मंगलवार, 19 जुलाई 2016

शोर एवं अन्य कविताएं-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


शोर


मैं अकेला हूँ,
मगर ये शोर कैसा है,
मुझे घेरे हुए है जो !
यहाँ कोई नहीं फिर भी
न जाने कौन हैं वे लोग,
मुझसे बोलते ही जा रहे हैं जो !
कोई चिल्ला रहा मुझ पर,
कोई है लड़ रहा मुझसे,
कोई पुचकारता है और
कोई व्यंग्य करता है |
कोई करता हँसी मुझसे,
कोई है हँस रहा मुझ पर |
कोई धकिया रहा है औ’
शिकायत कर रहा है –
ध्यान क्यों देता नहीं मैं,
उसकी बातों पर?
कोई रूठा हुआ है -
देर तक बोला नहीं मैं इसलिए,
उत्तर नहीं सूझा मुझे जल्दी कोई,
मैं और करता क्या ?

मेरे भीतर लगी है भीड़ सी,
अनगिनत चेहरों की,
कई परिचित, अपरिचित भी,
कई देखे हुए से पर कहीं बिसरे हुए
यादों के अँधियारे, घने वन में,
उभरते, झाँकते, संकोच करते
अजनबी मन में |
मुझे बाँटा गया जैसे,
बड़े अनगढ़, बड़े बेडौल टुकड़ों में,
उछाला फिर गया उस शोर करती भीड़ के आगे
कि लूटें जाएँ वे टुकड़े मेरे अस्तित्व,
मेरे भाव के; उन धारणाओं के कि मैं एग्ज़िस्ट (exist) करता हूँ |
मेरे टुकड़े ये मेरे चाहने पर भी,
न जुड़ पायेंगे ऐसा लग रहा मुझको |
अगर जुड़ भी गए तो
क्या मेरा अस्तित्व वापस जी उठेगा,
और जीवित रह सकेगा स्वयं के एकत्व में, अद्वैत में ?

यहाँ देकार्त का वह कथन सहसा गूँज उठता है,
सुना मैंने कहीं –
“मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
मगर ये हाल अपना देख कर है लग रहा मुझको –
“मैं सोचा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं देखा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं जाना जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं समझा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
यहाँ पर बर्कले की याद आती है, बहुत ज्यादा,
अरे, प्लेटो के मानस-पुत्र,
शायद देखते होगे कहीं से तुम
कि जो अनुभव किये तुमने
वही अनुभव मुझे भी हो रहे हैं,
क्यों अचानक?
दार्शनिक तो हूँ नहीं कोई,
विचारक भी नहीं मैं,
बल्कि डरता हूँ विचारों के जटिल जंजाल से
फिर भी मुझे वे निठुर, कपटी घेर लेते हैं |

अभी कुछ थम गया हो शोर,
ऐसा कुछ नहीं हैं |
कहीं कोलाहलों में कुछ कमी आयी नहीं है |
मगर जैसा कि पहले कह चुका हूँ मैं,
पुराने गीत के ज़रिये कभी यूँ –
“कलरवों की हाट में हर क्षण,
मौन का अभ्यास करता मन”
उसी संकल्प को पकड़े,
मेरे अस्तित्व का है अंश कोई,
डुबकियाँ लेने लगा जो दर्शनों की तीव्र धारा में |
वहाँ शंकर मिले मुझको, कपिल भी साथ में थे,
एक-दूजे के गले में डालकर बाहें, पुराने साथियों से,
मस्त, परमानन्द की मुस्कान होठों पर सजाए |
और मैं चकरा रहा था –
कह गए आचार्य ‘मल्ल प्रधान’ जिन मुनि को,
उन्हींके साथ गल-बहियाँ खड़े हैं |
मगर शंका उन्होंने ही मिटा दी
और उत्तर दे दिया मेरे अ-पूछे प्रश्न का ऐसे कि
‘माया’ ही प्रकृति है औ’ ‘पुरुष’ ही ‘जीव’ है
एवं अवस्था ‘ब्रह्म’ है वह जबकि
प्रकृति पर पुरुष की विजय होती है;
पुरुष की विजय क्या है -
जान भर लेना प्रकृति को पूर्णता से |
“ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः” का यही तात्पर्य है |
अलग हैं ढंग कहने के मगर
सिद्धांत तो है एक ही,
शायद मज़ा भी तो इसी में है कि
अगणित हों तरीके वह अनोखी बात कहने के,
कि जो संभव नहीं कहनी, बहुत खुल के,
मगर, हाँ, कुछ इशारों में बताई जो गयी अब तक,
बतायी जा रही अब भी, बताई जा सकेगी और आगे भी |

कहाँ पर मैं निकल आया,
नहीं यह डगर वह, जिसपर
शुरू चलना किया था |
छुड़ाकर, जान शायद भाग निकला भीड़ से मैं |
मगर जाऊँ कहाँ तक !
मेरे हिस्से अधिकतर तो उन्हीं के बीच में हैं,
जिनसे बचकर भागता था |
खड़ा हूँ मैं पुनः कोलाहलों के बीच आकर |
फिर कोई है खीझता मुझ पर,
कोई है झगड़ता मुझसे,
कोई दुलरा रहा है और
कोई दे रहा ताने |
कोई करता ठिठोली,
औ’ कोई उपहास करता है |
मुझे महसूस होता है कभी यूँ भी,
कि जैसे इन सभी के प्रति मेरा दायित्त्व है कुछ,
जो निभाना है मुझे हर हाल में,
पर क्या सरल है यह?
नहीं, बिलकुल नहीं |
कभी लगता है ऐसा भी,
कि जैसे सब भरम है यह,
कि जैसे एक सपना है,
अभी यह टूट जायेगा,
खुलेगी आँख तो कुछ और सच होगा;
मगर सपनों के भीतर भी
तहें सपनों की होती हैं कई,
ऐसे कि जैसे प्याज के छिलके |
खुली आँखें हों, टूटी नींद हो
फिर भी वो सपने जागते हैं,
साथ चलते हैं,
उसी अंदाज़ में,
जैसे कि वो बिंदास रहते थे,
हसीना नींद की मरमरी बाहों में |

वहीँ पर प्रश्न अटका है अभी भी,
सत्य क्या है –
खिलखिलाता शोर या फिर कँपकँपाती शांति,
आखिर मैं चुनूँ किसको?
सही थे आप हे सुकरात, हे परिपूर्ण यूनानी,
कि कहते थे –
“मुझे बस ज्ञात है इतना कि मुझको ज्ञात है कुछ भी नहीं”
सही थे आप हे सिद्धार्थ गौतम, बुद्ध थे सच में,
कि सारे प्रश्न वे जग के कि जो हल हो नहीं सकते,
धरा बस मौन उन पर और ‘अव्याकृत’ कहा उनको |
मगर उस पार थे दोनों,
नदी की धार के उस दूसरे तट पर,
जहाँ से दशा और दिशा नदी की स्पष्टतर दिखती |
फँसा हूँ मैं नदी के वेग में औ’ बह रहा हूँ,
चाहता हूँ समझना मैं भी तटों की बात,
लेकिन कर नहीं सकता
कि मेरी स्थिति बहुत विपरीत है इसके |
मगर मैं चार्वाकों की शरण में जा नहीं सकता,
मुझे जँचते नहीं वे,
जब बताते हैं कि “केवल देह सच है,
मर गई जब देह तो कुछ भी न बचता |”
देखता हूँ मैं कि मैं फिर भी बचा हूँ,
बँट गयी है देह, मन भी बँट चुका है,
श्वास की सब डोरियाँ उलझी हुई हैं,
धडकनों के तार सब टूटे पड़े हैं,
और मैं बिखरा हुआ सा,
दूर तक फैला हुआ सा
देखता असहाय सा निस्तब्ध होकर
मैं स्वयं को |
ओ मेरे विटगेन्सटाइन, सच बताना
किस मनःस्थिति में बनायीं तुमने
सीमाएं विचारों की |
हुए नाराज़ क्यों इतने कि माने ही नहीं आखिर,
रसेल के, मूर के, सबके मनाने पर ?


हम अकेले 


मैं अकेला, तू अकेला, वो अकेला,
साथ बैठे रहे काफी देर तक तीनों अकेले । 
मैं गिनाता खर्च, बच्चों की पढ़ाई पर किये जो,
तू बताता - आजकल है लाभ का व्यवसाय शिक्षा,
और वो चिंता जताता एजुकेशन माफिया पर । 
मैं दुखी हूँ, कर्ज़ चुकता ही नहीं, है सूद इतना,
तू सिखाता कर्ज़ लेने, कर्ज़ देने के तरीके,
और वो चुप है कि वो खुद सूद खाकर जी रहा है । 
मैं ये कहता - बेटियों की शादियाँ कितनी कठिन हैं,
तू सुनाता शादियों की दावतों के चंद किस्से,
और वो देता दलीलें शादियों की व्यर्थता पर । 
इस तरह एक-दूसरे की समस्याओं से अपरिचित,
एक-दूजे की परिस्थिति से परस्पर अनछुए हम,
भावना के द्वार पर यूँ स्वार्थ के ताले लगाकर,
साथ बैठे भी रहे यदि उम्र भर तो क्या मिलेगा?
अंत में हम सभी पाए जायेंगे बिल्कुल अकेले । 


बहाव 


शब्दों को चूने दो,
अब धरती छूने दो
भावों की शाखों,
विचारों की डाली से;
हैं  पक चुके अब ये,
हैं भर चुके अब ये
जीवन के रस से,
अनुभव की हुलस से;
अब अधरों पर छाने दो,
भीतर तक जाने दो
आनंद कविता का,
गीतों की सरिता का
संगम हो जाएगा
सपनों की नदिया से,
भीतर की दुनिया से
आवाज़ें आती हैं,
अब तक बुलाती हैं,
ना जाने किसको वे !
अब चाहे जिसको, वे
संतृप्ति पायेंगी, 
जब गुनगुनायेंगी,
रस पी पी जायेंगी
उन पक्के शब्दों का
जिनमें मधुरता है
भीनी मादकता है
उन्मत्त करती जो
वो उड़ान भरती जो – 
तिरता रहता है मन
नभ में करता क्रीड़न
बादल के  टुकड़ों से,
चिड़ियों की टोली से,
तारों की झिलमिल से,
चंदा की महफ़िल से
चीज़ें चुरा लेता
जिनको छुपा लेता
यादों के झोले में,

मुस्कानें, उम्मीदें,

फुरसत, सुकूँ, नींदें;
सूरज से बचता है,
जलने से डरता है,
फिर भी कभी
छेड़ आता है धीरे से;
ऐसी आज़ादी है
अवसर जो देती है
अपनी हर सीमा से
बाहर निकलने का,
खुलकर मचलने का,
जीने का, मरने का,
या फिर सच्चे अर्थों में
प्यार करने का |


