मंगलवार, 17 नवंबर 2015

डॉ. अंजना बख्शी की चार कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कविता


कविता मुझे लिखती है
या, मैं कविता को
समझ नहीं पाती
जब भी उमड़ती है
भीतर की सुगबुगाहट
कविता गढ़ती है शब्द
और शब्द गढ़ते हैं कविता
जैसे चोपाल से संसद तक
गढ़ी जाती हैं जुल्म की
अनगिनत कहानियां,
वैसे ही,
मुट्ठीभर शब्दों से
गढ़ दी जाती है
कागज़ों पर अनगिनत
कविताएं और कविताओं में
अनगिनत नक्श, नुकीले,
चपटे और घुमावदार
जो नहीं होते सीधे
सपाट व सहज वर्णमाला
की तरह!!


यादें


यादें बेहद खतरनाक होती हैं
अमीना अक्सर कहा करती थी
आप नहीं जानती आपा
उन लम्हों को, जो अब अम्मी
के लिए यादें हैं..
ईशा की नमाज़ के वक्त
अक्सर अम्मी रोया करतीं
और मांगतीं ढेरों दुआएं
बिछड़ गए थे जो सरहद पर,
सैंतालीस के वक्त उनके कलेजे के
टुकड़े.
उन लम्हों को आज भी
वे जीतीं दो हजार दस में,
वैसे ही जैसे था मंजर
उस वक्त का ख़ौफनाक
भयानक, जैसा कि अब
हो चला है अम्मी का
झुर्रीदार चेहरा, एकदम
भरा सरहद की रेखाओं
जैसी आड़ी-टेढ़ी कई रेखाओं
से, बोसिल, निस्तेज और
ओजहीन !


गुमनाम गलियों में


सुबह होते-होते
गिर जाता है ग्राफ
ज़िस्म की नुमाइश का
चढ़ने लगता है पारा
सूरज के ढल्ते ही
बाज़ार का,
रामकली की आवाज़
की खुमारी के साथ
शाम की ख़ामोशी में
कतारें हो जाती हैं
लम्बी और---लम्बी
जो बना लेती हैं
एक घेरा अपने
इर्द-गिर्द ज़िस्म की
टकराहटों के लिए
जिसमें महज़ आवाज़ें
नहीं होतीं,
एक ख़ामोश चीख
होती है, भीतर की
तहों में खनकती,
सुराख की गहराई में
सिमटती और खो जाती
इन गुमनाम गलियों में
जहां जिस्म बिकता है,
आवाज़ बिकती है,
और बिका करती है
सोलह साल की कई
रामकली और कलावतियां
आलू-बैगन की तरह होता है
मोलभाव
गिद्ध और भेड़ियों
के चबाने-खाने
और डकार लेने
के लिए!!


प्यार ऎसा होता है?


कितनी बार चाहा ऎनी
तुझे बताना..आज-कल
तुम मेरे सपनों में रोज
ही चली आती हो
अपने ’अक्षरों के साये’
के साथ,
कभी धुंए के छल्ले उड़ाती
तो कभी ’नागमणी’ के पन्ने
पलटती..
वो देखो तुम्हारा अक्स
इन दीवारों पर सजीव हो
उठा है लाल-पीला
और दूधिया रंगो से
आड़ी-तरछी रेखाएं
तुम हवा में बनाने
लगी हो
अमृता,
कभी-कभी सोचती हूं
तुम्हें और ’रसीदी टिकट’ को
क्यों नहीं समझा गया इतना
जितना कि एक सागर की
गहराई को समझा जाना चाहिए!
तुम्हारे भीतर के सागर से
कई सीप निकाले हैं
मैंने और कुछ फूल तुम्हारी
बगियां से चुन लाई हूं मैं.!!
इमरोज़ से मिलकर लगा
उस रोज,
तुम यहीं हो, उसी में ज़िन्दा
तुम्हारी सांसे, उसकी सांसों,
में महक रही हैं
नहीं जानती थी,
प्यार ऎसा होता है.

डॉ. अंजना बख्शी 


ईमेल-anjanajnu5@gmail.com

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