मंगलवार, 11 जुलाई 2017

पुस्तक समीक्षा:लिव इन रिलेशन की विसंगतियों से जूझता महत्वपूर्ण उपन्यास




          पिछले दो दशकों से नारी विमर्श को केंद्र में रखकर महिला लेखकों के संग संग पुरुष लेखकों ने भी सृजन किया और समाज में नारी की स्थिति का खुलासा किया। बदलते हुए समाज और समाज में तेजी से बढ़ रही विदेशी संस्कृति लिव इन रिलेशन को लेकर लिखा गया वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव का उपन्यास "लौट आओ दीपशिखा" लिव इन रिलेशन की तमाम विसंगतियों से जूझती कथा नायिका दीपशिखा के करुण अंत का जीवंत दस्तावेज है । संतोष कम लिखती हैं पर जब भी लिखती है कुछ नया ही लिखती हैं। कथा के प्रत्येक चरित्र को समेटकर उसके हर पहलू को व्यक्त करने का कौशल लेखिका के लेखन की पहचान है। भाव ,कथानक, बिम्ब, प्रतीक ,छोटे छोटे लम्हों को लिए चलते हैं कथा के संग संग और पाठक चकित हुए बिना नहीं रहता कि अरे यह तो हूबहू उसकी कहानी है ।

          "लौट आओ दीपशिखा" का कथानक भी कुछ ऐसा ही है गुजरात के दंगो की मर्मांतक पीड़ा से गुज़र चुकी दीपशिखा को सिजोफ्रेनिया हो जाता है और उसे हर वक्त यह भय सताता है कि कोई उसे मारने आ रहा है। यहां तक कि हर आगंतुक मित्र पर भी वह संदेह करने लगती है। मानो खुद शापित है वह या किसी का शाप ढो रही है जबकि वह जूनागढ़ के नवाब के यहां कानून मंत्री रह चुके पिता की इकलौती बेटी है। समृद्धि उसके कदम चूमती है। चित्रकला में भी वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा चुकी है। जीवन में पुरुष भी आए। मुकेश के आकर्षण को प्यार का नाम दे वह देह के बंधन में बंधी। नीलकांत का प्यार सच्चा लगा था पर वहां भी देह थी और देह के संग संग अपने फिल्मी कारोबार में उसे इस्तेमाल करने की साजिश भी....... पर दोनों से धोखा खाकर टूट जाती दीपशिखा अगर उस के जीवन में गौतम नहीं आता

            गौतम ने उसका अंत तक साथ दिया उसके सुख दुख में वह सच्चा साथी साबित हुआ था।हालांकि गौतम को उससे कोई सुख नहीं मिला। मानसिक रोगी जूनागढ़ में अपनी हवेली को लेकर, मां सुलोचना को लेकर, चित्रकला की जुनूनी प्रवृत्ति को लेकर और हर लम्हा साथ देने के बावजूद वर्तमान और भविष्य के लिए चिंतित दीपशिखा को उसने खुद को भूल कर सम्हाला। लिव इन रिलेशन जैसी समाज में पूर्ण रुप से स्वीकार नहीं की गई आधुनिक विदेशी कल्चर को उसने दीपशिखा के लिए स्वीकार किया। ऐसा प्यार करने वाले विरले ही होते हैं। संतोष जी ने इस प्यार को पढ़ने के लिए मजबूर सा कर दिया। पढ़ कर उसमें खो जाने के लिए भी....... दीपशिखा का नजरिया आधुनिक है।वह देह की आजादी को महत्वपूर्ण मानती है लेकिन वहां जहां प्यार हो ,निभाने का माद्दा हो। शायद यही वजह है कि हर बार प्रेम संबंधों के टूटने पर वह बिखरी है ,अवसाद से घिरी है। लेकिन कैनवास, रंग और ब्रश ने उसे समेट कर फिर खड़ा कर दिया है । चित्रकला की जो जानकारी इस पुस्तक में है उसे पढ़कर यह समझने में देर नहीं लगती कि संतोष खुद चित्रकार भी हैं। कोलाज, थीम ,रेखाचित्र तो बहुत कॉमन जानकारी है। 