आशुतोष द्विवेदी


  • जन्म : 2 जून 1982  कानपुर (उत्तर प्रदेश)
  • शिक्षा : परास्नातक, गणित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
  • व्यवसाय : भारतीय विदेश सेवा (ब), विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली
  • रचना-कर्म : 1994 से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक | कुछ मंचों पर एवं कई गोष्ठियों में काव्य-पाठ | 
  • प्रकाशन: विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में फुटकर प्रकाशन | इन्टरनेट पर kavyanchal.com, kavitakosh.com, geeta-kavita.com, anubhuti-hindi.org, सुबोध-सृजन आदि वेब-पत्रिकाओं पर कुछ रचनाओं का संकलन |  एक निजी ब्लॉग "संवेदना" पर भी कुछ रचनायें उपलब्ध | पिछले वर्ष एक काव्य संकलन "इतना तो मैं कह सकता हूँ" नाम से प्रकाशित | 
  • सम्पर्क : मकान सं. 311, विदेश मंत्रालय आवासीय परिसर, गोल मार्किट, नई दिल्ली 
  • ईमेल:ashutoshdwivedi1982@gmail.com

परिक्रमा: लेखक और पाठक के बीच एक सार्थक पुल बना रहा है स्‍टोरीमिरर-राजेंद्र गुप्ता


मुंबई में वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव को सम्मानित
करते प्रसिद्ध अभिनेता
राजेंद्र गुप्ता

                     वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव का सम्मान


                मुंबई के मणिबेन नानावटी महाविद्यालय में 16 जुलाई 2016 की शाम एक भव्य आयोजन में प्रसिद्ध अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव को हिंदी कहानी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने के उपलक्ष्य में 50000 रुपये और प्रतीक चिह्न दे कर सम्मानित किया। इस अवसर पर राजेंद्र गुप्ता ने स्‍टोरीमिरर परिवार को बधाई देते हुए कहा कि  स्‍टोरीमिरर एक बहुत अच्छा काम कर रहा है कि वह गिफ्ट ऑफ नॉलेज के जरिए कहानी और कविता को घर-घर में पहुंचा रहा है। हमारे देश में एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग है जिस तक किताबें नहीं पहुंच पातीं। किताबें उन तक पहुंचाने के लिए नये तरीके अपना कर स्‍टोरीमिरर लेखक और पाठक के बीच एक सार्थक पुल बना रहा है।

              स्‍टोरीमिरर के सीईओ बिभु राउत ने इस अवसर पर कंपनी के विजन और मिशन की बात की और कहा कि हम चाहते हैं कि हर घर में कम से कम एक पाठक तैयार करें और जो किताबें लिखी जा रही हैं उन्हें अपने प्रयासों से उन तक पहुंचाएं। 

              संतोष श्रीवास्तव ने किताबें खरीदकर पढ्ने की आदत पर बल देते हुए कहा कि पाठक और लेखक के बीच का सेतु किताबें ही होती हैं। स्टोरी मिरर.कॉम इस दिशा में बेहतरीन काम कर रहा है।सबसे बडी बात यह है कि ईमेल द्वारा ये बताये बिना कि कोई इस प्रकार की कहानी प्रतियोगिता भी वे आयोजित करते है वे लेखकों से रचनाएँ आमंत्रित करते हैं। उन्होने अपनी कहानी “शहतूत पक गये हैं” का भावपूर्ण पाठ किया। कार्यक्रम में महानगर के लेखक, पत्रकार तथा महाविद्यालय के छात्र भारी संख्या में मौजूद थे।

प्रस्तुति: स्टोरीमिरर.कॉम


मंगलवार, 12 जुलाई 2016

सपना मांगलिक की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


गली मोहब्बतों की जाके ,क्या भला मिला
मिला राह में जो भी वो ही दिलजला मिला

कहा इश्कजादे ले खुशियों की लूट दौलतें
ख़ुशी दूर हमको अश्कों का सिलसिला मिला

जहाँ पूछ ना तू ,करके मुहब्बत क्या मिला ?
खलिश थी नहीं लेकिन ,दिल में कुछ खला मिला

उठा है यकीं दुनिया से ,उसपे यकीन कर
मठा फूंककर पीता लोगों ,दूधों से जला मिला

तड़प दीद के उसकी ,है ख्वाईश आखिरी
झलक बेवफा की करने दर ये खुला मिला



(दो)


डुबायें क्यूँ न ,खुद को हम ,शराब में
मिली नफरत ,हमें इश्के-जवाव में

पढ़ी थीं मोहब्बतें आयतें समझ
मिलेगा लफ्ज ना अब ये किताब में

परखने से जियादा हम निरखा किये
कमी कुछ रह गयी शायद हिसाब में

भरा गोदाम खाली आज कर दिया
बिकी जागीर दिल की कोड़ी भाव में

न महकेगा कभी ये गुले दोस्त सुन
लगा कीड़ा कि अब खिलते गुलाब में



(तीन)


बारिशों में गमों को डुबाकर चले
अश्क हम इस जहाँ से छुपाकर चले

है डरे रूसबाई मगर क्या करें
दिल गली यार की हम बताकर चले

पूछते हो लहू रिस रहा क्यूँ भला
तीर दिल में मिरे वो चुभाकर चले

सीं लिए होंठ आया जिक्र जब तिरा
नाम तेरा लवों पे दबाकर चले

इश्क अरमान  ईमान सब दे दिया
पास था दिल उसे भी लुटाकर चले

सर उठा चल रहे थे जहां में कभी
शोहरत ख़ाक में अब मिलाकर चले



(चार)


गले की प्यास होंठों से छुपानी आ गई
हमें यूँ धूल बातों पर उडानी आ गई

भुला डाला जिसे कबका कभी सोचा न था
हमें फिर याद भूली वो कहानी आ गई

कि उछली मौज जज्बों की गया दरिया सहम
गया था जम लहू रग में रवानी आ गई

किया उर्दू उसे खुद रोशनाई बन गए
कि गजलों में मिरी जबसे जवानी आ गई

गया सीने मिरे कुछ आज शीशे सा दरक
उभर के चोट ज्यादा यूँ पुरानी आ गई



(पांच)


झाड़ियाँ नफरत की ,बोते हैं बो जाने दो
डूबना गर किस्मत है तो ये भी हो जाने दो

जान भी ले ले देते हैं ये हक भी तुमको
दिल अगर रोता भी है तो क्या ,रो जाने दो

जिन्दगी ने दुत्कारा हमको बेदर्दी से
मौत की बाहों में खोना है खो जाने दो

धडकनें वो सब चलती हैं जो देख तुझको
खींच ले सीने से उन्हें ,मुझको जाने दे

मैं बयां करती भी हूँ तो क्या हासिल होगा
गम मिरा चीखें सन्नाटों की हो जाने दे



(छह)


दुश्मनों से कहाँ डर मुझे है
इल्म इंसान का गर मुझे है

क्यूँ जरूरत तुझे हो हमारी

चाह तेरी सनम पर मुझे है

दर्द कैसे तुझे दूँ भला मैं

है तुझे गम असर कर मुझे है

क्या हुनर वो करे बेवफाई

बेखबर सब खबर पर मुझे है

इल्तजा ये करूँ आखिरी अब

बेवफा कर न दर  दर मुझे है



(सात)


फेरकर मुंह तू जो खड़ी है
बेखबर सुन ग़ज़ल आखिरी है

लुट गए जो नज़ारे नज़र थे
दिल तुझे मगर अपनी पड़ी है

उस खता की मिल रही सजायें
जो कि मैंने करी ही नहीं है

घूमते सब लगाकर मुखौटे
भेड़ीया नस्ल पर आदमी है

यूँ करम रव तिरे हैं बहुत से
जिन्दगी उस बिना बेबसी है

दिल मिरे जगह तेरी वही है
बेवफा तू जुबाँ से फिरी हैं

है बड़ी कशमकश दिल करूँ क्या
कल तलक थी ख़ुशी अब गमी है

फासले दरमियाँ कम न होते
दूर जैसे फ़लक से जमीं है

गोद मे में मरुँ बस तिरी ही
ये तमन्ना मिरी आखिरी है



सपना मांगलिक 


  • जन्म: 17 फरवरी-1981 भरतपुर (राजस्थान)। 
  • शिक्षा: एम.ए.; बी.एड.; एक्सपोर्ट मैनेजमेंट डिप्लोमा।
  • प्रकाशन : पापा कब आओगे, नौकी बहू (कहानी संग्रह), सफलता रास्तों से मंज़िल तक, ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्द्य संग्रह), कमसिन बाला, कल क्या होगा, बगावत (काव्य संग्रह), जज़्बा-ए-दिल भाग -प्रथम, द्वितीय, तृतीय (ग़ज़ल संग्रह), टिमटिम तारे, गुनगुनाते अक्षर, होटल जंगल ट्रीट (बाल साहित्य)
  • प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण
  • संपादन : तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह) स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान)
  • संस्थापक : जीवन सारांश समाज सेवा समिति, बज़्म-ए-सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति)
  • सदस्य : ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया, अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव, महानगर लेखिका समिति आगरा, साहित्य साधिका समिति आगरा, सामानांतर साहित्य समिति आगरा, आगमन साहित्य परिषद हापुड़, इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन, दिल्ली
  • सम्मान : विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित
  • रचना कर्म : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
  • सम्पर्क : एफ-659, कमला नगर, आगरा-282005
  • फोन-9548509508
  • ईमेल –sapna8manglik@gmail.com

परिक्रमा: ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ‘संकल्पना’ लोकार्पित


       ‘वृद्धावस्था विमर्श’ का लोकार्पण प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने किया। पुस्तक की प्रथम प्रति
       स्वीकार करते हुए प्रो. आनंद राज वर्मा। साथ में, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. अहिल्या
मिश्र, राजेश प्रसाद, प्रो.ऋषभ देव शर्मा एवं अन्य।


‘संकल्पना’ का लोकार्पण करते हुए डॉ. अहिल्या मिश्र। साथ में, डॉ.
मंजु शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा।
               

                 साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में पिछले दिनों आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद के नामपल्ली स्थित सभाकक्ष में स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद कृत ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘संकल्पना’ शीर्षक  दो पुस्तकों का लोकार्पण समारोह भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ जिसमें उपस्थित विद्वानों ने हिंदी साहित्य और विमोचित पुस्तकों पर विचार व्यक्त किए। अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय  के भारत अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए  निरंतर बढ़ती जा रही वृद्धों की आबादी के पुनर्वास को इक्कीसवीं शताब्दी की एक प्रमुख चुनौती बताया और विमोचित कृति ‘वृद्धावस्था  विमर्श’ को सामयिक तथा प्रासंगिक पुस्तक माना. उन्होंने अनुसंधान के स्तर की गिरावट पर चिंता जताते हुए इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि ‘संकल्पना’ में प्रकाशित ज़्यादातर शोधपत्र अभिनव, मौलिक और उच्च कोटि के हैं।

