मंगलवार, 5 जुलाई 2016

राग तेलंग की कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अनिश्चितताएं


अनिश्चितताएं 
सनातन हैं
आज भी 
घर से निकलते ही
अनिश्चितताएं भी 
चप्पल पहनकर 
हमारे पीछे-पीछे चल पड़ती हैं
हमारे अपने 
जिस भय को ओढ़े रहते हैं
वे हमारे लौटने से जुड़ी अनिश्चितताएं ही हैं
चप्पलों की आवाज़ें
स्वप्नों तक में 
प्रवेश कर जाती हैं
हम अचकचाकर जाग जाते हैं
हर आहट में 
अनगिन संदेशों की 
संभावनाएं हैं
उनमें एक 
हमारा लौटना भी शामिल है
घर से 
सब कुछ निश्चित कर निकलना
कम से कम
एक अनिश्चय को 
पीछे छोड़ जाना तो है ही ।


ऋण


मैंने 
आंगन में
एक बीज बोया
घर में 
बच्चे को खिलाया
बच्चा बड़ा हुआ
बच्चे ने 
आंगन के पेड़ पर
झूला बांधा और मुझे झुलाया
मैंने सोचा
बीज ने आज 
सारा ऋण चुकाया ।


हीरा


जो बहुतों के पास नहीं होता
उसके बारे में बातें करने को
लोगों के पास 
बहुत समय होता है
कई बार तो
पूरी उम्र गुज़ार देते हैं
उसके सपनों में
जबकि रात भर
उनके सिरहाने रखी 
मोमबत्ती के बारे में 
वे सोचते तक नहीं
उन्हें 
ख़याल ही नहीं आता कि
बेचने के नाम पर
उनके ज़ेहन में
जो चेहरा
घुसता चला आ रहा है
वह अपने समय का 
ज़रूरी रहा नायक है
जो अब 
ग़ैरज़रूरी चीज़ों को खपाने के लिए 
नियुक्त किया गया है
हीरा थीं 
वे चीज़ें जिनके बगैर
जीवन की कल्पना तक 
मुश्किल थी
आओ फ़ेहरिस्त बनाएं
और तय करें कि
पसीना किसके लिए बहाएं ।


चिराग


एक चिराग जल रहा है
यदि यह 
एक दृश्य की बात है
तो रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह 
एक लिखे हुए वाक्य की बात है
तो भी रोशनी ज़रूर हो रही है
यदि यह एक स्वप्न की बात है
तो भी रोशनी होना तय है
एक चिराग 
यदि नहीं जल रहा है
तो भी 
रोशनी का सवाल तो 
खड़ा होता ही है |

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज की ब्लॉग बुलेटिन मोमबत्ती की याद तभी आती है,जब अंधकार होता है मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...

    सादर आभार !

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  2. हार्दिक धन्यवाद ब्लॉग बुलेटिन..

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  3. पुस्तक चर्चा -
    'मैं पानी बचाता हूँ' सामयिक युगबोध की कवितायेँ
    चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
    *
    [पुस्तक विवरण- मैं पानी बचाता हूँ, काव्य संग्रह, राग तेलंग, वर्ष २०१६, ISBN ९७८-९३-८५९४२-२३-५, पृष्ठ १४४, मूल्य १२०/-, आकार २०.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७, सेक्टर ९, मार्ग ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६]
    *
    साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है किन्तु दर्पण संवेदनहीं होता है जो यथास्थिति को प्रतिबिंबित मात्र करता है जबकि साहित्य सामायिक सत्य को भावी शुभत्व के निकष पर कसते हुए परिवर्तित करता है। दर्पण का प्रतिबिम्ब निरुद्देश्य होता है जबकि साहित्य का उद्देश्य सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय माना गया है। विविध विधाओं में सर्वाधिक संवेदनशीलता के कारण कविता यथार्थ और सत्य के सर्वाधिक निकट होती है। छन्दबद्ध हो या छन्दमुक्त कविता का चयन कवि अपनी रूचि अनुसार करता है। बहुधा कवि देश-काल-प्रसंग के अनुरूप शिल्प का चयन करता है।

