मंगलवार, 31 मई 2016

पुस्तक समीक्षा: सामाजिक असंगतियों को बेनकाब करती कवितायें-डा.राधेश्याम बंधु




                          

                       कविता संग्रह-‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’/ अवधेश सिंह


‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ चर्चित कवि अवधेश सिंह का दूसरा कविता संग्रह है। इसके पहले भी उनका पहला कविता संग्रह ‘छूना बस मन’ प्रकाशित और चर्चित हो चुका है। प्रथम कविता संग्रह की प्रेम कविताओं में जहां रागात्मक अनुभूतियों की पारम्परिक थरथराहट देखने को मिलती है, वहीं दूसरे संग्रह की कविताओं मंजे कवि की वस्तुपूरकता और वस्तुवादी वर्गीय चेतना के प्रमाण भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं और यह कवि की अध्ययनशीलता और सजगता के कारण ही सम्भव हो सका है । ये कवितायें दैनिक अखबार की तरह रोज घटने वाली घटनाओं की मात्रा सूचनायें ही नहीं देतीं बल्कि तत्कालीन चुनौतियों के अनुरूप अपने को तैयार रखने के लिए दिशा निर्देश भी देती हैं । जिन्दगी में, समाज में चाहे जितनी निराशाजनक असंगतियां, अराजकता, खुदगर्जी हो, पिफर भी जिन्दगी और जिन्दगी के सपने कभी मरते नहीं हैं।
      ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ की कवितायें निश्चितरूप से उपभोक्तावादी, यथास्थितिवादी सोच वाले लोगों के लिए भी चुनौतीपूर्ण सवाल प्रस्तुत करती हैं कि यदि बस्ती के लोगों की जिन्दगी में ठहराव और उदासीनता है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? कविता में थोथी बौद्धिकता की शाब्दिक, भाषिक बाजीगरी करने वाले कवियों से भी यह सवाल है कि क्या उन्होंने इस सामाजिक निष्क्रियता और प्रतिगामिता के बारे भी कभी सोचा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इस द्रष्टिकोण से अवधेश सिंह की सामाजिक सरोकारों की जागरूक कवितायें सीधी -सहज भाषा में आम आदमी के दुख-दर्द, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को विषय बनाकर उनसे संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हुई भी प्रतीत होती हैं साथ ही उनकों इन असंगतियों से जूझना भी सिखाती हैं। हम देखते हैं कि प्रत्यक्षतः ये गद्य कवितायें हैं किन्तु इनकी अन्तरात्मा की आन्तरिक बुनावट पूर्णरूपेण गीतात्मक है।
     इससे स्पष्ट होता है कि हर कवि में विकास की सम्भावनायें होती हैं वशर्तें कि कवि में अपने को युगानुरूप बदलने की प्रबल इच्छा हो और साथ ही उसमें  अध्ययनशीलता की जिज्ञासा भी हो । यहां यह भी बताना जरूरी है कि जब कवि कविता की वस्तुवादी आलोचना से भी परिचित होता है, तो उसे अपनी कविताओं को मानव की बेहतरी की चिन्ता के अनुरूप न्यायपरक बनाना ज्यादा आसान होता है । यही बात मैंने अपनी पुस्तक ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ में भी समझाने का प्रयास किया है कि ‘‘साहित्य का वस्तुतत्व यदि क्या, क्यों, और किसके लिए प्रश्नों के जवाब की खोज का परिणाम है तो वह साहित्य को जनप्रिय और यथार्थवादी दोनों बनायेगा और इससे भिन्न हुआ तो वह निरन्तर अमूर्त होता जायेगा। वस्तुतः वस्तुतत्व साहित्य में मनुष्य के मनुष्य होने का प्रमाण है।’’  ;( ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ डा. राधेश्याम बंधु पृष्ठ 14 )
    इस दृष्टि  से इस संग्रह की कवितायें काफी  हद तक आश्वस्त करती हैं और विश्वास दिलाती हैं कि कवि सिर्फ कविता ही नहीं लिखता है बल्कि वह कविता की वस्तुवादी आलोचना और वर्गीय चेतना से भी प्रिचित है और उसने उसका निर्वाह करना भी जानता है। इसका प्रमाण है उनकी कविता ‘जिन्दगी फुटपाथ की सेल हो गई ’। आज बाजारबाद समाज पर जिस तरह प्रभावी होता जा रहा है यह हम सबके लिए एक चिन्ता की बात है। इसी का दुष्परिणाम है कि हमारे रिश्ते, नाते, आचार, विचार के मूल्यों में अनवरत गिरावट देखने को मिल रही है। कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं-  

महंगाई
इतनी बढ़ी 
अझेल हो गयी 
गृहस्थी
समस्याओं की 
रेल हो गयी 
हर घर की
बस एक सी कहानी
आपसी सारी बातें
बेमेल हो गयी [ पृष्ठ 31 से ]