               स्त्रीविमर्श की पैरोकार और  आथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के हैदराबाद अध्याय की संयोजक डॉ. अहिल्या मिश्र ने अध्यक्षीय भाषण में प्राचीन भारतीय समाज में वृद्धों की सम्मानजनक स्थिति की तुलना उनकी वर्तमान हीन दशा से करते हुए विश्वास प्रकट किया कि चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की पुस्तक समाज को इस दिशा में नए चिंतन और वृद्धावस्था-नीति के निर्माण की प्रेरणा दे सकती है। दूसरी लोकार्पित पुस्तक ‘संकल्पना’ को उन्होंने शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए उपयोगी प्रतिमान की संज्ञा दी. ‘वृद्धावस्था विमर्श’ की प्रथम प्रति स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के पुत्र राजेश प्रसाद तथा वरिष्ठ शिक्षाविद आनंद राज वर्मा ने स्वीकार की। इस अवसर पर डॉ. वर्मा ने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के व्यक्तिगत गुणों और साहित्यिक देन की चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने उर्दू साहित्यकारों पर केंद्रित समीक्षात्मक लेखन के अलावा विश्व साहित्य की अनेक अमर कहानियों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया था।

               समारोह की समन्वयक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने अतिथियों और विमोच्य कृतियों का परिचय देते हुए बताया कि ‘वृद्धावस्था विमर्श’ विश्वविख्यात अस्तित्ववादी स्त्रीविमर्शकार सिमोन द बुवा के ग्रंथ ‘द ओल्ड एज’ का हिंदी सारानुवाद है तथा ‘संकल्पना’ में दक्षिण भारत के 39 शोधार्थियों के शोधपरक आलेख सम्मिलित हैं जिनका सबंध विविध समकालीन विमर्शों से है। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने यह जानकारी भी दी कि यथाशीघ्र चंद्रमौलेश्वर प्रसाद द्वारा अनूदित कहानियों को भी पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा और ‘संकल्पना’ की अगली कड़ी के रूप में शोधपत्रों का दूसरा संकलन ‘अन्वेषी’ शीर्षक से प्रस्तुत किया जाएगा।  

              आरंभ में टी. सुभाषिणी ने सरस्वती-वंदना की और डॉ. पूर्णिमा शर्मा, वर्षा कुमारी, मोनिका शर्मा एवं वी. कृष्णा राव ने उत्तरीय प्रदान कर अतिथियों का स्वागत किया। संतोष विजय मुनेश्वर ने स्वागत-गीत और अर्चना पांडेय ने वर्षा-गीत सुनाकर समां बाँध दिया। संचालन डॉ. मंजु शर्मा ने किया.समारोह में नाट्यकर्मी विनय वर्मा, वैज्ञानिक डॉ. बुधप्रकाश सागर, राजभाषा अधिकारी लक्ष्मण शिवहरे, सामाजिक कार्यकर्ता द्वारका प्रसाद मायछ, रोहित जायसवाल, राजेंद्र परशाद, गुरु दयाल अग्रवाल, विनीता शर्मा, नरेंद्र राय, कुमार लव, संपत देवी मुरारका, डॉ. करन सिंह ऊटवाल,  डॉ. सीमा मिश्र, डॉ. बनवारी लाल मीणा, डॉ. जी. प्रवीणा, डॉ. रमा द्विवेदी, डॉ. वेमूरि हरि नारायण शर्मा, डॉ. बी. सत्य नारायण, डॉ. मिथलेश सागर, डॉ. रियाज़ अंसारी, डॉ. सुमन सिंह, डॉ. श्री ज्ञानमोटे, डॉ. महादेव एम. बासुतकर, डॉ. अर्पणा दीप्ति, डॉ. बी. बालाजी, वी. देवीधर, मोहम्मद आबिद अली,  पी. पावनी, अशोक कुमार तिवारी, पूनम जोधपुरी, भंवर लाल उपाध्याय, जी. परमेश्वर, सरिता सुराणा, सुस्मिता घोष और गौसिया सुल्ताना  सहित विविध विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े शताधिक विद्वान, लेखक, शोधार्थी और हिंदीसेवी  सम्मिलित हुए। अंत में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ‘प्रेम बना रहे!’ कहते हुए आयोजन में सहयोग के लिए सबका आभार व्यक्त किया।

प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा


सह-संपादक ‘स्रवंति’, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
हैदराबाद -500004 (तेलंगाना)

पुस्तक समीक्षा: सात्विकता के साथ ही सामीप्य की विरल अनुभूति कराते गीत




                 ‘यादों की नागफनी’-गीत-नवगीत संग्रह/स्व. श्याम़ श्रीवास्तव 


                    ‘यादों की नागफनी’सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर के लाड़ले रचनाकार स्व. श्याम़ श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है जिसे उनके स्वजनों ने अथक प्रयास कर उनके ७५ वें जन्म दिवस पर प्रकाशित कर उनके सरस-सरल व्यक्तित्व को पुनः अपने बीच महसूसने का श्लाघ्य प्रयास किया। स्व. श्याम ने कभी खुद को कवि, गायक, गीतकार नहीं कहा या माना, वे तो अपनी अलमस्ती में लिखते - गाते रहे। आकाशवाणी ए ग्रेड कलाकार कहे या श्रोता उनके गीतों-नवगीतों पर वाह-वाह करें, उनके लिये रचनाकर्म हमेशा आत्मानंद प्राप्ति का माध्यम मा़त्र रहा। आत्म में परमात्म को तलाशता-महसूसता रचनाकार विधाओं और मानकों में बॅंधकर नहीं लिखता, उसके लिखे में कहा-क्या बिना किसी प्रयास के आ गया यह उसके जाने के बाद देखा-परखा जाता है। यादों की नागफनी में गीत-नवगीत, कविता तीनों हैं। श्याम का अंदाज़े-बया अन्य समकालिकों से जुदा है- 

‘‘आकर अधेरे घर में/चौंका दिया न तुमने
मुझको अकेले घर में/मौका दिया न तुमने
तुम दूर हो या पास/क्यों फर्क नहीं पड़ता?
मैं तुमको गा रहा हू/हू का दिया न तुमने

                ‘जीवन इक कुरुक्षेत्र’ में श्याम खुद से ही संबोधित हैं- "जीवन / इक कुरुक्षेत्र है / मैं अकेला युद्ध लड़ रहा /अपने ही विरुद्ध लड़ रहा ......... शांति / अहिंसा क्षमा को त्याग / मुझमें मेरा बुद्ध लड़ रहा।" यह बुद्ध आजीवन श्याम की ताकत भी रहा और कमजोरी भी। इसने उन्हें बड़े से बड़े आघात को चुपचाप सहने और बिल्कुल अपनों से मिले गरल को पीने में सक्षम बनांया तो अपने ‘स्व’ की अनदेखी करने की ओर प्रवृत्त किया। फलतः, जमाना ठगकर खुश होता रहा और श्याम ठगे जाकर। श्याम के नवगीत किसी मानक विधान के मोहताज नहीं रहे। आनुभूतिक संप्रेषण को वरीयता देते हुए श्याम ‘कविता कोख में’ शीर्षक नवगीत में संभवतः अपनी और अपने बहाने हर कवि की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं। 

                    तुमने जब/समर्पण किया 
                    धरती आसमान मुझे/हर जगह क्षितिज लगे।
                    छुअन-छुअन मनसिज लगे। 
                    कविता आ गई कोख में।
                    वैचारिक लयता / उगी /मिटटी पगी
                    राग के बयानों की/भाषा जगी
                    छंद-छंद अलंकार- पोषित हुए
                    नव रसों को ले कूदी /चिंतन मृगी
                    सृष्टि का/ अर्पण किया
                    जनपद की खान मुझे 
                    समकालिक क्षण खनिज लगे।
                    कथ्य उकेरे स्याहीसोख में।
                    कविता आ गई कोख में। 

                  श्याम के श्रृंगारपरक गीत सात्विकता के साथ-साथ सामीप्य की विरल अनुभूति कराते हैं। ‘नमाज़ी’शीर्षक नवगीत श्याम की अन्वेषी सोच का परिचायक है-

                    पूर्णिमा का चंद्रमा दिखा
                    विंध्याचल-सतपुड़ा से प्रण
                    पत्थरों से गोरे आचरण
                    नर्मदा का क्वांरापन नहा
                    खजुराहो हो गये हैं क्षण
                    सामने हो तुम कुरान सी
                    मैं नमाज़ी बिन पढ़ा-लिखा

                   ‘बना-ठना गाव’ में श्याम की आंचलिक सौंदर्य से अभिभूत हैं। उरदीला गोदना, माथे की लट बाली, अकरी की वेणी, मक्का सी मुस्कान, टिकुली सा फूलचना, सरसों की चुनरिया, अमारी का गोटा, धानी किनार, जुन्नारी पैजना, तिली कम फूल जैसे कर्णफूल, अरहर की झालर आदि सर्वथा मौलिक प्रतीक अपनी मिसाल आप हैं। समूचा परिदृश्य श्रोता/पाठक की आखों के सामने झूलने लगता है। 

                    गोरी सा / बना-ठना गाव 
                    उरदीला गोदना गाव।
                    माथे लट गेहू की बाली
                    अकरी ने वेणी सी ढाली,
                    मक्का मुस्कान भोली-भाली 
                    टिकुली सा फूलचना गाव।

                    सरसों की चूनरिया भारी
                    पल्लू में गोटा अमारी,
                    धानी-धानी रंग की किनारी 
                    जुन्नारी पैंजना गाव।

                    तिली फूल करनफूल सोहे
                    अरहर की झालर मन मोहे,
                    मोती अजवाइन के पोहे।
                    लौंगों सा खिला धना गाव।