    'मैं पानी बचाता हूँ' समर्थ हस्ताक्षर राग तेलंग की छोटी-माध्यम कविताओं का पठनीय संग्रह है। बिना किसी भूमिका के कवि पाठकों को कविता से मिलाता है, यह उसकी सामर्थ्य और विश्वास का परिचायक है। पाठक पढ़े और मत बनाये, कोइ उसके अभिमत को प्रभावित क्यों करे? यह एक सार्थक सोच है। इसके पूर्व 'शब्द गुम हो जाने के खतरे', 'मिट्टी में नमी की तरह', 'बाजार से बेदखल', 'कहीं किसी जगह कई चेहरों की एक आवाज़', कविता ही आदमी को बचायेगी' तथा 'अंतर्यात्रा' ६ काव्य संकलनों के माध्यम से अपना पाठक वर्ग बना चुके और साहित्य में स्थापित हो चुके राग तेलंग जी समय की नब्ज़ टटोलना जानते हैं। 'अब नहीं कहता / जानता कुछ नहीं / न ही / जानता सब कुछ / बस / समझता हूँ कुछ-कुछ।' यह कुछ-कुछ समझना ही आदमी का आदमी होना है। सब कुछ जानने और कुछ न जानने के गर्व और हीनता से दूर रहने की स्थिति ही सृजन हेतु आदर्श है।

    कवि अनावश्यक टकराव नहीं छटा किन्तु अस्मिता की बात हो पैर पीछे भी नहीं हटाता। भाषा तो कवि की माँ है। जब भाषा की अस्मिता का सवाल हो तोवह पीछे कैंसे रह सकता है।
    'अब अगर / अपनी जुबांकी खातिर / छीनना ही पड़े उनसे मेरी भाषा तो / मुझे पछड़ाना ही होगा उन्हें '

    काश यह संकल्प भारत के राजनेता कर सकते तो हिंदी जगवाणी हो जाती। तेलंग जो आस्तिकता के कवि हैं। तमाम युगीन विसंगतियों और सामाजिक विडंबनाओं के बावजूद वह मनुष्यता पर विश्वास रखता है। इसलिए वह लिखता है- 'मैं प्रार्थनाओं में / मनुष्य के मनुष्य रहने की / कामना करता हूँ। '

    'लता-लता हैं और आशा-आशा' शीर्षक कविता राग जी की असाधारण संवेदनशीलता की बानगी है। इस कविता में वे लाता, आशा, जगजीत, गुलज़ार, खायां, जयदेव, विलायत खां, रविशंकर, बिस्मिल्ला खां, अमजद अली खां, अल्लारक्खा खां, जाकिर हुसैन, बेगम अख्तर, फरीद खानम, डार्विन सुल्ताना सविता देवी आदि को किरदार बनाकर उनके फन में डूबकर गागर में सागर भरते हुए उनकी खासियतों से परिचित कराकर निष्कर्षतः: कहते हैं- "सब खासमखास है / किसी का किसी से / कोई मुकाबला नहीं।"

    यही बात इस संग्रह की लगभग सौ कविताओं के बारे में भी सत्य है। पाठक इन्हें पढ़ें, इनमें डूबे और इन्हें गुने तो आधुनिक कविता के वैशिष्ट्य को समझ सकेगा। नए कवियों के लिए यह पाठ्य पुस्तक की तरह है। कब कहाँ से कैसे विषय उठाना, उसके किस पहलू पर ध्यान केंद्रित करना और किस तरह सामान्य दिखती असामान्य बात कहना की पाठक-श्रोता के मन को छू जाए, पृष्ठ-पृष्ठ पर इसकी बानगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पत्र लेखन परंपरा में 'कम लिखे से ज्यादा समझना' की बनेगी मार शीर्षक कविता में देखें-
    "देखना / बिना छुए / छूना है
    सोचना / बिना पहुँचे / पहुँचना है
    सोचकर देखना / सोचकर / देखना नहीं है
    सोचकर देखो / फिर उस तक पहुँचो

    गागर में सागर की तरह कविता में एक भी अनावश्यक शब्द न रहने देना और हर शब्द से कुछ न कुछ कहना राग तेलंग की कविताओं का वैशिष्ट्य है। उनके आगामी संकलन की बेसब्री से प्रतीक्षा की ही जाना चाहिए।
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    चर्चाकार सम्पर्क- समन्वय, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
    दूरवार्ता- ९४२५१ ८३२४४, ०७६१ २४१११३१, salil.sanjiv@gmail.com
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