मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

प्रो. राजकिशोर प्रसाद की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अन्वेषण


प्रकृति ने सब कुछ रखा है,
जीवन सुखद बनाने को
मगर सुलभता नहीं हैं,
सब सुखद चीजें अपनाने में।

दृश्य नहीं है, श्रव्य नहीं हैं,
छिपा है गहन आवरण में,
है जरुरत अन्वेषण और
श्रमजल की, गोचर उसे बनाने में।

रहस्यों में रहस्य छिपा है,
सब तमाशा है तहखाने में,
बरगद का बृहत वृक्ष रखा है,
एक सरसों भर दाने में।

सफर दूब से दूध तक हो,
या फूलों का खिलना-मुरझाना
पूरा विज्ञान विरंची का,
कभी कहाँ किसी ने जाना।

अन्वेषणि बुद्धि ही रहस्य में,
छिपा तथ्य बतलाती है 
हटा आवरण पे आवरण,
नियति को दर्पण दिखलाती है।

अन्वेषण के बल हीं मनु-जीवन,
आज अन्य जीवों से इतर है,
हमारी इन अव्वलताओं के पीछे,
अन्वेषण और श्रमजल है।

अन्वेषण में जहाँ लोग लगे हैं,
आज धरती उनकी इतर है 
सुख-सम्पदा बसती वहाँ,
लोगों का जीवन वहाँ बेहत्तर है।

आराध्य और साध्य सभी को,
साधक हीं पा सकता है,
कुछ अद्भुत विज्ञान प्रभु का,
अन्वेषण ही बतला सकता है।


तन्हाई


बदलें चिन्ता को चिन्तन में
जब पास तन्हाई आए 
कुछ लोग हीं ढूँढते अपने भीतर
बाकी को तन्हाई खाए सताए।

ऋषि मुनि बैठ शिला पर
किसी घनघोर जंगल में
ब्रह्म शक्ति खुद में जगाते,
ढक निज को तन्हाई के आँचल में।

करते करते निज में अनवेषण
प्रज्ञा चढ़ चिन्तन पर चिन्ताएँ चरती है
बदलते तन्हाई को जो योगकाल में
तन्हाई उन्हीं का तम हरती है।

जब जब चिन्ता बदला है चिन्तन में
नव राह वहाँ से जना है
भागे हैं राजमहल से राजकुमार
तन्हाई में तपकर कोई महावीर और बुद्ध बना है।

डँसती खाती उनको तन्हाई
जो केवल चिन्ता में फँसते है
योगरूढ़ तो दुनिया में 
तन्हाई ढूँढते फिरते हैं।

चिन्ताओं के गहरे बादल में
चिन्तन तड़ित चमक है
योगी खींचे तन्हाई में नयी लकीरें
भोगी रोए कह कह तन्हाई तो दीमक है।


बड़ा मधुर एहसास हुआ..


आँखें लड़ी हिया में उठने लगा ऊँच ऊँच हिलोर
कहीं मधुवन में बरसने को था आतुर घटा घनघोर।


बातें यों फैल गयी मानो जंगल में लग गयी लुट्टी
दुनिया ही पीछे पड़ गयी लेकर बाधा और पट्टी।

वो क्षण किसी ने न जाना जब आँखें हुई थी चार
आज किसने न जाना पीछे आँखें पड़ी थी हजार।

कैद पiरंदा होता है गगन पर किसका जोर चला है
घेर रखे जो मगन मन को ऐसा पिंजरा कहाँ बना है।

हर विकट घेरे में भी छिपा रहता है जरूर एक मौका
काली बदरी के बीच ही चमका करती है लौका।

कल आग लगी मेरे मरई में ठीक हुआ सब राख हुआ
उसने दिया भर पानी की गगड़ी बड़ा मधुर एहसास हुआ।


प्रो.राजकिशोर प्रसाद


  • जन्म: 23 जनवरी, 1970, ग्राम मोहनपुर जिला वैशाली (बिहार)
  • शिक्षा: बी.आर.ए. (बिहार विश्वविद्यालय) से इलेक्ट्रानिक्स में पी-एच.डी. तथा वहीं व्याख्याता के पद पर कार्यरत।
  • सम्प्रति: जापान में डाक्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग की उपाधि के लिये अध्ययनरत।
  • ईमेल : kishore@hi.mce.uec.ac.jp

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