                   श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार स्व, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने श्याम की रचनाओं को ‘विदग्ध, विलोलित, विभिन्न आयामों से गुजरती हुई अनुभूति के विरल क्षणों को समेटने में समर्थ, पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ नई उदभावनाओं को सॅंजोने में समर्थ तथा भावना की आच में ढली भाषा से संपन्न‘’ ठीक ही कहा है। किसी रचनाकार के महाप्रस्थान के आठ वर्ष पश्चात भी उसके सृजन को केंद्र में रखकर सारस्वत अनुष्ठान होना ही इस बात का परिचायक है कि उसका रचनाकर्म जन-मन में पैठने की सामथ्र्य रखता है। स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार ‘‘कवि का निश्छल सहज प्रसन्न मन अपनम कथ्य के प्रति आश्वस्त है और उसे अपनी निष्ठा पर विश्वास है। पुराने पौराणिक प्रतीकों की भक्ति तन्मयता को उसने अपनी रूपवर्णना और प्रमोक्तियों में नये रूप् में ढालकर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान की हैं।’’
                    श्याम के समकालीन चर्चित रचनाकारों सर्वश्री मोहन शशि, डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, संजीव वर्मा ‘सलिल’ की शब्दांजलियों से समृद्ध और श्रीमती पुष्पलता श्रीवास्तव, माधुरी श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव, रचना खरे तथा सुमनलता श्रीवास्तव की भावांजलियों से रससिक्त हुआ यह संग्रह नयी पीढ़ी के नवगीतकारों ही नहीं तथाकथित समीक्षकों और पुरोधाओं को नर्मदांचल के प्रतिनिधि गीतकार श्याम श्रीवास्तव के अवदान सें परिचित कराने का सत्प्रयास है जिसके लिये शैली निगम तथा मोहित श्रीवास्तव वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं। श्याम सामाजिक विसंगतियों पर आघात करने में भी पीछे नहीं हैं। "ये रामराजी किस्से / जनता की सुख-कथाए / भूखे सुलाते बच्चों को / कब तलक सुनायें", "हम मुफलिस अपना पेट काट / पत्तल पर झरकर परस रहे", "गूँथी हुई पसीने से मजदूर की रोटी, पेट खाली लिये गीत गाता रहा" आदि अनेक रचनाए इसकी साक्षी हैं। तत्सम-तदभव शब्द प्रयोग की कला में कुशल श्याम श्रीवास्तव हिंदी, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को भाव-भंगिमाओं की टकसाल में ढालकर गीत, नवगीत, ग़ज़ल, कविता के खरे सिक्के लुटाते चले गये। समय आज ही नहीं, भविष्य में भी उनकी रचनाओं को दुहराकर आश्वस्ति की अनुभूति करता रहेगा।

  • समीक्ष्य पुस्तक-यादों की नागफनी/गीत संग्रह, स्व. श्याम़ श्रीवास्तव/प्रथम संस्करण-2016/ प्रकाशक: शैली प्रकाशन, 20 सहज सदन, शुभम विहार, कस्तूरबा मार्ग, रतलाम (म.प्र.) /मूल्य रू. 150/संपादन- डा. सुमनलता श्रीवास्तव 


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


समन्वयम, 204-विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मो. 9425183244, 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

राग तेलंग की कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अनिश्चितताएं


अनिश्चितताएं 
सनातन हैं
आज भी 
घर से निकलते ही
अनिश्चितताएं भी 
चप्पल पहनकर 
हमारे पीछे-पीछे चल पड़ती हैं
हमारे अपने 
जिस भय को ओढ़े रहते हैं
वे हमारे लौटने से जुड़ी अनिश्चितताएं ही हैं
चप्पलों की आवाज़ें
स्वप्नों तक में 
प्रवेश कर जाती हैं
हम अचकचाकर जाग जाते हैं
हर आहट में 
अनगिन संदेशों की 
संभावनाएं हैं
उनमें एक 
हमारा लौटना भी शामिल है
घर से 
सब कुछ निश्चित कर निकलना
कम से कम
एक अनिश्चय को 
पीछे छोड़ जाना तो है ही ।


ऋण


मैंने 
आंगन में
एक बीज बोया
घर में 
बच्चे को खिलाया
बच्चा बड़ा हुआ
बच्चे ने 
आंगन के पेड़ पर
झूला बांधा और मुझे झुलाया
मैंने सोचा
बीज ने आज 
सारा ऋण चुकाया ।


हीरा


जो बहुतों के पास नहीं होता
उसके बारे में बातें करने को
लोगों के पास 
बहुत समय होता है
कई बार तो
पूरी उम्र गुज़ार देते हैं
उसके सपनों में
जबकि रात भर
उनके सिरहाने रखी 
मोमबत्ती के बारे में 
वे सोचते तक नहीं
उन्हें 
ख़याल ही नहीं आता कि
बेचने के नाम पर
उनके ज़ेहन में
जो चेहरा
घुसता चला आ रहा है
वह अपने समय का 
ज़रूरी रहा नायक है
जो अब 
ग़ैरज़रूरी चीज़ों को खपाने के लिए 
नियुक्त किया गया है
हीरा थीं 
वे चीज़ें जिनके बगैर
जीवन की कल्पना तक 
मुश्किल थी
आओ फ़ेहरिस्त बनाएं
और तय करें कि
पसीना किसके लिए बहाएं ।


चिराग


एक चिराग जल रहा है
यदि यह 
एक दृश्य की बात है
तो रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह 
एक लिखे हुए वाक्य की बात है
तो भी रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह एक स्वप्न की बात है
तो भी रोशनी होना तय है
एक चिराग 
यदि नहीं जल रहा है
तो भी 
रोशनी का सवाल तो 
खड़ा होता ही है |

पुस्तक समीक्षा: संवाद के धरातल पर खड़ी ग़ज़लें





                 'पुखराज हवा मे उड़ रए हैं'–ग़ज़ल संग्रह/ नवीन सी चतुर्वेदी


'पुखराज हवा मे उड़ रए हैं'- यह ग़ज़ल-संग्रह पिछले वर्ष प्रकाशित हुआ और ब्रज –ग़ज़ल को बाकायदा एक रह्गुज़र मिली। ये रहगुज़र अब शाहराह बनने की राह पर है। मुल्के अदब की प्रेम-गली ग़ज़ल मे यूँ भी बहुत भीड है रिवायती ग़ज़ल के ऐवानो और जदीद ग़ज़ल के अंगुश्त बदंदाँ कर देने वाले शिल्पों /शाहकारों मे एक नया मकान एक नई तख़्ती कितने मक्बूल होंगे इसका फैसला सौ मुंसिफों का मुंसिफ़ वक़्त ही करेगा !! लेकिन कमाल की बात ये है कि ऊपर वाले ने नवीन सी चतुर्वेदी नाम की जो शय बनाई है इसके जोश ज़िद और जवानी के सामने ब्रज-ग़ज़ल के भविष्य पर लगाये जाने वाले क़यास वसवसे की ज़द से निकल कर अब उमीदो एतबार की पुख़्ता ज़मीन पर खडे नज़र आ रहे हैं।

हिन्दी को किसका ऋणी होना चाहिये ??!! आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का !! बाबूश्याम सुन्दर दास का ?!! मेरे देखे तो हिन्दी को सबसे पहले भारतेन्दु और देवकीनन्दन खत्री का ऋणी होना चाहिये क्योंकि जब भाषा का कोई विन्यास और मानदण्ड बहुत सुष्पष्ट नहीं हो तो उसे रचना प्रक्रिया का अंग बनाना एक असुरक्षित रास्ता है जिससे स्थापित साहित्यकार परहेज करते हैं –लेकिन जो शाहज़ादे इस चौथी सम्त जाते हैं वो अपनी मिट्टी और नस्लों को बहुत कुछ ऐसा दे जाते हैं जिसका मूल्यांकन सिर्फ आस्था , भावावेश और समर्पित धन्यवाद ही कर सकते हैं। बहुत सारी व्याकरणीय त्रुटियाँ मिलेंगी दुष्यंत की ग़ज़ल में –लेकिन ये पहला और आखिरी नाम है जिसके नाम से हिन्दी मे ग़ज़ल विधा की प्रतिष्ठा को मंसूब किया जायेगा। ब्रज –ग़ज़ल एक सोच है एक कोशिश है एक आन्दोलन है एक तूफान है एक ग़ुबार है –मैं नहीं जानता –लेकिन शत प्रतिशत इसका पूरा श्रेय नवीन नाम के मुश्ताको बेकरार को दिया जायेगा।     

दोस्तो !! अगर औपचारिकता की राह चलूँगा तो इस संकलन का सम्यक मूल्यँकन धुँधला पड जायेगा –ये मुझे किसी कीमत पर मंज़ूर नहीं।लिहाजा “पुखराज हवा मे उड रए हैं” पर जो कहूँगा बेबाक कहूँगा। बकौल इफ़्तिख़ार आरिफ–मेरी ज़मीन मेरा आखिरी हवाला है // सो मैं रहूँ न रहूँ इसको बार वर कर दे, ऐसी ही शिद्दत के साथ नवीन ने ब्रज-ग़ज़ल को साहित्य मे स्थापित करने की जो मुहिम छेडी है –उसके लिये इनकी जितनी प्रशंसा की जाय कम होगी। ये पुस्तक ब्रज –ग़ज़ल की पहली पुस्तक है और ये नवीन सी चतुर्वेदी के लिये नहीं बल्कि गज़ल विधा में ब्रज भाषा में कही गई गज़ल की स्थापना के लिये किया जाने वाला अभिनव प्रयास है !!
सवाल है कि हरियानवी ग़ज़ल कही जा रही है, भोजपुरी ग़ज़ल कही जा रही है, लेकिन कोई बहुत बडी आवाजों मे ये प्रयास तब्दील नहीं हो सके, इसका कारण क्या है ?! इस बिन्दु पर मैं कुछ देर तक इस बहस को रोकना चाहता हूँ !! क्योंकि नवीन के संग्रह के अनेक शेर पढने के बाद ऐसा लगता है कि ब्रज –गज़ल युगों से कही जा रही है !! हमे भाषा विज्ञानियों से इसका जवाब माँगना होगा !! हमे तारीख मे इसका जो जवाब मिलता है वो ये है कि खडी बोली हिन्दुस्तानी  अरबी फारसी बोलने वाली फौज के भारतीय लोक भाषाओं के दीर्घकालीन संवाद और समागम की उपज है –अब अरबी फारसी बोलने वाली फौज का पहला पडाव तो दिल्ली ही था और दिल्ली के निकट इलाकों पहली और समृध भाषा कौन सी थी जिसने खडी बोली हिन्दुस्तानी के विकास में प्राथमिक भूमिका निभाई होगी –ये ब्रज भाषा ही थी। सूरदास और रसखान द्वारा पूर्णत: परिपक्व और एक बहुत बडे भौगोलिक क्षेत्र मे बोली जाने वाली भाषा। लिहाजा अगर ब्रज भाषा उर्दू के अरकान पर खडी बहरों मे बहुत सुगमता से अपनी जगह बना ले तो कोई आश्चर्य नहीं । इस फार्मेट  मे किसी भी भाषा के लिये गुंजाइश है लेकिन पहले पहले सुनी गई नवीन की बज –ग़ज़ल में एक ऐसी परिपक्वता नज़र आ रही है कि ब्रज गज़ल गज़ल विधा का नया आयाम लग ही नहीं रही वरन वली दकनी के सृजन की भाँति ही गज़ल विधा का अभिन्न अंग जैसी लग रही है।

