मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

राजेन्द्र तिवारी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

             

             शह दी है पियादे ने..


शह दी है पियादे ने कोई बात नहीं है।
बाक़ी है अभी खेल अभी मात नहीं है।

फ़स्लें न उगेंगी न कभी प्यास बुझेगी,
ये ओस की बूँदें है ये बरसात नहीं है।

नन्हा सा दिया देख के घबराये जो सूरज ,
ये क़द की बुलन्दी है करामात नहीं है।

कहते हैं कोई शह्र में अब भी है वफ़ादार,
हालांकि मेरी उससे मुलाक़ात नहीं है।

मज़हब की सलाख़ों में मुझे क़ैद न करना,
इन्सान हूँ मैं कोई मेरी जात नहीं है।      


                                        

             भूल हमसे हो गई या..


चन्द दाने ढूंढ़ने बस्ती से वीराने गये।
हर सुबह घर से परिन्दे जि़न्दगी लाने गये।

साजि़शें नाकाम कर दीं ऐ हवाओं शुक्रिया,
उठ गईं रुख़ से नक़ाबें लोग पहचाने गये।

घायलों से कितनी हमदर्दी थी उनको दोस्तों,
थैलियाँ लेकर नमक की ज़ख़्म सहलाने गये  ।

भूल हमसे हो गई या तुमसे नादानी हुई,
वर्ना कैसे महफि़लों तक अपने अफ़साने गये।

यूँ न जाओ गाँव अपना छोड़कर पछताओगे,
लोग काफ़ी दूर तक हमको ये समझाने गये।


                                                   

             दिखती नहीं है आग..


समझे न उनकी बात इशारों के बावजूद।
डूबे हैं हम तो यार किनारों के बावजूद।

दिखती नहीं है आग शरारों के बावजूद।

काली है कितनी रात सितारों के बावजूद।

गुलशन को जाने किसकी नज़र लग गई है यार,

खिलते नहीं हैं फूल बहारों के बावजूद।

है रहबरों की भीड़ प’ मंजि़ल कोई नहीं,

दर-दर भटक रहे हैं सहारों के बावजूद।

टी.वी. को देख-देख के नस्लें बिगड़ गईं,

तहज़ीब के तमाम इदारों के बावजूद। 

चेहरों पे उनके शिकन भी नहीं दिखी,

इतनी तबाहियों के नज़ारों के बावजूद। 


                                                     

 आदमी में अब ये बीमारी..               


जि़न्दगी में यूँ तो  दुश्वारी बहुत है।
इसलिए जि़न्दा हूँ ख़ुद्दारी बहुत है।

आदमी में अब ये बीमारी बहुत है।
हौसला थोड़ा है हुशियारी बहुत है।

उसकी नासमझी का अंदाज़ा लगाओ,

कह रहा है ख़ुद समझदारी बहुत है।

बस ज़रा सा साथ मिल जाये हवा का,

आग भड़काने को चिन्गारी बहुत है।

काश होती ये वफ़ादारी की मूरत,

वैसे सूरत आपकी प्यारी बहुत है।

दिल हमें ‘राजेन्द्र’ समझाता है अक्सर,

कम करो इतनी रवादारी बहुत है।




राजेन्द्र तिवारी



  • जन्म- 02 मार्च-1960 (कानपुर)
  • शिक्षा- परास्नातक कानपुर विश्वविद्यालय
  • लेखन - तीन दशकों से अधिक समय से ग़ज़लों से गहरा जुड़ाव। यदा-कदा गीत, आलेख, समीक्षा आदि।
  • प्रकाशन - ‘‘संभाल कर रखना’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित 2012, ‘‘ज़बान काग़ज़ पर’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन।
  • ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल संग्रह’, ‘ग़ज़ल दुष्यन्त के बाद’, ‘हिन्दी के लोकप्रिय ग़ज़लकार’, ‘नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार’, ‘हिन्दी ग़ज़ल यानी...’, ग़ज़लें हिन्दुस्तानी’ इत्यादि अनेक समवेत ग़ज़ल संकलनों में शामिल। ग़ज़ल विश्वांकों, विशेषांकों ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’, ‘हंस’, ‘नवनीत’, ‘कथन’, ‘कथादेश’ ‘गगनांचल’ आदि देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं समाचार पत्रों में प्रायः ग़ज़लों का प्रकाशन।
  • पुरस्कार - अली एवार्ड-2000  भोपाल। वाकि़फ़ रायबरेलवी सम्मान-2001 रायबरेली। ‘अनुरंजिका’, ‘सौरभ’, ‘मानस संगम’ इत्यादि विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
  • सम्प्रति - लेखाकार्य व स्वतंत्र लेखन।
  • सम्पर्क - ‘तपोवन’ 38-बी, गोविन्द नगर, कानपुर-208006 (उत्तर प्रदेश)।
  • मोबाइल- 09369810411
  • ईमेल- rajendratiwari121@gmail.com

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