    इसी प्रकार की एक मार्मिक कविता है ‘बीमार मिल का सायरन’ । हम जानते हैं कि पहले मिल, कारखाने जो कामगारों को काम देते थे, मिस्त्री , मजदूरों के चूल्हों को गरम बनाये रखते थे और पीठ पर बस्ता लादे हुए बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते थे, वे आज अवसरवादी राजनीति के कारण खुद ही बीमार हो गये हैं और उनमें बन्दी के ताले पड़ गये हैं। इससे लाखों कामगार बेकार हो गये हैं । बहुतों के घरों में चूल्हा भी नहीं जल पाता। कविता की कुछ पंक्तियां यहां दृष्टव्य हैं-

मिल की दीवार पर
यह सदियों से जड़ा है
बीमार मिल का सायरन
बना मूक दर्शक चुप पड़ा है

कभी था बस्ती की
गलियों से कामगारों की
भीड़ को मिल के गेट तक 
ले जाने वाला
जाना माना पथ प्रदर्शक
बन गया है मूकदर्शक
अब यह सायरन!
हो दुखी , हो अनमन
हो लाचार 
देखता है खोलियों के
तंग हाल भूखे नंगे
फटे हाल बीमार तन ! [ पृष्ठ 68 से ]

 अब तो उंगलिया और हथेलियाँ
स्याही की कलम से रंगती  नहीं हैं
बेदाग साफ सुथरे हाथ
बाल पेन की
सरसराती सांप सी लिखावट से
आदेश निर्देश प्रस्ताव के जहर बोते है
कागजों  पर
उगाते हैं मौत - बदहवासी -पीड़ाओं
की लहलहाती फसलें
सिर्फ बस सिर्फ एक रोटी के खातिर  [ पृष्ठ 72 से ]

        इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘पेट की खातिर’ और ‘रोटी’ के नाम पर कुछ लोगों का समाज में अपराध का धंधा  खूब फल-फूल रहा है और वे सफेद कालर उचा करके सभ्य होने का नाटक भी करते हैं । ऐसे रंगे स्यारों को बेनकाब करके यह कविता शरीफ लोगों की आखे भी खोलती है और उनसे सतर्क रहना भी सिखाती है। इस संग्रह में ऐसी ही व्यंजनापरक कई कवितायें हैं जो सीधी -सहज भाषा में सामाजिक असंगतियों से परिचित कराने में पूरी तरह सक्षम हैं जैसे जिन्दगी सिपर्फ कविता नहीं, बंद तो सब बंद है, आम आदमी, बजट, पर्यावरण उवाच, द्रोपदी का चीरहरण, लक्ष्मण रेखा, मेरे बच्चे, भ्रष्टाचार, छले जाने का भय, रोटी, दलितोत्थान, आदि ।
      ये यथार्थवादी कवितायें सामाजिक सरोकारों को लोक धर्मी  भाषा और शिल्प में अपने सम्बोध्य आम जनता तक सम्प्रेषित करने में पूरी तरह सक्षम हैं और पठनीय भी हैं । किन्तु  वहीं  यह  भी  स्पष्ट  करना बहुत जरूरी है कि आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी के अनुसार कविता सिर्फ अखबार की कतरन नहीं है बल्कि कविता कुछ अलग और आगे की बात भी व्यंजनापरक शैली में करती है । इसलिए किसी भाव को प्रस्तुत करने के लिए उसे एक कलात्मक स्वरूप भी ग्रहण करना पड़ता है, तभी वह दूरगामी जीवन्तता और प्रभाव ग्रहण कर पाती है । इसलिए ‘ठहरी बस्ती-ठिठके लोग’ के लिए अवधेश सिंह को बधाई  देने के साथ मैं यह संकेतित करना भी जरूरी समझता हूं और मुझे पूरा  विश्वास है कि वे अपने आगामी कविता संग्रह की तैयारी में और भी मेहनत करेंगे  तथा हमें उनसे और भी सार्थक तथा सजग कवितायें पढ़ने को मिलेंगी ।

  • समीक्ष्य पुस्तक-ठहरी बस्ती ठिठके लोग/कविता संग्रह-अवधेश सिंह/2014/ ISBN : 978-93-81480/प्रकाशक: विजय बुक्स, सुभाष पार्क नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032/पृष्ठ : 86/मूल्य 195/ 
     

डा. राधेश्याम बंधु


सम्पादक,
‘समग्र चेतना’   
पता-बी-3/163, यमुना विहार,            
दिल्ली-110053                  

1 टिप्पणी:

  1. सुबोध जी धन्यवाद और सुंदरतम पोस्ट के लिए बधाई ।

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