नवीन ने अर्थ उद्बोधन के लिये ब्रज के समांतर हिन्दी गज़ल भी कही है। इस संकलन का एक पोशीदा और दिलचस्प पहलू ये भी है कि गज़लकार हिन्दी गज़ल मे महारत पहले से रखता है और ये भी कि अपनी अहर्निश प्रयोगधर्मिता और नई रदीफ़ नये काफ़ियों के पैमाने पर इस संकलन का मूल्यांकन करने पर शाइर ने ब्रज –भाषा की ग़ज़ल के अरूज़ को तवज़्ज़ेह दी है, गो कि इस शहादत की ज़रूरत नहीं थी। नवीन चाहते तो अपना पहला हिन्दी गज़ल संकलन शान से प्रकाशित करवा सकते थे और अपना चरचा करवा सकते थे –लेकिन इरादे पाक हैं और नीयत साफ है कि ये मुहिम ब्रज –ग़ज़ल की स्थापना और विकास के लिये है।  
मुझे इस संकलन में कई शेर/ मिसरे इतने खूबसूरत मिले हैं कि उन्हें दोहों लोकोक्तियों और मुहावरों में स्थान मिलना चाहिये –
पीर पराई और उपचार करें अपनौ
संत –जनन के रोग अलग्गइ होमुत एँ (1)
अपनी खुसी से थोरे ई सबने करी सही
बोहरे ने दाब दूब के करवा लई सही (2)
संग मे और जगमगामिंगे
मोतियन कूँ लडी में गूँथौ जाय (3)

कहा जाता है कि किसी शायर का कद अदब में जभी मुकम्मल होता है जब उसका चेहरा उसकी ग़ज़ल में दिखाई दे। तो जनाब नवीन की ब्रज गज़ल का ठाठ ऐसा है कि इनकी गज़ल अधिकारी संवाद के धरातल पर खडी है। कई ग़ज़लें मुसल्सल हैं और और अपनी वैचारिक समृद्धता के दम पर मुखातिब को सीधे अपने इख़्तियार मे लेने की कुव्व्त रखती हैं। एक बात और कि ब्रज भाषा ग़ज़ल फार्मेट में और खडी बोली हिन्दुस्तानी से अपनी निकटता के कारण इस विधा के माध्यम से फिर अपना पुराना वैभव प्राप्त कर सकती  है इसके बडे ही स्पष्ट इम्कान/संकेत इस संकलन मे दिखाई पडे हैं।
हमारे गाम ही हम कूँ सहेजत्वें साहब
सहर तो हमकूँ सपत्तौ ही लील जामुत एँ (1)
न जानें चौं बौ औघड हमन पै पिल पर्यो तो
कह्यो जैसे ई बासूँ –सबेरौ ह्वै गयो ए (2)
नाच गाने के तईं पूजन हबन मँहगे परे
आज के सस्ते समय मे आचरन मँहगे परे (3)
बरफ के गोलन की बर्सा जब हो रई ह्वै
ऐसे में हम अपना मूँड मुडामें चौ (4)
सब्को इक दिन किनारे लगनो हतै
और कुछ रोज बाढ मे बहि ल्यौ (5)

किसी ग़ज़लकार के कैनवस का सम्बन्ध उस परिवेश से भी होता है जो हमारे संस्कार और तर्बीयत का उत्तरदायी होता है !! ब्रज –गोकुल –मथुरा –वृन्दावन एक भारतीय के मानस के अभिन्न अंग हैं चाहे महाभारत के कारण चाहे भागवत्पुराण के कारण और चाहे गीता के कारण !! ये स्थान इस देश के सर्वकालीन युगदृष्टा भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं और हमारी समाजिक विचारधाराओं के समागम- स्ंक्रमण और प्रवाह का इन स्थानो से एक अटूट सम्बन्ध है – चाहे वो धर्म की पुनर्स्थापना हो, चाहे वो रूढियों को तोड कर जीवन को नये मानदण्डों पर स्थापित करने का सफल प्रयास हो, चाहे वो शुष्क़ और नीरस जीवन विहीन जीवन की पैरवी करने वाली धर्मप्रणालियों मे नवीन संचेतना भर कर धर्म को जीवन निर्माण और सामाजिक आरोह का सार्थक उपकरण बनाने का स्तुत्य प्रयास हो – ये सब कुछ भारत के इसी भूखण्ड ब्रज मे सम्भव हुआ था और आज भी इस परिवर्तन का उपभोक्ता हमारा समाज है। तो फिर अवश्य यहाँ की भाषा मे –उच्चारण मे – अभिव्यक्ति मे कुछ खास होगा जिसने संवाद के सेतु को भावनाओं का पालना बना दिया। गौर कीजिये ब्रज भाषा की मिठास को !!– क्या बात है इसमें!! –भले ही दग्ध वर्णों का इसमे इस्तेमाल हो लेकिन ब्रज भाषा तो ह्रदय के लिये चाशनी से कम नहीं !! जिसने सुनी हो वही इस गूँगे के गुड का स्वाद जानता है! दूसरी बात कि ग़ज़ल का एक अर्थ स्त्रियों से बातचीत भी है यानी आपको नर्म, नाज़ुक, ह्रदयस्पर्शी और भावनाप्रधान होना होगा! इस मानदण्ड पर तो ब्रज सभी भाषाओ से बाजी मार सकती है – ग़ज़ल के मर्क़ज़ के लिहाज से तो यही सबसे मुफ़ीद ज़बान होनी चाहिये इसलिये मुझे कौतुक नहीं है कि क्यों ब्रज –गज़ल अपने इब्तिदाई रूप मे ही इतनी मोहक और आलोडित करने वाली प्रतीत हो रही है।
चन्द बदरन ने हमें ढाँक दयौ
और का करते चन्द्रमा जो हते (1)
आँख बारेन कूँ लाज आबुत ऐ
देख्त्वे ख्वाब जब नजर बारे (2)
द्वै चिरिया बतराइ रई ऐं चौरे मे
दरपन हमकूँ दिखाइ रई हैं चौरे मे (3)
 छान मारे जुगन जुगन के ग्रंथ
इक पहेली  ए दिल्रुबा कौ रुख (4)

निश्चित रूप से ब्रज –गज़ल के विचार को विचारधारा बनना चाहिये। इससे संवाद को एक निर्विवाद शैली मिलेगी जिसमे प्रेम ही प्रेम छलकेगा-  भाषा को एक आधार मिलेगा जिसमे भावना का प्राचुर्य होगा और मंच को भी एक स्वर मिलेगा जिसमे सम्मोहन होगा। ये सब कुछ ब्रज गज़ल के विकास पर निर्भर करेगा। ये दौरे हाज़िर की ज़रूरत भी है क्योंकि गज़ल के मंच को भी फिरकापरस्ती की ऐशगाह बनाने की कोशिशे खुलेआम की जा रही हैं। नवीन ने इस पुस्तक की भूमिका में भी स्पष्ट किया है कि डाक्यूमेण्ट की गई ब्रज भाषा और मथुरा क्षेत्र में बोली जाने वाली ब्रज भाषा मे भिन्नता के बावज़ूद समरसता है यानी दोनो स्थानो की भाषा का इम्पैक्ट समान है  – होनी भी चाहिये – वगर्ना लखनऊ की लिखी पढी जाने वाली ज़ुबान बहुत ज़हीन है लेकिन चौक नख़्खास मे बोली जाने वाली ज़ुबान सुनने लायक भी नहीं आज की तारीख़ मे। 
जैसे ई पेटी में डार्यो बोट , कुछ ऐसो लग्यो
देवतन ने जैसें महिसासुर कूँ बेटी दै दई

इस शेर का मिसरा ए अव्वल हमारी राजनैतिक विवशता का सम्पुट है तो मिस्रा ए सानी एक बेहतरीन तश्बीह है। लेकिन इसके आगे देखिये ये शेर भाषा के साथ संस्कृति की भी पैरवी और परवरिश कर रहा है।    
घर को रस्ता सूझत नाँय
हम सच में अन्धे ह्वै गये

बहुत सामान्य बात से एक असाधारण पहलू निकाला है –हम अपने स्व के दायरे को भूल चुके है – अपस्ंस्कृति के शिकार है मगरिबी तहज़ीब की ओर नई नस्लें माइल हैं और बकौल शुजा ख़ाबर –इन तेज़ उजलो से बीनाई को खतरा है –तो हम आज इसके चलते अपने दिशाबोध और उद्देश्यों को भूल से चुके हैं।     
जबै हाथन में मेरे होतु ऎ पतबार
तबै पाइन में लंगर होतु ऐ भइया

जीवन के संसाधनो और प्रवाह के साथ एक न एक मजबूरी –और क्या खूब पतबार और लंगर शब्दो का इस्तेमाल किया है।  
चैन से जीबो हू दुसबार भयौ है अब तौ
दिल समर जाय तौ अरमान मचल जामतु ऐं

दिल किसी तौर सम्भाला तो जिगर बैठ गया जैसी बात है इस शेर में।    
हम तो कब सूँ सेहरा बाँधे बैठे हतें
आज कहौ तो आज इ माँग भरें साहब
हम हैं मुश्ताक और वो बेजार
या इलाही ये माजरा क्या है ??!! 
हम उदासी के कोख जाये हतें
जिन्दगी कूँ न रास आये हम

हम एक चीत्कार से जीवन आरम्भ करते हैं और एक हिचकी पर हमारा जीवन समाप्त हो जाता है –ये हमारे युग की -जीवन की विडम्बना है- जो कमोबेश हमारी नियति बन चुकी है। नवीन के इस संकलन में भाषा के वर्तमान स्वरूप –आम बोलचाल की भाषा इतने सहज्ग्राह्य रूप में इस्तेमाल  की गई है कि उन लोगों को दिक्कत हो सकती है जो भाषा और व्याकरण की शुद्धि के केशवदास हैं जिनके  हिसाब से भाषा इतनी शुद्ध होनी चाहिये कि अस्पृश्य हो जाय - ये लोग अरूज़े फिक्रो फन और मेयार के नाम पर अव्यवहारिक भाषा और नितांत पुस्तकीय अभिव्यक्तियों के असीर होते हैं। ऐसों के उपालम्भ का बुरा मानने की ज़रूरत नहीं। अगर रेगिस्तान को शस्य श्यामल करना है तो पहली बरसात को भाप बनना ही होगा। इस संकलन में इरेज़र, इंवेस्ट,इस्माइल, मीटिंग , ट्राफी, बिल्दर डाक्टर , टैक्स एक्सपोर्ट जैसे अंग्रेज़ी शब्दों को सही जगह और सही तरीके से इस्तेमाल किया गया है – बिप्र छ्त्री बनिया किरपा गोरस घुमेर जैसे ठेठ हिन्दी के शब्द मिजाज़ और माहौल बनाने में समर्थ हैं इसके सिवा एक समर्थ ग़ज़लकार के पास जो काइअनाती मनाज़िर होते हैं और उनके सिम्बल्स जिस भावना और विचार के सम्वाहक होते हैं उनका भी बहुत खूबसूरत प्रयोग इस पुस्तक में मिलता है।  इस संकलन की हर ब्रज गज़ल के समांतर हिन्दी ग़ज़ल भी शाइर ने कही है और कई शेर इतने शानदार हैं कि उनका ज़िक्र न करना एक भूल होगी –
इतने रोज़ कहाँ थे तुम
आइने शीशे हो गये (1)
ये क्या कि रोज़ बहारों को ढूँढते हैं हम
कभी –कभार खुद अपनी भी जुस्तजू हो जाय (2)
कोई उस पार से आता है तसव्वुर लेकर
हम यहाँ खुद को कलाकार समझ लेते हैं (3)
(देनहार कौउ और है भेजत है दिन रैन
लोग भरम हम पर धरै जाते नीचे नैन ( रहीम))  
ओस की बूँदें मेरे चारों तरफ़ जमा हुईं
देखते देखते दरिया के मुकाबिल हुआ मैं (4)
(मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर
लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया)
लडखडाहट पे हमारी कोई तनक़ीद न कर
बोझ को ढोया भी है सिर्फ उठाया ही नहीं (5)

