मंगलवार, 15 मार्च 2016

आशा पाण्डेय ओझा के दस मुक्तक


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



(एक)

बनो रहबर दिखा दो राह मुझको।
अधिक की फिर नहीं हो चाह मुझको।
दुआ हर साँस में शामिल रहे यूँ,
न पीड़ित की लगे फिर आह मुझको।


(दो) 

सज़ा देना भले मुझको जुर्म भी पर बता देना ।
दिलों में फर्क जो लाए अहसास वो मिटा देना ।
कभी जो घेर ले मुझको उदासी से भरे साये,
निगाहें डाल कर मुझपे उदासी तुम मिटा देना ।


(तीन) 

अंदर बाहर आग लगी है ,घर चौबारे सुलग रहे।
ये हालात सुधारें कैसे ,कैसे कोई विलग रहे।
टुकड़ा-टुकड़ा टूटा भारत ,टूटी उसकी ताक़त भी,
जांत-धर्म के झगड़े में क्यों,भाई-भाई अलग रहे।


(चार) 

कौन ऐसे पुकार लेता है।
जब भी बिखरूं सँवार लेता है।
बेटियों का ज़रा सा हंसना भी,
ग़म की ज़द से उबार लेता है।


(पांच) 

प्रेम की बहती नदी तुम त्याग की तस्वीर हो ।
दया करुणा में डूबी आँख का ज्यों नीर हो ।
सीधी सादी सरल तुम छल कपट से दूर हो,
पर नहीं अबला हो तुम,तुम शत्रु को समशीर हो ।


(छह)

सुलगता देख हर मंज़र,चमन ये काँप जाता है ।
हर इक शै को तजुरबे का तराजू नाप जाता है
छुपाओ लाख बातों को या परदे भी कई डालो,
अगर अनबन हो बेटों में,तो वालिद भांप जाता है ।


(सात)

खून के आंसू रुलाता है कोई ।
क्यूँ मुझे इतना सताता है कोई ।
रूह में इक बूंद बनकर प्यार की,
धड़कनों में उतर जाता है कोई ।


(आठ)

सबको समय ने अपनी ज़द में फँसा के मारा
इसको उठा के मारा,उसको गिरा के मारा
ऐ ज़िन्दगी तिरा भी अंदाज़ है निराला
इसको हंसा के मारा उसको रुला के मारा आशा


(नौ)

भले कश्ती हो छोटी पर समन्दर नाप लेती है।
नज़र की ओढ़नी भी लाज घर की ढांप लेती है।
फ़रेबी बच नहीं सकता कभी मेरी निगाहों से,
खरी है या नज़र खोटी ये आशा भांप लेती है।


(दस)

इसको हँसा के मारा उसको रुला के मारा।
सबको समय ने अपनी ज़द में फंसा के मारा।
आँखें हैं पानी-पानी दिल भी धुआँ-धुआँ है,
मन की तपिश ने कैसे सबको जला के मारा।


आशा पाण्डेय ओझा


c/o जितेन्द्र पाण्डेय
उपजिला कलक्टर,
पिण्डवाडा-307022
जिला सिरोही, राजस्थान
मो. 07597199995
ईमेल: asha09.pandey@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें