूँगा मैं फूलों से बन पराग बिछ जाना 
कलियों से थिरकन को लेकर पत्तों सा हिल जाना। 

उड़ता जाऊँ नील गगन में मन की यह अभिलाषा
माटी से जुड़कर बुझ पाए मन की गहन पिपासा। 

पतझड़ और तपन आकर भी गीत ऐसा गा जाए
स्वर कोयल का राग भ्रमर का जीवन गीत सुनाए। 

काँटे समझ भले ही अपने अन्त समय तज जायें
फिर भी सबके रक्षा की अभिलाषाएँ मिट ना पायें। 


डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय



  • जन्म-1 जुलाई 1962 को चन्दौली जिले के एक गाँव फुलवरिया में।
  • शिक्षा-काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद 'हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में द्वंद्व' विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया।
  • रचना कर्म-कविता, समीक्षा, निबंध, एकांकी लेखन।
  • प्रकाशन-‘व्याकरण कौमुदी‘ कक्षा एक से लेकर आठ तक की कक्षा के लिए व्याकरण की पुस्तक। प्राईमरी शिक्षक, शिराजा, कहानीकार, साहित्य दर्पण, साहित्य मंजरी, संगम, व्यंजना प्रज्ञा, विविध भारत, सृजन और अभिव्यक्ति आदि पत्रिकाओं में निबंध समीक्षा एवं कविताएँ प्रकाशित। इसके अतिरिक्त नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वतंत्र मत, जे वी जी  टाइम्स आदि समाचार पत्रों में आलेख समीक्षाएं एवं कविताएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी अम्बिकापुर, रीवा एवं जबलपुर से कविताओं और चिंतन का प्रसारण।
  • सम्प्रति-स्नातकोत्तर शिक्षक (हिन्दी), केन्द्रीय विद्यालय, भुसवाल, ज़िला जलगाँव, महाराष्ट्र।
  • सम्पर्क-upadhyayhn@yahoo.com

1 टिप्पणी:

  1. शब्द भार अर्थ खोता हैं तीनों कविताओ का शब्द प्रयोग अति सूक्ष्म पराग गणो का संपुट बना हैं ।भाव अर्थ गहरे होने के उपरान्त भी शब्दों का सुंदर प्रयोग भी अर्थ ग्राह्यता मे कठिनता आ रही हैं ।जीवन ओर शब्द सृजन ओर भाव सरलता चाहते हैं ।जटिल जीवन मे सृजन थोड़ा सरल हो सके तो उपयोगी होगा ।रचना बहुत सुंदर ।बधाई ।

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