    माथुरस्थ माथुर् चतुर्वेद संस्कार में जन्मे नवीन सी चतुर्वेदी आज की तारीख में मुम्बई शहर में बायोमीट्रिक –सिम और सी सी टी वी व्यवसाय से जुडे हैं –यानी  इस व्यक्ति ने ब्रज –गोकुल मथुरा –व्रन्दावन गली हाट बाज़ार गाँव कस्बे की ज़िन्दगी को बहुत निकट से देखा है – हिन्दी के सभी छ्न्दों ( कवित्त सवैया दोहा कुण्डली ) मे इन्हें महारथ हासिल है –गज़ल की शाहराह पर भी कम समय में ये तेज़ कदम चल कर बहुत आगे पहुंचे हैं और आज मरीन ड्राइव और नरीमन पाइंट वाले शहर में 1500 वर्ग फ़ीट के ऐसे घर में रहते हैं जिसके चारों ओर सम्मोहित कर देने वाली हरियाली है। मुम्बई में अगर आपकी सुबह-शाम पक्षियों के कलरव को सुन सकती है तो आप यकीनन भाग्यशाली हैं – ये घर नवीन का व्यक्तिगत चुनाव है ।  कोई आश्चर्य नहीं कि जीवन के इस सफर की सारी अनुगूँज उनकी ग़ज़लों मे मिलती है। ठेठ देशज शब्द – प्रचलित अंग्रेज़ी शब्द –प्रांजल हिन्दी शब्द -  गज़ल के रिवायती अल्फाज़ – हाट -बाज़ार -गली नुक्कड – मल्टी स्टोरी – प्रयोग -परम्परा सभी कुछ नवीन की ग़ज़ल ने आत्मसात कर रखे हैं और इसके ही साथ उन्होंने इस अनुभूति को बज भाषा और ग़ज़ल विधा के माध्यम से एक नई रहगुज़र पर उतार दिया है। नवीन जदीदियत के दुस्साहस की हद तक पैरोकार हैं – अनेक बहुत अच्छे शेर कहने के बाद भी वो सिर्फ उनपर आश्रित नहीं रहते वरन हमेशा प्रयोगधर्मिता को तर्ज़ीह देते हैं। इसके सिवा आप नवीन के सोच को बदल नहीं सकते – नवीन मात्र वैचारिक धरातल पर नहीं जीते वरन विचार को कर्मभूमि पर उतारने वाले हठयोगी भी हैं – बहुत कम समय में ब्रज ग़ज़ल को आकशवाणी कार्यक्रमों में स्थान मिलने लगा है और टीवी प्रोड्यूसरों ने इसके प्रसारण में रुचि दिखानी आरम्भ कर दी है–ये नवीन की ही अहर्निश ऊर्जा का प्रतिफल है।

ठाले-बैठे ब्लाग में उन्होने पुराने छन्दों पर अनेक सफल आयोजन किये और यह साबित किया कि अगर प्लेटफार्म दिया जाय और कंवीनर समर्पित हो तो किसी भी विधा को आज भी पुनर्जीवित किया जा सकता है और साहित्यकारों को उनके विभव से परिचित कराया जा सकता है। बज –ग़ज़ल एक नवीन विचार है और ब्रज भाषा के माधुर्य और गज़ल की स्वीकार्य बहरों के अर्कान के साथ इसका सहज समागम, मुम्किन है कि अभिव्यक्ति को एक नया संगीत और नया स्वर उपलब्ध करा दे। भारत मे जब पश्चिमी संगीत के कदम बढे तो गुरुदास मान –इला अरुण ने पंजाबी राजस्थानी नृत्य और संगीत का रैप म्यूज़िक के साथ एक ब्लेण्ड प्रस्तुत किया था जो सुपर्हिट रहा। हमारी मिट्टी और चेतना की सिफत ऐसी है कि अगर कोई साँसारिक व्रत्ति हमे निगलने के लिये आती है तो हम उसे आत्म्सात कर लेते हैं। ग़ज़ल पर भी अर्से से अल्लामा सम्प्रदाय का कब्ज़ा है –ये लोग “लहर” को 21 के वज़्न में इस्तेमाल कर सकते हैं ब्राहमण को बिरहमन उच्चारण करते हैं “धारा”  को पुर्लिंग मे इसतेमाल करते हैं–लेकिन देवनगरी ग़ज़ल के शाइरों की तंज़ो मलामत में कहीं चूक नहीं करते ताकि इस विधा पर उनका एकाधिकार बना रहे। जबकि ग़ज़ल एक विधा के रूप में खाँटी उर्दू की असीरी में रह ही नहीं सकती। जब इस विधा के पास इतना विशाल पाठक वर्ग है तो इस नदी की अन्य धारायें भी बहेंगी और उनमे से कोई अपने प्रवाह और लहरों के बल पर एक अलग पहचान बनाने में निश्चित रूप से सफल भी हो सकती है। ब्रज भाषा में ये अनासिर बडे साफ दिखाई दे रहे हैं। 

  • समीक्ष्य पुस्तक-पुखराज हवा में उड़ रए हैं/ गज़ल संग्रह-नवीन सी चतुर्वेदी/प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन, 942, मुट्ठीगंज इलाहाबाद-3 (उत्तर प्रदेश) / मूल्य रू. 100


मयंक अवस्थी 


बी -11,
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास,
तिलक नगर, कानपुर-208002
ईमेल-awasthimka@gmail.com

मंगलवार, 21 जून 2016

नवीन सी चतुर्वेदी की ब्रज-ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


मीठे बोलन कों सदाचार समझ लेवें हैं ।
लोग टीलेन कों कुहसार समझ लेवें हैं ॥

दूर अम्बर में कोऊ आँख लहू रोवै है।
हम यहाँ वा’इ चमत्कार समझ लेवें हैं ॥

कोऊ  बप्पार सों भेजै है बिचारन की फौज।
हम यहाँ खुद कों कलाकार समझ लेवें हैं ॥

पैलें हर बात पे लड्बौ ही सूझतौ हो हमें।
अब तौ बस रार कौ इसरार समझ लेवें हैं ॥

भूल कें हू कबू पैंजनिया कों पाजेब न बोल।
सब की झनकार कों फनकार समझ लेवें हैं ॥

एक हू मौकौ गँबायौ न जखम दैबे कौ।
आउ अब संग में उपचार समझ लेवें हैं ॥

अपनी बातन कौ बतंगड़ न बनाऔ भैया।
सार इक पल में समझदार समझ लेवें हैं ॥


(दो)


सब कछ हतै कन्ट्रौल में तौ फिर परेसानी ऐ चौं।
सहरन में भिच्चम –भिच्च और गामन में बीरानी ऐ चौं॥

जा कौ डस्यौ कुरुछेत्र पानी माँगत्वै संसार सूँ।
अजहूँ खुपड़ियन में बु ई कीड़ा सुलेमानी ऐ चौं॥

धरती पे तारे लायबे की जिद्द हम नें चौं करी।
अब कर दई तौ रात की सत्ता पे हैरानी ऐ चौं॥

सगरौ सरोबर सोख कें बस बूँद भर बरसातु एँ।
बच्चन की मैया-बाप पे इत्ती महरबानी ऐ चौं॥

सब्दन पे नाहीं भाबनन पे ध्यान धर कें सोचियो।
सहरन कौ खिदमतगार गामन कौ हबा-पानी ऐ चौं॥


(तीन)


कहाँ गागर में सागर होतु ऐ भैया।
समुद्दर तौ समुद्दर होतु ऐ भैया॥

हरिक तकलीफ कौं अँसुआ कहाँ मिल’तें।
दुखन कौ ऊ मुकद्दर होतु ऐ भैया॥

छिमा तौ माँग और सँग में भलौ हू कर।
हिसाब ऐसें बरब्बर होतु ऐ भैया॥

सबेरें उठ कें बासे म्हों न खाऔ कर।
जि अतिथी कौ अनादर होतु ऐ भैया॥

कबउ खुद्दऊ तौ गीता-सार समझौ कर।
जिसम सब कौ ही नस्वर होतु ऐ भैया॥

जब’इ हाथन में मेरे होतु ऐ पतबार।
तब’इ पाँइन में लंगर होतु ऐ भैया॥

बिना आकार कछ होबत नहीं साकार।
सबद कौ मूल - अक्षर होतु ऐ भैया॥


(चार)


अपनी खुसी सूँ थोरें ई सब नें करी सही।
बौहरे नें दाब-दूब कें करबा लई सही॥

जै सोच कें ई सबनें उमर भर दई सही।
समझे कि अब की बार की है आखरी सही॥

पहली सही नें लूट लयो सगरौ चैन-चान।
अब और का हरैगी मरी दूसरी सही॥

मन कह रह्यौ है बौहरे की बहियन कूँ फार दऊँ।
फिर देखूँ काँ सों लाउतै पुरखान की सही॥

धौंताए सूँ नहर पे खड़ो है मुनीम साब।
रुक्का पे लेयगौ मेरी सायद नई सही॥

म्हाँ- म्हाँ जमीन आग उगल रइ ए आज तक।
घर-घर परी ही बन कें जहाँ बीजरी सही॥

तो कूँ भी जो ‘नवीन’ पसंद आबै मेरी बात।
तौ कर गजल पे अपने सगे-गाम की सही॥


(पांच)


