सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

पुस्तक समीक्षा: आख्यान में बदलते ‘क्षण’ की कविताई-प्रो. राजमणि शर्मा




‘कविता’ क्या है? किसे कहेंगे? यह आज का ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जिससे हर एक ‘रचना’/ ‘कलाकार’, ‘रचनाकार’ जूझ रहा है. इसे पारिभाषित करना तब और कठिन है जब परिवेश और परिस्थितियों के चक्रवाती तूफ़ान में मनुष्य को अपनी अस्मिता की तलाश हो और कला को अपने अस्तित्व की रक्षा की चिंता हो. आज तो मनुष्य का सर्वोत्तम, वर्षों की साधना का प्रतिफल उसका ‘मूल्य’ ही छिन्न भिन्न हो रहा है, उसकी सार्थकता पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं, उनके अर्थ बदल रहे हैं. किंतु क्या यहाँ ‘मानवीयता’ या ‘मनुष्य’ जीवित है? नहीं. तभी तो आज का कलाकार, कवि-मन अपने सुंदर को खोजने, संजोने, सँवारने में संलग्न है. वह विकल है – इसकी खोज और प्रतिस्थापना के लिए. किंतु, आज के इस अजनबीपन की गुहा के गहन अंधकार में क्या वह स्वयं विलुप्त होने के करीब नहीं है? तभी तो वह कह उठता है – “ईश्वर,/ गलती हो गई आप से,/ दुनिया बनाई मेरे लिए/ पर गलत नाप की,/ फिट नहीं होती मुझे.” इसके बावजूद, मनुष्य कभी हारा नहीं. वह फिर से स्थापित करेगा, खोजेगा कला का मानदंड, नया मानदंड. यही खोज रचनाकार के जीवन का उद्देश्य है, और है इसी में उसके जीवन की सार्थकता - “कला कई मौतें मर चुकी है./ .../ पर फिर भी जीवित है.” कुमार लव भी यह स्वीकार करते हैं कि “पर गर्भ में ... गुफाओं में .... वहाँ सब बार-बार लिखा जाता है/ कई बार दोहराया जाता है.” यह सच है, स्वीकार्य है किंतु कुमार लव का कथन कि “जन्मती नहीं कविता” विचारणीय है. ‘कविता’ तो मनुष्य की जीवंतता का आधार है, यदि काव्य-संवेदना नहीं तो मनुष्य नहीं. वस्तुतः वह मनुष्य के अंतस में सदा सर्वदा विद्यमान रहती है और प्रतिभा के सहारे वह एकाएक फूट पड़ती है.

कुमार लव (1986) हिंदी-युवा-कवि के रूप में अपने पहले संग्रह ‘गर्भ में’ (2015) के साथ हमारे सामने आते हैं. इस संकलन में उनकी ‘अनुभूति’; विचारधारा, परिस्थिति-परिवेश, संघर्ष, वर्तमान जीवन-जगत के यथार्थ रूपी रसायन में रची-पगी है. इस संग्रह की कविताओं के शीर्षक इस तथ्य के साक्षी हैं कि आज की रचनात्मकता की सार्थकता अपने परिवेश को यथार्थ रूप में अभिव्यक्ति प्रदान करने में ही है. कुमार लव इस कसौटी पर खरे उतरते तो हैं, किंतु कहीं-कहीं शीर्षक अपनी सार्थकता संप्रेषित करने तथा पूरी कविता को बाँधने की दृष्टि से सीमित दिखाई देते हैं. यथा – ‘चार आँखों वाला कुत्ता’. यह टिप्पणी एक सामान्य पाठक की है. हो सकता है कि बौद्धिक ऊँचाई प्राप्त पाठक उनसे तादात्म्य स्थापित कर पाएँ, किंतु कविता तो ‘जन’ के लिए भी होनी चाहिए ताकि वह अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप उसे आत्मसात कर सके. फिर भी इस संग्रह में ऐसी कविताओं की भरमार है, जिनमें रागात्मकता अपने चरम उत्कर्ष के साथ खड़ी है, और एक ऐसा बिंब उभरता है जो अंतस को झकझोर देता है. यथा – 