           " वॉटर कलर्स के साथ-साथ दीपशिखा ने ग्रेफाइट, क्रेयांस और ऑयल कलर्स का भी इस्तेमाल किया। उसके ब्रश से प्रेम के सातों रंग उभर आते हैं। प्रेम, विश्वास ,आतुरता ,जुनून, घृणा ,तिरस्कार, धोखा उसके ब्रश का जुनून इसी में छलांग मारता है।" संतोष जी ने इस में पूरे विश्व की चित्रकला को समेटा है। भारत और विश्व में अपनी धाक जमा चुका फ्रांस तक उनकी नजरों से नहीं चूका है। पिछले आठ सालों से संतोष जी यात्रा संस्मरण में भी अपनी पहचान बना चुकी है। उनके संस्मरण बहुचर्चित, बहुप्रशंसित हैं। यात्रा संस्मरण की उनकी पुस्तक "नीले पानियों की शायराना हरारत "को मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा नारी लेखन पुरस्कार भी मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों मिल चुका है। इस पुस्तक में भी लद्दाख और फ्रांस का जो उन्होंने वर्णन किया है पाठक को एहसास होता है जैसे लेखिका उसकी उंगली पकड़ तमाम जगहों की सैर करा रही हों।
 लुव संग्रहालय विश्व विख्यात सुंदरी मोनालिसा की पेंटिंग के सामने वह बुत की तरह खड़ी रही । कितना दर्द है मोनालिसा के चेहरे पर लेकिन आंखों में हंसी जैसे कहना चाह रही हो कि दुख से भरी जिंदगी में हंसते रहना एक ईमानदार कोशिश है । संसार की मरीचिका का एहसास दिलाती यह पेंटिंग । मूज़े दल 'म.... मनुष्य का संग्रहालय जिसमें मानव सभ्यता के गुहा काल से अब तक के दृश्य हैं । कुछ दुर्लभ चीजे ,कुछ तस्वीरें ,इम्प्रेसनिस्ट...प्रभाववादी चित्रकला का संग्रहालय जहाँ वेन गॉग का स्वनिर्मित आत्म चित्र और विश्व प्रसिद्ध चित्र सूरजमुखी और उनका कमरा है। सेजां के चित्र भी जिनके कंस्ट्रक्शंस का हवाला ऑरो कार्तिए ब्रेंसो ने दिया था। दीपशिखा मानो बिना पंख आसमान में उड़ रही थी। इन चित्रों की बारीकियां समझने की कोशिश करती, गैलरियों में चित्रों की प्रदर्शनी देखती, रोदां की बनाई विशाल मूर्ति देखती जो फ्रांसीसी लेखक बालज़ाक की थी । कितना सुंदर है पेरिस..... पूरा का पूरा कला संग्रहालय और अपार खिले फूलों से भरा ।"
लगता है जैसे पूरा का पूरा संग्रहालय आंखों के सामने से गुजर रहा है।

            लौट आओ दीपशिखा में कसक है, कशिश है, इंसानी हकीकत का बयान है ।संतोष जी ने हर एक पहलू को बड़ी ईमानदारी से साफ शफ्फाक चित्रण किया है। कथावस्तु में सम्वेदनाओं की पूरकशिश नमी है जिस पर हर लम्हा अंकुरित, पल्लवित होता है ।और यही वजह है कि जिंदगी के तमाम रिश्ते कभी दिलकश तो कभी मुरझाए से प्रतीत होते हैं । ज़मीनी हकीकत से जुड़ी तमाम सच्चाईयों को कैनवास पर उतारती कथावस्तु के पास विस्तृत फलक है लेकिन चरित्रों की भीड़ नहीं। भाषा बेहद खूबसूरत ,शैली में कसाव और कहन में तारतम्यता लिए सहज बहाव है । लौट आओ दीपशिखा निश्चय ही लिव इन रिलेशन पर लिखे अब तक के उपन्यासों में एक ज़रुरी दखल है।

  • समीक्षित कृति: लौट आओ दीपशिखा (उपन्यास)/ लेखिका-संतोष श्रीवास्तव/ प्रकाशक-किताब वाले, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली/ पृष्ठ -136/ मूल्य- 250 रुपये


समीक्षक-प्रमिला वर्मा


सी 1/1, स्नेह नगर, सरकारी आवास, 
गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने,
रेलवे स्टेशन रोड,
औरंगाबाद- 431005 (महाराष्ट्र)

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