अँधेरी रैन में जब दीप जगमगावतु एँ। 
अमा कूँ बैठें ई बैठें घुमेर आमतु एँ॥

अब’न के दूध सूँ मक्खन की आस का करनी। 
दही बिलोइ कें मठ्ठा ई चीर पामतु एँ॥

अब उन के ताईं लड़कपन कहाँ सूँ लामें हम। 
जो पढते-पढते कुटम्बन के बोझ उठामतु एँ॥

हमारे गाम ई हम कूँ सहेजत्वें साहब। 
सहर तौ हम कूँ सपत्तौ ई लील जामतु एँ॥

सिपाहियन की बहुरियन कौ दीप-दान अजब। 
पिया के नेह में हिरदेन कूँ जरामतु एँ॥

तरस गए एँ तकत बाट चित्रकूट के घाट। 
न राम आमें न भगतन की तिस बुझामतु एँ॥



नवीन सी. चतुर्वेदी


  • 27 अक्तूबर 1968 को ब्रज-वैभव-कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के मथुरास्थ माथुर चतुर्वेद परिवार में जन्मे  नवीन सी. चतुर्वेदी वैदिक-अध्ययन से तकनीकी-कारोबार तक का सफ़र करने वाले चुनिन्दा व्यक्तियों में शुमार होते हैं। मुम्बई में सीक्युरिटी-सेफ्टी-इक्विपमेण्ट्स के व्यवसाय में संलग्न, स्वभाव से संकोची नवीन जी छन्द, ग़ज़ल, गीत सहित काव्य की अनेक विधाओं के साथ ही साथ गद्य-लेखन से भी जुड़े हुये हैं। अन्तर्जालीय पोर्टल साहित्यम, लफ़्ज़ एवम् कविता-कोष आदि के सम्पादन से जुड़े हुये हैं। आपने कई ओडियो कैसेट्स के लिये लेखन किया है। आप ने ब्रज भाषा में न सिर्फ़ गजलें लिखी हैं बल्कि इस विधा को विधिवत स्थापित भी किया है। महाकवि बिहारी के भानजे कृष्ण कवि ककोर की वंश परम्परा से जुड़े ब्रज-गजल-प्रवर्तक नवीन जी को ब्रज-गजलों की पहली पुस्तक 'पुखराज हबा में उड़ गए' प्रस्तुत करने का श्रेय प्राप्त है। आप पिंगलीय-छन्दों व उर्दू-अरूज का अर्जित ज्ञान लोगों के साथ बाँटने को सहर्ष उद्यत रहते हैं। आप वर्तमान समय को साहित्य का क्षरण-काल मानते हैं तथा स्तरहीन-काव्य-आयोजनों के समक्ष सरस और वैचारिक कविताओं को पुनर्स्थापित करने के लिये समर्पित हैं। आप का सपना है जिस तरह उर्दू शायरी के पास उस का अपना प्रबुद्ध-श्रोता-वर्ग है, काव्य की अन्य विधाओं को भी उसी तरह अपने-अपने हिस्से का बुद्धिजीवी वर्ग हासिल करना चाहिये।

मंगलवार, 14 जून 2016

अन्ना अख्मातोवा की दो कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



मैं उनके साथ हूँ


मैं उनके साथ नहीं हूँ जिन्‍होंने
शत्रुओं की यंत्रणाओं के हवाले कर दी है यह भूमि
मैं उनकी चापलूसी के झाँसे में नहीं आऊँगी
उनके हाथों में नहीं सौंपूँगी अपने गीत।
कैदी की तरह, रोगी की तरह
हर निर्वासित लगता है मुझे दयनीय,
ओ यायावर, अंधकार से भरी है तुम्‍हारी राह
कसैला तो लगेगा ही दूसरों की रोटी का स्‍वाद।
यहाँ आग के बेआवाज धुएँ में
शेष बचे यौवन का गला घोंटते हुए
एक भी प्रहार का मुँहतोड़ जवाब
दे नहीं पाए हम आज तक।
मालूम है हमें कि विलंबित मूल्‍यांकन में
न्‍यायसंगत ठहराया जाएगा हर पल...
पर दुनिया में कहीं भी नहीं हैं ऐसे लोग
जो हमसे अधिक हों अक्‍खड़, अश्रुविहीन और सरल।


अमन का गीत


आकाश की लहरों पर झूलते
पर्वत और समुद्र पार करते
उड़ते रहो अमन की फाख्‍ता की तरह
ओ मेरे मधुर गीत !
बताओ उसे जो सुन रहा है
कितना पास है वह चिर-प्रतीक्षित युग
क्‍या हाल हैं मनुष्‍य के तुम्‍हारे देश में।
तुम अकेले नहीं, बढ़ती जाएगी गिनती
तुम्‍हारे साथ उड़ती फाख्ताओं की -
दूर-दूर तक इंतजार कर रहे हैं
स्‍नेहिल मित्रों के हृदय
उड़ते रहो तुम सूर्यास्‍त की ओर
कारखानों के दमघोंटू धुएँ की ओर
हब्‍शी बस्तियों
और गंगा के नीले पानी की ओर।
(रूसी से अनुवाद: वरयाम सिंह)

पुस्तक समीक्षा: गज़ल के क्षितिज को वुसअत देता एक मौलिक इज़हार-मयंक अवस्थी




                     पाल ले इक रोग नादाँ–गज़ल संग्रह/ ग़ौतम राजरिशी


मैं कई उपमायें सोच रहा हूँ कि क्या नाम दूँ इस किरदार को ?!! 'एक आतिशफिशाँ जिसने खुद को ज़ब्त कर रखा है' –एक सूरज जिसमें शीतलता है–एक चाँद जिसमें आँच है–लेकिन शायद तश्बीहों की असीरी की ज़रूरत नहीं है। मैं अगर सिर्फ कर्नल गौतम राजरिशी ही कह देता हूँ इस किरदार को तो सब शुमार हो जायेगा खुद ब खुद। गौतम बर्फ़ में सुलगती आग पर काबू रखने की नौकरी कर रहे हैं –यानी कश्मीर में भारतीय फौज में कर्नल के पद पर नियुक्त हैं। आप कहेंगे “कर्नल और शाइरी”?!” फौलाद का मोम से क्या रिश्ता ??!! लेकिन एक असम्भव से तसव्वुर को जीवंत और साकार देखने के लिये इस पुस्तक से गुज़र जाइये।

बहुत दिनों बाद एक मौलिक इज़हार सामने आया है 'पाल ले इक रोग नादाँ' के रूप में–शाइरी की बन्दिशों को तोडता हुआ नहीं, बल्कि गज़ल के क्षितिज को वुसअत देता हुआ। एक कैनवस जिसमें न्यूज़ पेपर, फोन , सिगार, सिगरेट, टावल, कार , बाइक , बैरक , बर्फ़ , समन्दर, साहिल सभी बिल्कुल सही जगह पर बनाये गये हैं और सुर्ख़ नहीं गुलाबी रंग से बनाये गये हैं- दिमाग़ से नहीं दिल से बनाये गये हैं। ये कैनवस एक शाइर की  तस्वीर बना रहा है जिसका नाम गौतम राजरिशी है। इस तस्वीर की शिनाख़्त मैं नहीं कर रहा बल्कि दौरे हाज़िर की शाइरी के सबसे मक्बूल सुतून यानी डा राहत इन्दौरी और मुनव्वर राअना कर रहे हैं। इस किताब का इलस्ट्रेशन साइज़ और इंतख़ाब सब विशिष्ट की श्रेणी में आता है। डा राहत इन्दौरी की बेहद सरगर्भित भूमिका भी इस संकलन में अवश्य बार बार पठनीय है –

शाइरी का संसार पहले से ही बहुत समृध है। इसे रिवायती, जदीद,अरूज़ ए फ़िक्रो फन वगैरह के मेयार पर आँकने वाले तनक़ीदकार भी बहुतायत में हैं –लेकिन इसमे ग़ालिब –इकबाल –फिराक और बशीर बद्र जैसे साहिर हुये हैं जिन्होने इस विधा की दिशा अपनी शख़्सीयत के दम पर अपने मुताबिक मोड दी और तनक़ीदकारों को ये मानने पर बेबेस किया कि अच्छे शेर का एक ही पैमाना है –कि वो सुनने वाले को अच्छा लगता है!! गौतम चाहते तो अरूज़ ए फ़िक़्रो फन की शायरी पर अपनी बुलन्द इमारत मंसूब कर सकते थे – मेयारी शेर आसानी से कहना उनकी क्षमता मे आता है। बानगी-

तू दौडता है हर पल बन कर लहू नसों में
तेरे वज़ूद से ही मैं भी हूँ फ़लसफ़ों में  (1)
उठी जब हूक कोई मौसमों की आवाजाही से
तेरी तस्वीर बन जाती है यादों की सियाही से (2)
धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ
चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ (3)

लेकिन अरूज़ की शायरी शेर गौतम की वरीयता नहीं हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी मानस के हर अध्याय आरंभ संस्कृत के श्लोकों से किया है जो उनके समकालीन विद्वानो के लिये एक नज़ीर थी-कि अगर महज पांडित्य का ही प्रदर्शन करना होता तो तुलसी नि:सन्देह अपने समकालीन कवियों की कहकशाँ में चाँद की हैसियत रखते ही थे ।लेकिन तुलसी का ध्येय ही कुछ और था उन्हें अपने युग के बिखराव को तरतीब देनी थी –मर्यादा की सीमा रेखाये पुनर्निर्मित करनी थीं और नाउमीदी के दौर में लोकमानस को नई संचेतना देनी थी। इसलिये उन्होने रामचरित मानस  की भाषा लोकभाषा अवधी रखी। इसी के माध्यम से उनका काव्य अमर हुआ और आज तक मानस की चौपाइयाँ हमारी लोकमर्यादा की प्रतिनिधि हैं। दरअस्ल किसी भी युग की घनीभूत पीडा जब प्रवाहमय हुई है तो कविता के स्वरूप में ही ज़ाँविदानी सरहदों तक पहुंची है।शाइर को पैगम्बर से ठीक पहले का मर्तबा प्राप्त है क्योंकि उसकी पीडा में उसके समय को अपना इलहाम मिलता है। श्रुति हो या स्मृति , सामवेद की ऋचाये हों या उपनिषदों के श्लोक सभी गहरी तपस्या के समर होते हैं और निश्चित रूप से वो काव्य के स्वरूप में अपने अमरत्व का सफर तय करते हैं।गौतम ने भी ये इज़हार खुद को एक मोतबर शाइर के रूप में स्थापित करने के लिये नहीं किया है, उनका उद्देश्य एक सीमाप्रहरी के जीवनव्रत्त की काव्यमय प्रस्तुति  है-इसलिये उन्होने इस संकलन की भाषा की ग्राह्यशीलता को तज़ीह दी है और शब्द्चित्रों के मध्यम से यह तस्वीर बनाई है।एक फौजी जो अपने परिवार, अपनी जीवंत संवेदनाओं से देश का प्रहरी होने के कारण दूर है अपनी मन:स्थिति ग़ज़ल के माध्यम से कागज़ पर उकेरता है –और उसका बयान उसके जैसे लाखों सीमा प्रहरियों का दस्तावेज़ बन जाता है। पुस्तक का मूल स्वर विप्रलम्भ श्रंगार( हिज्र) है लेकिन इसके शेड्स एक खास ज़िन्दगी का पूरा स्पेक्ट्रम बनाते हैं-