  तुम कहती/ पढ़ लेता हूँ तुम्हेँ/ 
  जान लेता हूँ तुम्हारा मन/ 
  समझ लेता हूँ तुम्हारा दर्द... 
  अब/ हो रहे हम/ दूर फिर से... 
  चाहता हूँ थामना/ तुम्हारा हाथ/
  छूना तुम्हारा मन/ कहना फिर से ... (फिर से – 1) 
  हमारी बातों को/ शब्दों को 
  लग गई है दीमक/ खामोशी की. (फिर से – 2) 

ऐसी ही कविता है – ‘शून्यपाल’. 
रागात्मकता का दूसरा पक्ष दिखाई देता है – ‘द्वंद्वातीत’ में 

  नहा धोकर आया/ 
  तड़पते हुए तुम्हें देखा न गया. ×××
  और तुम्हारी आखिरी साँस के साथ 
  मेरी नींद भी टूट गई. 

सामाजिक विसंगति को लेकर रची गई कविता ‘जोंक’ आज के मनुष्य को अपने असली रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है. ‘शोषण’ का यह यथार्थ चित्रण हमेशा याद रहेगा. इसी तरह की रचना है – ‘सुश्री आत्म संहार’, ‘किसलिए’ सांप्रदायिकता तथा दोस्तों की असलियत का पर्दाफाश है – 

  छोड़ आए थे उसे अकेला 
  वही सब जिन्हें बचाने को 
  रुका था वह वहाँ./ ...
  मैंने देखा/ अपने सबसे करीबी दोस्त को/ टूटते हुए/ ...
  उसकी पहचान के कारण/ उसका ईमान मुसल्लिम होने के कारण. 

वस्तुतः यह आज का मानवीय संकट है, संबंध या दोस्त आज बेमानी हो गए हैं. ‘घृणातीत’ भी इसी प्रकार की रचना है. यहाँ मानवीय संवेदनाएँ मर ही नहीं रही हैं, इससे आतंक का माहौल भी पैदा किया जा रहा है – 

  पर उसकी सड़ती लाश/ आतंकित नहीं करती मुझे,/
  उस पर रेंगते कीड़ों से/ घृणा नहीं होती मुझे./... 
  धर्म से प्यार/ और सत्य से नफ़रत -/ 
  इनका नशा/ और खुले मुँह -/ इनकी भूख 
  और इनकी खुराक/ भर देती है मुझे/ 
  आतंक से. 

निश्चय ही ‘घृणातीत’ मेरी अपनी दृष्टि में एक ऐसी रचना है जो मानवीय यथार्थ से भरपूर और संप्रेषणीयता के माध्यम से संवेदना का तीखा-नुकीला बिंब प्रस्तुति का प्रयास भी है. 
कुमार लव की कविताओं में नए-नए प्रतीक और बिंबों की प्रस्तुति का प्रयास दिखाई देता है. ‘कत्तन वाली’, ‘कैनवस’, ‘नाटा उत्सव’, ‘झील में धूप’ अपने विभिन्न रूपों में प्रस्तुत हैं. यह ‘धूप’, ‘प्रकाश’, ‘रोशनी’ आदि उनकी आशा का केंद्र है. ‘आत्मा’ एक ऐसी कविता है जिसमें आँगन में कभी उपस्थित पेड़ की स्मृतियों की ताजा अनुभूति है. यह अतीत की खोज है, याद है, पुनः स्मरण है और ‘बीते’ से लगाव का प्रमाण. आज ऐसी कविताई कम ही दिखाई देती है. ‘विजया ऐसी छानिए’, ‘झील’, ‘सपनों की टोली’, ‘पेड़ बनना’ अच्छी कविताओं के उदहारण हैं जिनसे सरसता, सहजता और सरलता से संवाद संभव है. मैं कह सकता हूँ कि ‘यह संग्रह आख्यान में बदलते क्षण की कविताओं का संग्रह है.’ कुमार लव को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ. विश्वास है – हिंदी कविता की नई पीढ़ी में वे अग्रणी बनेंगे. 


  • गर्भ में/ कुमार लव/ 2015/ तक्षशिला प्रकाशन,
  • 98-ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
  • नई दिल्ली- 110002
  • पृष्ठ–136/ मूल्य–रु. 300/-


प्रो. राजमणि शर्मा



चाणक्यपुरी, सुसुवाही,
वाराणसी– 22
मोबाइल : 09450454328

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