ट्रेन ओझल हो गई इक हाथ हिलता रह गया
वक़्ते रुख़्सत की उदासी चूडियों में आ गई (1)
नाम तेरा कभी आने न दिया होंठों पर
हाँ तेरे ज़िक्र से कुछ कुछ शेर संवारे यूँ तो (2)
बस गयी है रग रग में बामो दर की खामोशी
चीरती सी जाती है अब ये घर की खामोशी (3)
रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे
उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे (4)

फैज अहमद फैज भी फौजी थे जिनकी शाइरी रूमान के मरहले से आगे बढ कर युग की पीडा की अमर शाइरी बन गई। कर्नल गौतम राजरिशी की अभिव्यक्ति में भी सामाजिक सरोकार के तमाम ज़ाविये पूरी शिद्दत जे साथ मौजूद हैं जो इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि यह सीमाप्रहरी देश की स्थितियों के प्रति किस कदर संजीदा और फिक्रमन्द है।इस बयान में सामाजिक संचेतना का स्वर खूब प्रखर और मुखर है। सियासी साज़िशें,आतंकवाद ब्यूरोक्रेसी की कलाबाजियाँ , आम आदमी का अवसाद , ढहते जीवन मूल्य और इन सब के बीच तडपती हुई मानवीय संवेदनायें –गौतम की अभिव्यक्ति को वैयक्तिक से उठा  कर वृहत्तर क्षितिज पर ले जाती हैं –

भेद जब सरगोशियों का खुल के आया सामने
शोर वो उठ्ठा है , अपना हुक्मराँ बेचैन है (1)
इधर है खौफ़ बाढ का, बहस में दिल्ली है उधर
नदी का ज़ोर तेज़ है कि बाँध में दरार है (2)
मसीहा सा बना फिरता था जो इक हुक्मराँ अपना
मुखौटा हट गया तो कातिलों का सरगना निकला(3)
मत करो बातें कि दरिया ने डुबोई कश्तियाँ
साहिलों ने की है जो उन साजिशों की बात हो (4)
कुछ अहले ज़ुबाँ आये तो हैं देने गवाही
आँखों से मगर ख़ौफ़ का साया न गया है (5)

गालिब की शाइरी मसाइले तसव्वुफ़ का रूहानी पैकर है – उनकी हर गज़ल क्लासिक गज़ल का जीवंत आइना है – इकबाल की शाइरी गुमराह कौम की रूह को कोंचती है जिसमें खोये हुये वैभव को फिर पा लेने की तडप है-उनके प्रतीक भी शाहीन जैसे हैं। जैसा शाइर का तस्व्वुर होता है वैसा ही उसकी शाइरी का कैनवस भी होता है ।इस हिसाब से गौतम का कैनवस बशीर बद्र के कैनवस के नज़दीक है – रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के चित्र शाइरी के मासूम प्रतीकों के साथ –जैसे कि बारिश की धीमी फुहार पड रही हो – धूप , किचन साडी , ज़ुल्फ़ , शावर,  शाम, सितारे फूल चाँद , जुगनू, तौलिया , बिस्तर . सिलवटें , गलियारा , चौबारा , आँगन , ओसरा , तितलियाँ , चूडियाँ , नींद ख़्वाब , बादल, आइना, बर्फ़ और ऐसे ही अनेक अल्फाज़ फल्सफ़ों की ज़द से निकल कर बेहद  खूबसूरत चित्र बनाते हैं । ये पुस्तक ऐसे सैकडों खुशरंग चित्रों का अल्बम भी है। गौरतलब ये है कि ये सभी बिम्ब एक फौजी की ज़िन्दगी भी दिखाते हैं और मन:स्थिति भी और साथ ही शाइरी को भी एक खास ज़ाविये से सम्रद्ध करते हैं-

गुज़र जायेगी शाम तकरार में
चलो चल के बैठो भी अब कार में (1)
जो धुन निकली हवा की सिम्फनी से
हुआ है चाँद पागल आज उसी से (2)
मकाँ की बालकोनी की वो धडकनें बढा गयी
अभी –अभी जो पोर्टिको में आई नीली कार है (3)
चाँद उछल कर आ जाता है कमरे में जब रात गये
दीवारों पर यादों के कितने जंगल उग आते हैं (4)
बिस्तरों की सिलवटों की देख कर बेचैनियाँ
सिसकियाँ तकिये ने लीं चादर मचलती रह गई (5)

बकौल डा राहत इन्दौरी गौतम की शाइरी में – नासिर की तनहाई – बशीर का कैनवस और फिराक की शोख़ उदासी बडे ही दिल्कश रूप में परिलक्षित होती है।ये दौरे –हाज़िर के सरताज शाइर का गौतम की शाइरी पर एक सच्चा और संश्लिष्ट बयान है जिसे बगैर किसी बहस के तस्लीम किया जा सकता है।हम धरती पर कहीं भी रहें सितारे चाँद सूरज जुग्नू फूल और हवा का कहत कहीं नहीं है –इन्हीं बिम्बों से शाइरी में हज़ार तरीके की मन:स्थितियाँ कागज़ पर उतारी जाती हैं। इन मनाज़िर में पोशीदा और नुमाया गौतम का एक निजत्व भी है यानी एक फौजी के स्पेसिफिक शेर जिनके ज़िक्र के बिना बात अधूरी रहेगी। फौजी के शेर देखिये –

होती हैं इनकी बेटियाँ कैसे बडी रह कर परे
दिन रात इन मुस्तैद सीमा प्रहरियों से पूछ लो (1)
घडी तुमको सुलाती है घडी के साथ जगते हो
ज़रा सी नींद क्या है चीज़ पूछो इक सिपाही से (2)
है लौट आया काफिला जो सरहदों से फौज का
तो कैसे हँस पऎडी उदास छावनी अभी अभी (3)
चीड के जंगल खडे थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से(4)

पलाश का फूल पाषाण का विभव नहीं बल्कि पत्थर की जडता की पराजय का प्रतीक होता है !! कश्मीर की सर्द वादियों में एक फौजी के भीतर शायर के ह्रदय का स्पन्दन ऐसी ही घटना है जो निशानदेही करती है कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य की आत्मिक ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी है और अति विषम स्थितियों में भी मनुष्यत्व की गरिमा के प्रतीक साहित्य संगीत और कला विकसित होते रहेंगे और परवान चढते रहेंगे। गौतम का शाइर इसकी जीती जागती मिसाल है।ग़ज़ल एक विधा है जिसकी अंतहीन समृध्धि का कारण भी यही है कि एक ही ग़ज़ल में कई मंज़र कई शेडस कई मन;स्थितियाँ और कई रंग पिरोये जा सकते हैं इसका व्याकरण ऐसा है कि रदीफ कफिये के चलते इन अनेक रंगों के प्रवाह में कतई बिखराव नहीं आता। गौतम ने अपने जज़्बात इस विधा के माध्यम से मंज़रे आम किये हैं –जिससे उनको अधिक से अधिक सोचा समझा और जाना जा सकता है- 

 चलो चलते रहो पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

गौतम की शाइरी में रूमान उनकी संवेदनाओं की प्रोटेक्टिव -शील्ड भी है –जहाँ वो हैं वहाँ प्रेम अपने साकार रूप में उपस्थित नहीं है –लेकिन हाफिज़े से बार बार गुज़र कर तसव्वुर को बार बार ज़िन्दा करके इज़हार को बार बार धारदार करके उन्होने अपने प्रेम को संरक्षित किया है-
जबसे तूने मुझको छुआ है
रातें पूनम दिन गेरुआ है

कश्मीर में सिर्फ़ बर्फ़ है तनाव है और गोलियों की सनसनाहट है लेकिन उन्होने अपने तसस्व्वुर से अपनी ग़ज़ल में  एक भरे पूरे कैनवस को खुशरंग रखा है जिसे जीवन की सीमित उपलब्धता में जीवन को पूरे दायरे में जीने की कोशिश के तौर पर दाद दी जा सकती है-

दूर क्षितिज पर सूरज चमका , सुबह खडी है आने को
धुन्ध हटेगी , धूप खिलेगी , वक़्त नया है छाने को

इसके सिवा उन्होने शायरी की गरिमा को भी बख़ूबी बरकरार रखा है और कमोबेश हर ग़ज़ल में ऐसे शेर कहे हैं जो उन्हें अव्वल पाँत का शायर साबित करते हैं –

हैं जितनी परतें यहाँ आसमान में शामिल
सभी हुईं मेरी हद्दे –उडान में शामिल (1)
कि इससे पहले खिज़ाँ का शिकार हो जाऊँ
सजा लूँ खुद को मुकम्मल बहार हो जाऊँ (2)

एक व्यक्तिगत बात भी इस समीक्षा के हवाले से कहना चाहूँगा गौतम से –“ गौतम!! सन 1989 -65 फील्ड रेजीमेण्ट –मेजर एम जी मिश्रा की चिता को मैने खुद अग्नि दी थी जो तीन मासूम बेटियों को छोड कर इस देश के लिये बार्डर पर शहीद हो गये थे !! ये मेरे सगे बहनोई थे !! सैकडों फौजियों के हुजूम और राइफलों की सलामी के बाद ये परिवार कैण्टोमेण्ट की सुरक्षित बाउंड्री से निकल कर अराजक सिविल लाइफ में आ गया और फिर फिर जीवन के एक अंतहीन संघर्ष में मेरी बहन को भी कैंसर की सियाही निगल गई – इस शेर ने 27 बरस पहले का मंज़र जगा दिया –

मूर्तियाँ बन रह गये वो चौक पर , चौराहे पर
खींच लाये थे जो किश्ती मुल्क की मँझधार से

गौतम अपनी शाइरी में इस तरह शुमार हैं जैसे कि बर्फ़ में पानी- जैसे लहू में सुर्ख़ रंग – जैसे अहसास में दिल शामिल होता है। इनका हर शेर व्यक्तिगत अनुभूति की उपज है और बेहद निर्दोष और सच्चा है जैसे मासूम बच्चे की मुस्कुराहट या सूरज की किरने होती हैं।भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में जिन कारंतिकारियों की अग्रणी भूमिका है उनकी ज़िन्दगी का एक जीवंत द्स्तावेज़ यशपाल के “सिन्हावलोकन” में मिलता है –यशपाल क्रांतिकारी भी थे और साहित्यकार भी। मैं गौतम के शतजीवी होने की कमना करता हूँ ताकि आगे कभी हमें कश्मीर की सच्ची दास्तान ग़ज़ल के इलावा भी साहित्य के अन्य आयामों में उपलब्ध हो सके। मेरी और इस मुल्क  की तमाम दुआयें अपने इस योद्धा के साथ हैं जिसके पास पत्थर का कलेजा और मोम का दिल है।

  • समीक्ष्य पुस्तक-पाल ले इक रोग नादां/ गज़ल संग्रह-गौतम राजरिशी/2014/ प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, पी सी लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड,सीहोर-466001 (म.प्र.) /मूल्य रू. 200


मयंक अवस्थी


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